मुख्य पृष्ठ / मंत्र संग्रह / Mantra / श्री नरसिंह मंत्र - ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् अमोघ रक्षा कवच
भगवान श्री हरि कृपा · भगवान श्री नरसिंह (विष्णु अवतार) Mantra

श्री नरसिंह मंत्र - ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् अमोघ रक्षा कवच

श्री नरसिंह महामंत्र (ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं) का संपूर्ण संस्कृत अर्थ, विनियोग, करन्यास, अमोघ रक्षा कवच विधि और चमत्कारी लाभ जानें।

इष्ट देव भगवान श्री नरसिंह (विष्णु अवतार)
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय ब्रह्म मुहूर्त, संध्या काल या नृसिंह जयंती
अनुशंसित माला तुलसी माला या कमलगट्टे की माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
सरल हिंदी भावार्थ:

मैं उन परम पराक्रमी, प्रज्वलित अग्नि के समान तेजोमय, सर्वव्यापी, अत्यंत भीषण किंतु भक्तों के लिए कल्याणकारी और मृत्यु की भी मृत्यु करने वाले श्री नृसिंह महाविष्णु को बारम्बार प्रणाम करता हूँ।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

Mantra Background & Vedic Origin (मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छन्द-देवता)

भगवान श्री नरसिंह (नृसिंह) भगवान विष्णु के चौथे अवतार हैं, जिन्होंने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने और अधर्म के प्रतीक दैत्यराज हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को अवतार ग्रहण किया था। भगवान नृसिंह का स्वरूप अत्यंत उग्र एवं शक्तिशाली है, परंतु भक्तों के लिए वे अत्यंत करुणाकर और क्षिप्र-प्रसन्न होने वाले देवता हैं।

श्रीमद्भागवत पुराण, विष्णु पुराण तथा नृसिंह तापनीय उपनिषद् में इस दिव्य मंत्र का विशद वर्णन मिलता है। नृसिंह पूर्वतापनीय उपनिषद के अनुसार, यह मंत्र केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि समस्त वेदों का सार और एक संहारक तथा रक्षक 'महामंत्र' है। इस मंत्र को नृसिंह अनुष्टुप महामंत्र भी कहा जाता है, क्योंकि यह अनुष्टुप छंद में निबद्ध है जिसमें कुल 32 अक्षर (द्वात्रिंशदक्षर) होते हैं।

ऋषिरस्य ब्रह्मा, छन्दोऽनुष्टुप्, देवता श्रीनृसिंहः। बीजं क्ष्रौं, शक्तिः स्वाहा, कीलकं फट्।

वैदिक एवं तांत्रिक दोनों ही परंपराओं में इस मंत्र को 'अमोघ रक्षा कवच' माना गया है। जो साधक इस मंत्र का शास्त्रीय विधि से अनुष्ठान करता है, उसके जीवन में आध्यात्मिक रक्षा चक्र का निर्माण होता है जिसे भेद पाना किसी भी नकारात्मक शक्ति, भूत-प्रेत, डाकिनी-शाकिनी या शत्रु के लिए असंभव है।

Complete Sanskrit Mantra & Phonetic Transliteration (मूल शुद्ध मंत्र)

नृसिंह अनुष्टुप मंत्र के प्रत्येक अक्षर में असीम ऊर्जा निहित है। नीचे इस महामंत्र का शुद्ध देवनागरी एवं अंग्रेजी रूप दिया गया है:

मूल संस्कृत देवनागरी मंत्र

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥

मंत्र का बीज रूप (नृसिंह एकाक्षर/त्र्यक्षर मंत्र)

महामंत्र के साथ-साथ कई साधक बीज मंत्र का भी सम्पुट लगाते हैं:

ॐ क्ष्रौं नृसिंहाय नमः॥

Word-by-Word Meaning & Spiritual Bhavarth (पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ)

इस महामंत्र में 9 प्रमुख विशेषणों के माध्यम से भगवान नृसिंह के नौ अलौकिक गुणों एवं रूपों की स्तुति की गई है। नीचे इसका पद-दर-पद शास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत है:

संस्कृत पद शाब्दिक एवं आध्यात्मिक अर्थ
ॐ परमब्रह्म का प्रतीक, अनाहत नाद एवं सृष्टि का मूल उद्गम।
उग्रम् अत्यंत क्रोधित व रुद्र रूप धारण करने वाले (अधर्मियों के लिए परम भयानक)।
वीरम् परम पराक्रमी, सर्वशक्तिमान एवं अतुलित बल के सागर।
महाविष्णुम् सृष्टि के पालनकर्ता सर्वव्यापी परमेश्वर विष्णु।
ज्वलन्तम् अग्नि के समान प्रज्वलित, तेजोमय और स्व-प्रकाशित।
सर्वतोमुखम् जिनके मुख और दृष्टि सभी दिशाओं में हैं; सर्वद्रष्टा।
नृसिंहम् आधा मनुष्य और आधा सिंह रूप धारण करने वाले भगवान।
भीषणम् पापियों और दुष्ट शक्तियों के लिए अत्यंत डरावने।
भद्रम् भक्तों के लिए परम कल्याणकारी, शुभ एवं मंगलदाता।
मृत्युमृत्युम् मृत्यु की भी मृत्यु करने वाले; काल के भी काल (अमृतत्व प्रदाता)।
नमामि मैं नमन करता हूँ / प्रणाम करता हूँ।
अहम् मैं (साधक स्व-अहंकार त्यागकर सरणागत होता है)।

गहन आध्यात्मिक भावार्थ

हे प्रभु! आप अति उग्र और परम पराक्रमी हैं। आप महाविष्णु के रूप में सर्वव्यापी हैं और आपका तेज प्रज्वलित अग्नि के समान दसों दिशाओं को प्रकाशित कर रहा है। आपका मुख हर ओर है और आप सब कुछ देख रहे हैं। आप नृसिंह रूप में प्रकट होकर दुष्टों के लिए अति भीषण और डरावने हैं, परंतु अपने शरणागत भक्तों के लिए परम मंगलकारी (भद्र) हैं। आप मृत्यु के भी काल हैं अर्थात अकाल मृत्यु और यमराज के भय का नाश करने वाले हैं। ऐसे भगवान श्री नृसिंह के चरणों में मैं (साधक) अपना सर्वस्व समर्पित करते हुए बारम्बार प्रणाम करता हूँ।

Viniyoga, Nyasa & Dhyana Vidhi (विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक)

किसी भी वैदिक या तांत्रिक मंत्र के पूर्ण फल हेतु विनियोग, करन्यास, अंगन्यास एवं ध्यान का विधान शास्त्रों में अनिवार्य बताया गया है।

१. विनियोग

दाहिने हाथ में जल लेकर निम्नलिखित वाक्य का उच्चारण करें और जल भूमि पर छोड़ दें:

ॐ अस्य श्रीनृसिंह अनुष्टुप् महामन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीनृसिंहो देवता, क्ष्रौं बीजम्, स्वाहा शक्तिः, फट् कीलकम्, श्रीनृसिंह प्रीत्यर्थे (तथा सर्व-रक्षा सिद्ध्यर्थे) जपे विनियोगः।

२. करन्यास

मंत्र की ऊर्जा को हाथों की उंगलियों में स्थापित करने के लिए करन्यास करें:

  • ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं अंगुष्ठाभ्यां नमः। (दोनों अंगूठों को छुएं)
  • ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् तर्जनीभ्यां नमः। (तर्जनी उंगली को छुएं)
  • नृसिंहं भीषणं भद्रं मध्यमाभ्यां नमः। (मध्यमा उंगली को छुएं)
  • मृत्युमृत्युं अनामिकाभ्यां नमः। (अनामिका उंगली को छुएं)
  • नमाम्यहम् कनिष्ठिकाभ्यां नमः। (कनिष्ठिका उंगली को छुएं)
  • ॐ क्ष्रौं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। (हथेलियों के आगे-पीछे का स्पर्श करें)

३. अंगन्यास

  • ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं हृदयाय नमः। (हृदय को छुएं)
  • ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् शिरसे स्वाहा। (सिर को छुएं)
  • नृसिंहं भीषणं भद्रं शिखायै वषट्। (शिखा को छुएं)
  • मृत्युमृत्युं कवचाय हुम्। (दोनों भुजाओं को क्रॉस करके कंधों को छुएं)
  • नमाम्यहम् नेत्रत्रयाय वौषट्। (दोनों नेत्रों एवं त्रिकुटी को छुएं)
  • ॐ क्ष्रौं अस्त्राय फट्। (दाहिने हाथ की उंगलियों से बाएं हाथ की हथेली पर ताली बजाएं)

४. ध्यान श्लोक

न्यास के पश्चात भगवान नृसिंह के दिव्य रूप का हृदय में ध्यान करें:

ध्यायेन्नृसिंहं तरुणार्कभासं विदारिताशांबरमंतकांतम्।
दंष्ट्राकरालं पृथुदीर्घजिह्वं नखैर्विदीर्णासुरवक्षःस्थलम्॥

सत्यज्ञानसुखानन्दमात्रमेकमजं विभुम्।
सर्वगं सर्वभूतस्थं वंदे श्रीनृकेसरिणम्॥

ध्यान का अर्थ: जो बाल-सूर्य के समान तेजस्वी हैं, जिनका मुख दिशाओं को भी लांघता हुआ प्रतीत होता है, जो अंतक (काल) का भी अंत करने वाले हैं, जिनके विशाल दंत और लंबी जिह्वा उग्र प्रतीत होती है तथा जिन्होंने अपने तीखे नखों से असुर (हिरण्यकशिपु) का वक्षस्थल विदीर्ण कर दिया है—उन सत्य, ज्ञान और सुख-आनंद स्वरूप, अजन्मा, सर्वव्यापी भगवान श्री नृसिंह को मैं नमन करता हूँ।

Sacred Chanting Rules, Rosary & Best Auspicious Timing (जप विधि व नियम)

श्री नरसिंह मंत्र का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक है:

  1. सर्वोत्तम समय : प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4:00 से 6:00 बजे) या सायं काल (संध्या समय)। नृसिंह जयंती, स्वाति नक्षत्र, शनिवार या मंगलवार के दिन से इस जप का प्रारंभ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  2. आसन व दिशा (Direction & Seating): उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। लाल वस्त्र का या कुश का आसन सर्वोत्तम होता है।
  3. माला चयन : जप के लिए तुलसी की माला सर्वश्रेष्ठ है। यदि तुलसी उपलब्ध न हो तो कमलगट्टे की माला या स्फटिक माला का प्रयोग भी किया जा सकता है।
  4. दीप एवं धूप (Lamp & Incense): भगवान नृसिंह के समक्ष शुद्ध देशी गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। लाल पुष्प (जैसे गुड़हल या गुलाब) और तुलसी पत्र अवश्य अर्पित करें।
  5. जप संख्या : नित्य साधना में 108 बार (1 माला) जप करें। किसी विशेष संकट से मुक्ति या सिद्धि के लिए 11 दिन या 40 दिन का अनुष्ठान कर प्रतिदिन 11, 21 या 108 माला का नियम लें।

Specific Spiritual & Material Benefits (विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति)

नृसिंह अनुष्टुप मंत्र का नित्य पाठ करने से साधक को लौकिक और अलौकिक दोनों प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं:

  • अमोघ रक्षा कवच : यह मंत्र साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा घेरा बना देता है, जिससे भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, मूठ, अभिचार और ऊपरी बाधाएं निष्प्रभावी हो जाती हैं।
  • शत्रु बाधा से मुक्ति : यह मंत्र गुप्त एवं प्रकट शत्रुओं के षड्यंत्रों का नाश करता है। मुकदमे, कोर्ट-कचहरी और विवादों में विजय प्रदान करता है।
  • भय व अवसाद का नाश (Overcoming Fear & Anxiety): अकारण भय, दुःस्वप्न, मानसिक तनाव और अवसाद से पीड़ित व्यक्तियों के लिए यह मंत्र रामबाण औषधि है।
  • अकाल मृत्यु व रोग मुक्ति (Health & Longevity): 'मृत्युमृत्युं' शब्द के प्रभाव से यह असाध्य रोगों, विषैले जीव-जंतुओं के भय और अकाल मृत्यु से रक्षा करता है।
  • ग्रह दोष शांति : विशेष रूप से राहू, केतु और शनि ग्रह के उग्र प्रभावों को शांत करने में श्री नृसिंह मंत्र अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।
  • आध्यात्मिक उन्नति : यह मंत्र साधक के भीतर आत्मबल, निर्भयता, ओज और आज्ञा चक्र की जागृति में सहायक होता है।

Important Precautions & Dos and Don'ts (सावधानियां एवं नियम)

भगवान नृसिंह का मंत्र उग्र कोटि का मंत्र है, इसलिए साधना के दौरान कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए:

  • सात्विकता अनिवार्य: साधना काल के दौरान पूर्णतः सात्विक आहार लें। लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा और किसी भी प्रकार के नशे से सख्त परहेज करें।
  • ब्रह्मचर्य पालन: विशेष अनुष्ठान के दौरान काया, वाचा और मन से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन अनिवार्य है।
  • शुद्ध उच्चारण: अनुष्टुप छंद के 32 अक्षरों का उच्चारण एकदम शुद्ध होना चाहिए। अशुद्ध उच्चारण से बचें; यदि उच्चारण कठिन लगे तो पहले मंत्र को ध्यान से सुनें व अभ्यास करें।
  • क्रोध पर नियंत्रण: नृसिंह साधना के दौरान साधक को अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए और किसी का अनिष्ट या बुरा नहीं सोचना चाहिए।
  • नारी सम्मान: घर तथा समाज में स्त्रियों का पूर्ण सम्मान करें, क्योंकि जहाँ नारी का अपमान होता है वहाँ नृसिंह कृपा रुक जाती है।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
सर्व-शत्रु विनाश, तंत्र-मंत्र बाधा मुक्ति, भय का नाश, रोग एवं अकाल मृत्यु से अमोघ रक्षा
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
पूर्ण सात्विकता, ब्रह्मचर्य का पालन, मांसाहार एवं मदिरा का त्याग और शुद्ध उच्चारण अत्यंत आवश्यक है।

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप ब्रह्म मुहूर्त, संध्या काल या नृसिंह जयंती में तुलसी माला या कमलगट्टे की माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!