मुख्य पृष्ठ / मंत्र संग्रह / Mantra / माँ दुर्गा नवार्ण मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे सम्पूर्ण 9 शक्ति रहस्य व सिद्धि
माँ भगवती शक्ति कृपा · माँ दुर्गा / महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती Mantra

माँ दुर्गा नवार्ण मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे सम्पूर्ण 9 शक्ति रहस्य व सिद्धि

माँ दुर्गा नवार्ण मंत्र ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे का अर्थ, जाप विधि, रहस्य और सिद्धि की संदर्भ एवं व्याख्या सहित संपूर्ण जानकारी पढ़ें।

इष्ट देव माँ दुर्गा / महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय प्रातः काल / संध्या
अनुशंसित माला रुद्राक्ष माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
माँ दुर्गा नवार्ण मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे सम्पूर्ण 9 शक्ति रहस्य व सिद्धि
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विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

Mantra Background & Vedic Origin (मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता)

वैदिक एवं तान्त्रिक वाङ्गमय में भगवती आद्याशक्ति जगदम्बा की उपासना के अनेक मार्ग बताए गए हैं, किन्तु 'श्री दुर्गा सप्तशती' (मार्कण्डेय पुराण) के अंतर्गत वर्णित नवार्ण मंत्र को सर्वोपरी, परम गोपनीय तथा सद्यः फलदायी माना गया है। 'नवार्ण' शब्द का शाब्दिक अर्थ है—'नौ अक्षरों वाला मंत्र'। यह केवल एक सामान्य मंत्र नहीं है, अपितु सम्पूर्ण ब्रह्मांड की जननी महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की त्रिगुणात्मक शक्ति का साक्षात बीजरूप समुच्चय है।

देवी उपनिषद् तथा योगिनी तंत्र के अनुसार, इस मंत्र का प्रादुर्भाव सृष्टि के प्रारंभ में हुआ था। जब ब्रह्मा, विष्णु और महेश जगदम्बा की स्तुति कर रहे थे, तब भगवती ने अपने पूर्ण स्वरूप को व्यक्त करने के लिए इस दिव्य मंत्र का प्राकट्य किया। नवार्ण मंत्र के नौ अक्षर माँ दुर्गा के नौ रूपों (नवधान), नौ ग्रहों (नवग्रह), नौ सिद्धियों तथा मानव शरीर के नौ द्वारों एवं नौ चक्रों को नियंत्रित करते हैं।

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

शास्त्रों के अनुसार, श्री नवार्ण मंत्र का अनुष्ठान किए बिना 'श्री दुर्गा सप्तशती' का पाठ अपूर्ण माना जाता है। इस मंत्र के ऋषि स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं; इसके छंद गायत्र्युष्णिक्अनुष्टुभः हैं; और इसकी अधिष्ठात्री देवियाँ महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती हैं।

Complete Sanskrit Mantra & Phonetic Transliteration (मूल शुद्ध मंत्र)

नवार्ण मंत्र में प्रत्येक बीजाक्षर का अत्यंत गहन आध्यात्मिक व स्पंदनात्मक महत्व है। शुद्ध उच्चारण ही मंत्र की सिद्धि की प्रथम सीढ़ी है।

संस्कृत देवनागरी मूल मंत्र:

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥

बीजाक्षर / शब्ददेवनागरीउच्चारण ध्वनि संबद्ध महाशक्ति
प्रणव ॐOmपरब्रह्म परमात्मा / सर्वव्यापी चेतना
प्रथम बीजऐंAingमहासरस्वती (ज्ञान एवं वाक् शक्ति)
द्वितीय बीजह्रींHreengमहालक्ष्मी (ऐश्वर्य व पालन शक्ति)
तृतीय बीजक्लींKleengमहाकाली (इच्छा व संहार शक्ति)
नाम पदचामुण्डायैChamundayaiदेवी चामुण्डा (चण्ड-मुण्ड घातिनी)
मोक्ष/बोध पदविच्चेViccheअज्ञान का छेदन / ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति

Word-by-Word Meaning & Spiritual Bhavarth (पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ)

नवार्ण मंत्र के प्रत्येक नौ अक्षरों तथा बीजों में अपार ब्रह्मांडीय ऊर्जा छिपी हुई है। आइए इसके गहन आध्यात्मिक अर्थ को समझें:

  • ॐ : यह अनाहत नाद है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति, स्थिति और लय का आधार है। यह साधक को परात्पर ब्रह्म से जोड़ता है।
  • ऐं : यह सरस्वती बीज है। यह ज्ञान, बुद्धि, विवेक, विद्या, वाक्-सिद्धि और मानसिक एकाग्रता का प्रतीक है। इसके जप से साधक की अज्ञानता नष्ट होती है।
  • ह्रीं : यह माया व लक्ष्मी बीज है। यह जगत का पालन करने वाली महालक्ष्मी की शक्ति है। यह साधक को समृद्धि, यश, सौंदर्य, आरोग्यता तथा बाह्य व आंतरिक ऐश्वर्य प्रदान करता है।
  • क्लीं : यह काम व काली बीज है। यह महाकाली की संहारक और आकर्षण शक्ति है। यह साधक के भीतर के भय, शत्रुओं, बाधाओं और तामसिक विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) का नाश करता है।
  • चामुण्डायै : 'चण्ड' (अहंकार) और 'मुण्ड' (अज्ञान/संशय) नामक असुरों का वध करने वाली भगवती चामुण्डा को नमस्कार। यह शब्द साधक के भीतर के अहंकार और संशय को छिन्न-भिन्न करता है।
  • विच्चे : 'वि' का अर्थ है विलोपन/छेदना, 'च' का अर्थ है चित्त/चेतना, और 'ए' का अर्थ है एकात्मता। विच्चे का गूढ़ अर्थ है—
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जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
सर्व संकट निवारण
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
सात्विक आचरण

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप प्रातः काल / संध्या में रुद्राक्ष माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
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