मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन वैदिक संस्कृति में महामृत्युंजय मंत्र को वेदों का हृदय तथा सबसे शक्तिशाली संजीवनी मंत्र माना गया है। यह दिव्य मंत्र यजुर्वेद के रुद्रीय सूक्त (वाजसनेयी संहिता 3.60) और ऋग्वेद में भी प्राप्य है। इस महामृत्युंजय मंत्र के द्रष्टा ऋषि महर्षि वशिष्ठ हैं। इस मंत्र का छंद 'त्रुष्टुप' है और इसके देवता देवाधिदेव महादेव भगवान शिव (रुद्र) हैं। इस मंत्र को 'मृतसंजीवनी विद्या' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है मृत व्यक्ति में भी प्राण फूंक देने की क्षमता रखने वाली परम विद्या।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि मृकण्डु के पुत्र मारकण्डेय जी की अल्पायु थी। उनके पिता ने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके इस महामृत्युंजय मंत्र की दीक्षा प्राप्त की थी। जब यमराज मारकण्डेय के प्राण लेने आए, तब बालक मारकण्डेय ने शिवलिंग से लिपटकर इस महामृत्युंजय मंत्र का सस्वर और अनन्य भाव से जप किया। उनकी भक्ति और मंत्र के प्रभाव से स्वयं भगवान महाकाल प्रकट हुए और यमराज को वापस लौटना पड़ा। तभी से इस मंत्र को कालजयी मंत्र और महामृत्युंजय के रूप में प्रतिष्ठा मिली।
मूल शुद्ध मंत्र एवं लिपिबद्ध उच्चारण
मंत्र साधना में शुद्धता का अत्यधिक महत्व है। महामृत्युंजय मंत्र का मूल वैदिक रूप निम्नलिखित है:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
इस मंत्र के प्रत्येक शब्द का उच्चारण शुद्ध होना चाहिए। 'त्र्यम्बकं' में 'त्र्यम्' का उच्चारण नाक और गले के समन्वय से होना चाहिए। 'सुगन्धिं' में अनुस्वार का सही प्रयोग तथा 'उर्वारुकमिव' में दीर्घ स्वरों का उचित आरोह-अवरोह साधक की ऊर्जा को जागृत करता है।
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
महामृत्युंजय मंत्र का प्रत्येक पद अपने आप में अगाध आध्यात्मिक रहस्यों को समेटे हुए है। आइए इस मंत्र के प्रत्येक शब्द का अर्थ गहराई से समझें:
- ॐ: यह संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल नाद, प्रणव अक्षर और सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा का प्रतीक है।
- त्र्यम्बकं: तीन नेत्रों वाले भगवान शिव (अग्नि, सूर्य और चंद्रमा रूपी तीन नेत्रों के धारक, अथवा भूत, भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता)।
- यजामहे: हम उनकी पूजा करते हैं, उनका ध्यान करते हैं, उनका अर्चन व वंदन करते हैं।
- सुगन्धिं: जो समस्त ब्रह्मांड में अपनी दिव्य सुगंध (कीर्ति, यश, ज्ञान और गुणों की महक) फैला रहे हैं।
- पुष्टिवर्धनम्: जो समस्त प्राणियों, वनस्पतियों और जगत का पोषण करते हैं, और आध्यात्मिक तथा भौतिक शक्ति को बढ़ाते हैं।
- उर्वारुकमिव: जिस प्रकार एक ककड़ी (उर्वारुक) अपनी लता (बेत बेल) से पक जाने पर स्वतः बिना कष्ट के अलग हो जाती है।
- बन्धनात्: संसार के समस्त सांसारिक बंधनों, कर्म-फलों और जन्म-मृत्यु के चक्र से।
- मृत्योर्मुक्षीय: हमें मृत्यु के भय से, अकाल मृत्यु से और दुखों से मुक्त करें।
- माऽमृतात्: और हमें अमृतत्व (मोक्ष, दिव्यता और अमर चैतन्य) से विमुक्त न करें, अर्थात हमें अमरता का बोध कराएं।
इस प्रकार इस संपूर्ण मंत्र का भाव यह है कि हम भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि वे हमें संसार रूपी मोह-माया और बंधनों से ऐसे मुक्त करें जैसे ककड़ी पकने के बाद बेल से सहज ही अलग हो जाती है, न कि बलपूर्वक तोड़ने से। हमें मृत्यु के भय से मुक्त करके शाश्वत अमृत (मोक्ष) की प्राप्ति करवाएं।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
किसी भी वेदोक्त मंत्र के जप से पूर्व विनियोग और न्यास करना अनिवार्य माना जाता है, जिससे मंत्र की शक्ति केंद्रित होती है।
विनियोग
दाएं हाथ में जल लेकर निम्नलिखित विनियोग का पाठ करें और जल को जमीन पर छोड़ दें:
अस्यू श्री महामृत्युंजय मंत्रस्य वशिष्ठ ऋषिः, त्रिष्टुप छन्दः, रुद्रो देवता, ॐ बीजम्, जः शक्तिः, सः कीलकम्, मम समस्त रोग-शोक-निवारणाय आयुः-पुष्टि-तुष्टि-प्रसिद्ध्यर्थे महामृत्युंजय मंत्र जपे विनियोगः।
ऋष्यादि न्यास
- ॐ वशिष्ठ ऋषये नमः (शिरसि)
- ॐ त्रिष्टुप छन्दसे नमः (मुखे)
- ॐ रुद्रो देवतायै नमः (हृदि)
- ॐ बीजाय नमः (गुह्ये)
- ॐ शक्तये नमः (पादयोः)
- ॐ कीलकाय नमः (सर्वांगे)
ध्यान श्लोक
जप से पूर्व भगवान शिव का यह ध्यान करना चाहिए:
हं साभ्यां करुणाकरं मृगयुतं नेत्रत्रयोद्भासितं,
भस्मांगं शशिनं किरीटममलं मुक्ताफलं मण्डितम्।
उर्वारुकफलप्रसूनधवलं ध्यायेत् कपर्दीश्वरं,
मृत्युंजयमहर्निशं प्रणमतां मुक्तिप्रदं शङ्करम्॥
इसका अर्थ है: जो करुणा के सागर हैं, जिनके हाथ में मृग मुद्रा है, जिनके तीन नेत्र प्रदीप्त हैं, जिनके शरीर पर भस्म लगी है, मस्तक पर चंद्रमा और मुकुट सुशोभित है, जो ककड़ी के फूल के समान श्वेत वर्ण वाले जटाधारी हैं, ऐसे मृत्युंजय भगवान शंकर को हम प्रणाम करते हैं जो भक्तों को मुक्ति प्रदान करते हैं।
जप विधि व नियम
महामृत्युंजय मंत्र का जप अत्यधिक अनुशासन और पवित्रता की मांग करता है।
- समय: सर्वोत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) है। इसके अतिरिक्त प्रदोष काल (संध्या के समय) या रात्रि के पहर में भी इसका जप किया जा सकता है।
- स्थान: पूजा घर, किसी शांत पवित्र मंदिर, या नदी के तट पर बैठकर जप करना श्रेष्ठ है। आसन कुशा या ऊनी होना चाहिए।
- दिशा: जप करते समय साधक का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। यदि आरोग्य और आयु की कामना हो तो उत्तर दिशा की ओर मुख भी उत्तम माना गया है।
- रुद्राक्ष माला: इस मंत्र का जप हमेशा पंचमुखी रुद्राक्ष की शुद्ध माला से ही करना चाहिए। माला में 108 मनके होने चाहिए। सुमेरु को लांघा नहीं जाता।
- जप संख्या: सामान्य दिनों में प्रतिदिन 1 माला (108 बार) या 5 माला का जप करना चाहिए। विशेष अनुष्ठान में सवा लाख (1,25,000) जप का विधान है जिसे निश्चित दिनों में पूरा किया जाता है।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
महामृत्युंजय मंत्र के नियमित और अनुशासित जप से साधक को अनेक आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- अकाल मृत्यु से रक्षा: यह मंत्र यमराज के भय को भी टालने में सक्षम माना गया है। गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों के लिए यह संजीवनी का कार्य करता है।
- आरोग्य और दीर्घायु: शारीरिक ऊर्जा का संतुलन होता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और पुराने से पुराने शारीरिक कष्टों में आराम मिलता है।
- कर्म बंधन से मुक्ति: यह मंत्र पिछले जन्मों के बुरे कर्मों (प्रारब्ध) के प्रभावों को क्षीण करता है और मानसिक शांति प्रदान करता है।
- नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर और आसपास की नकारात्मक ऊर्जा, बुरी नजर, तंत्र-मंत्र के प्रभाव और भय का नाश होता है।
- आध्यात्मिक चेतना का विकास: कुंडलिनी जागरण और चक्रों के संतुलन में यह मंत्र अत्यंत सहायक है। चित्त शांत और स्थिर रहता है।
सावधानियां एवं नियम
महामृत्युंजय मंत्र एक अत्यंत प्रभावी महामंत्र है, इसलिए इसकी साधना में कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
- जप के दौरान पूर्ण सात्विकता (शाकाहारी भोजन, लहसुन-प्याज का त्याग) का पालन करें।
- ब्रह्मचर्य नियमों का कड़ाई से पालन करें।
- उच्चारण में स्पष्टता होनी चाहिए; मंत्र का अपमान या अशुद्ध उच्चारण अनर्थकारी हो सकता है।
- जप के समय मन को भटकाएं नहीं, एकाग्रचित्त होकर भगवान शिव की ज्योति का ध्यान करें।
- क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और झूठ बोलने से बचें।