मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन वैदिक संस्कृति में महामृत्युंजय मंत्र को वेदों का हृदय तथा ‘मृतसंजीवनी विद्या’ का मूल स्तंभ माना गया है। यह दिव्य मंत्र यजुर्वेद के अंतर्गत शुक्ल यजुर्वेद के वाजसनेयी संहिता (अध्याय 3, मंत्र 60) तथा ऋग्वेद (मंडल 7, सूक्त 59, मंत्र 12) दोनों में प्राप्त होता है। इस महामंत्र के द्रष्टा ऋषि महर्षि वशिष्ठ हैं। इसके छंद का नाम ‘अनुष्टुप’ है और इसके अधिष्ठाता देवता त्रिनेत्रधारी भगवान रुद्र यानी देवाधिदेव महादेव शिव हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंत्र की रचना और सिद्धि सर्वप्रथम महर्षि मार्कण्डेय ने की थी। जब यमराज उनके प्राण लेने आए, तब उन्होंने महामृत्युंजय मंत्र और भगवान शिव की महालिंग अर्चना के बल पर महाकाल पर भी विजय प्राप्त कर ली थी। तभी से यह मंत्र भक्तों के लिए अकाल मृत्यु, भयानक रोगों, दुर्घटनाओं और प्राणघातक संकटों से रक्षा करने वाला महाकवच बन गया है।
मूल शुद्ध मंत्र
मंत्र का पाठ करते समय प्रत्येक स्वर, मात्रा और हलंत का विशेष ध्यान रखना चाहिए। वैदिक मंत्रों की शक्ति उनके शुद्ध उच्चारण में ही निहित होती है।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र के प्रत्येक शब्द का अपने आप में गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ है। आइए इसे पद-दर-पद समझते हैं:
- ॐ: यह संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल नाद, प्रणव मंत्र और परमात्मा का सर्वोच्च निर्गुणाकार प्रतीक है।
- त्र्यम्बकम्: त्र्यम्बक का अर्थ है तीन नेत्रों वाले। यहाँ तीन नेत्र भगवान शिव के तीन गुणों (सत्, रज, तम), तीन कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) और तीन लोकों (स्वर्ग, मर्च, पाताल) के स्वामी होने का बोध कराते हैं।
- यजामहे: हम उनकी पूजा करते हैं, उनका ध्यान करते हैं, उनके प्रति अपनी अगाध श्रद्धा अर्पित करते हैं।
- सुगन्धिम्: सुगंधित, अर्थात जिनकी कीर्ति, ज्ञान, करुणा और आभा संपूर्ण ब्रह्मांड में सर्वत्र सुगंध की भांति फैली हुई है।
- पुष्टिवर्धनम्: जो केवल भौतिक जगत का ही नहीं, अपितु हमारी आध्यात्मिक चेतना, बल, बुद्धि और ऊर्जा का संवर्धन और पोषण करते हैं।
- उर्वारुकमिव: ‘उर्वारुक’ का अर्थ ककड़ी (खरबूजा) होता है। जिस प्रकार एक पकी हुई ककड़ी अपनी बेल (लता) के बंधन से सहज ही अलग हो जाती है।
- बन्धनात्: संसार के मोह-माया, कर्म बंधनों, अज्ञान और मृत्यु के भय से।
- मृत्योर्मुक्षीय: हमें मृत्यु के भय से और इस भवसागर के दुखों से मुक्त करें।
- माऽमृतात्: और हमें अमृतत्व (मोक्ष, अमरता और दिव्यता) से वंचित न रखें, अर्थात हमें मोक्ष प्रदान करें।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
किसी भी अनुष्ठानिक और फलदायी जप से पूर्व विनियोग और ध्यान करना अनिवार्य माना गया है। इससे मंत्र की ऊर्जा केंद्रित होती है।
विनियोग
अस्य श्री महामृत्युंजय मंत्रस्य वशिष्ठ ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, रुद्रो देवता, ॐ बीजं, जः शक्तिः, सः कीलकम्, मम समस्तारिष्ट शान्त्यर्थे जप विनियोगः।
ध्यान श्लोक
हस्ताभ्याम् कलशं दधानममृतोपेतं मृगांक प्रभां,
गौरीशं जटिनं त्रिनेत्रमनिशं वन्दे मुकुन्दप्रियम।
व्याघ्रत्वक् परितो वृतं गिरिजया सेव्यमानं सदा,
मृत्युघ्नं च महेश्वरं भवहरं ध्यायेद् सदा शंकरम्॥
इस ध्यान श्लोक का अर्थ है कि हम उन भगवान शंकर का ध्यान करते हैं जो हाथों में अमृत कलश धारण किए हुए हैं, जिनकी प्रभा चंद्रमा के समान शीतल है, जो जटाधारी, त्रिनेत्रधारी, माता पार्वती द्वारा सेवित और मृत्यु के भय को हरने वाले महामृत्युंजय हैं।
जप विधि व नियम
महामृत्युंजय मंत्र के पूर्ण आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिए इसे विधि-विधान से जपना चाहिए:
- स्थान का चयन: प्रातः काल स्नान करके अपने घर के ईशान कोण में या किसी पवित्र शिव मंदिर में शुद्ध आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
- माला का चयन: रुद्राक्ष की माला इस मंत्र के जप के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। स्फटिक या तुलसी की माला का प्रयोग भी किया जा सकता है।
- संकल्प: जप शुरू करने से पहले अपने मन में अभीष्ट कामना या आरोग्य की प्रार्थना करते हुए जल हाथ में लेकर संकल्प लें।
- जप संख्या: सामान्य दिनों में प्रतिदिन 1 माला (108 बार) का जप उत्तम है। विशेष संकट या अनुष्ठान के समय संकल्प लेकर 11, 21 या सवा लाख जप अनुष्ठान ब्राह्मणों के सान्निध्य में किया जाता है।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
महामृत्युंजय मंत्र के नियमित और विधिपूर्वक जप से साधक को जीवन में अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं:
- अकाल मृत्यु का निवारण: यह मंत्र साधक के जीवन से सभी प्रकार की दुर्घटनाओं, अकाल मृत्यु और भयानक आपदाओं के योग को टालता है।
- दीर्घायु और आरोग्य: गंभीर से गंभीर शारीरिक बीमारियां, असाध्य रोग और मानसिक तनाव इस मंत्र की ऊर्जा से दूर होने लगते हैं।
- कर्म बंधनों से मुक्ति: यह मंत्र व्यक्ति को भवसागर के मोह, पाप और नकारात्मक कर्मों के बंधनों से मुक्त करता है।
- मानसिक शांति और भयमुक्ति: अज्ञात भय, घबराहट, डिप्रेशन और अनिद्रा जैसी समस्याओं में अभूतपूर्व मानसिक शांति मिलती है।
सावधानियां एवं नियम
महामृत्युंजय मंत्र एक अत्यंत जागृत और तीव्र ऊर्जा वाला वैदिक मंत्र है, इसलिए इसके जप में कुछ विशेष नियमों का पालन करना आवश्यक है:
- जप के दौरान पूर्ण सात्विकता, शुद्धता और ब्रह्मचर्य का पालन करें। मांस, मदिरा और तामसिक भोजन का त्याग अत्यंत आवश्यक है।
- उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए। मन ही मन जप (मानसिक जप) करना सबसे उत्तम और अचूक माना गया है।
- जप करते समय माला को गोमुखी के अंदर रखें और तर्जनी उंगली से माला का स्पर्श न होने दें।
- नियमित रूप से एक ही समय और एक ही स्थान पर बैठकर जप करने से मंत्र सिद्ध और अत्यधिक प्रभावशाली बनता है।