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माँ महालक्ष्मी कृपा · मां पार्वती Mantra

मां स्वयंवर पार्वती सिद्ध मंत्र - ॐ ह्रीं योगिनि योगेश्वरी: मनचाहा जीवनसाथी एवं शीघ्र विवाह साधना

मां स्वयंवर पार्वती सिद्ध मंत्र (ॐ ह्रीं योगिनि योगेश्वरी) द्वारा मनचाहा जीवनसाथी एवं शीघ्र विवाह की संपूर्ण वैदिक व तांत्रिक साधना विधि जानें।

इष्ट देव मां पार्वती
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय ब्रह्म मुहूर्त या प्रदोष काल
अनुशंसित माला स्फटिक या रुद्राक्ष माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ ह्रीं योगिनि योगेश्वरी योगेश्वरी योग भयङ्करि सकल स्थावरजङ्गमस्य मुखहृदयं मम वशं आकर्षय आकर्षय नमः स्वाहा
सरल हिंदी भावार्थ:

हे योगिनियों की स्वामिनी, योगेश्वरी और समस्त चराचर जगत को आकर्षित करने वाली माता पार्वती, मेरे मन की कामना पूर्ण करें और योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति कराएं।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

सनातन वैदिक संस्कृति में विवाह को केवल दो शरीरों का मिलन नहीं, बल्कि दो आत्माओं का एक पवित्र और आध्यात्मिक अनुबंध माना गया है। सोलह संस्कारों में विवाह संस्कार का स्थान सर्वोच्च है। कई बार जातकों की कुंडली में ग्रहों की प्रतिकूल स्थिति, मांगलिक दोष, पितृ दोष अथवा अन्य बाधाओं के कारण विवाह में अत्यधिक विलंब होता है या योग्य वर-वधू की तलाश में अड़चनें आती हैं। ऐसे समस्त संकटों के निवारण के लिए आदि शक्ति जगदम्बा मां पार्वती की साधना को सबसे शक्तिशाली और अचूक उपाय माना गया है। मां पार्वती ने स्वयं भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी और स्वयंवर के माध्यम से उन्हें प्राप्त किया था। यही कारण है कि उन्हें 'स्वयंवर पार्वती' के रूप में पूजा जाता है।

इस दिव्य मंत्र का उद्गम सीधे तौर पर शाक्त परंपरा और तांत्रिक ग्रंथों से जुड़ा हुआ है। इस मंत्र के ऋषि भगवान शिव स्वयं हैं, छंद 'अनुष्टुप' या 'बृहती' है, तथा इसकी अधिष्ठात्री देवी स्वयं उमा-महेश्वर यानी मां पार्वती और भगवान शिव हैं। इस साधना के माध्यम से साधक अपने भीतर आकर्षण शक्ति (चुम्बकीय ऊर्जा) को जागृत करता है, जिससे ब्रह्मांडीय सकारात्मक ऊर्जाएं उसके अनुकूल हो जाती हैं और उसके जीवन में योग्य जीवनसाथी का मार्ग प्रशस्त होता है।

Complete Sanskrit Mantra & Phonetic Transliteration (मूल शुद्ध मंत्र)

साधना के लिए मंत्र का उच्चारण पूर्णतः शुद्ध और स्पष्ट होना चाहिए। नीचे मां स्वयंवर पार्वती का मूल सिद्ध मंत्र देवनागरी लिपि और उसके अंग्रेजी लिप्यंतरण में दिया जा रहा है:

मूल संस्कृत मंत्र:
ॐ ह्रीं योगिनि योगेश्वरी योगेश्वरी योग भयङ्करि सकल स्थावरजङ्गमस्य मुखहृदयं मम वशं आकर्षय आकर्षय नमः स्वाहा॥
इंग्लिश लिप्यंतरण :
Om Hrim Yogini Yogeshwari Yogeshwari Yoga Bhayankari Sakala Sthavarajangamasya Mukharhridayam Mama Vasham Akarshaya Akarshaya Namah Svaha॥

Word-by-Word Meaning & Spiritual Bhavarth (पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ)

मंत्र के प्रत्येक शब्द का अपना विशेष ऊर्जावान अर्थ होता है। जब साधक अर्थ को समझकर मंत्र का जप करता है, तो उसका प्रभाव हजार गुना बढ़ जाता है:

  • ॐ: प्रणव मंत्र, ब्रह्मांड की मूल ध्वनि और सृष्टिकर्ता परमेश्वर का प्रतीक।
  • ह्रीं: माया बीज मंत्र, जो मां भुवनेश्वरी और मां पार्वती की शक्ति का प्रतीक है, यह आकर्षण और सृजन का बीज है।
  • योगिनि: योग की सिद्धियों को देने वाली और योगिनियों की स्वामिनी।
  • योगेश्वरी: योग और ईश्वरीय शक्तियों की सर्वोच्च अधीश्वर।
  • योग भयङ्करि: योग साधना के मार्ग में आने वाले सभी भयों और बाधाओं का नाश करने वाली।
  • सकल स्थावरजङ्गमस्य: इस संपूर्ण चराचर जगत में स्थित सभी स्थिर (स्थावर) और गतिशील (जंगम) प्राणियों के।
  • मुखहृदयं: सबके मुख और हृदय को।
  • मम वशं: मेरे अनुकूल, मेरे वशीभूत या मेरी सकारात्मक ऊर्जा से आकर्षित करने वाली।
  • आकर्षय आकर्षय: अपनी ओर खींचें, मेरे लिए अनुकूलता लाएं (दो बार दोहराना तीव्रता का प्रतीक है)।
  • नमः स्वाहा: माता को आदरपूर्वक प्रणाम और आहुति समर्पित है।

भावार्थ: हे योगिनियों की ईश्वरी मां पार्वती! आप इस संपूर्ण चराचर जगत की ऊर्जा को नियंत्रित करती हैं। मेरे जीवन में विवाह और योग्य जीवनसाथी प्राप्ति से जुड़ी समस्त बाधाओं को दूर करें तथा मेरे लिए ब्रह्मांडीय अनुकूलता और आकर्षण पैदा करें, जिससे मुझे मेरे मन के अनुकूल सुयोग्य जीवनसाथी प्राप्त हो सके।

Viniyoga, Nyasa & Dhyana Vidhi (विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक)

किसी भी मंत्र के अनुष्ठान से पहले उसका विनियोग और न्यास करना अनिवार्य होता है ताकि शरीर और मन को पवित्र कर ऊर्जा को केन्द्रित किया जा सके।

विनियोग

दाएं हाथ में जल लेकर विनियोग मंत्र बोलें और जल को जमीन पर छोड़ दें:

विनियोग मंत्र:
अस्य श्री स्वयंवर पार्वती मंत्रस्य महर्षि विश्वामित्र ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, माता पार्वती देवता, ह्रीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, मम अभीष्ट विवाह सिद्धयर्थे जपे विनियोगः॥

ध्यान श्लोक

मंत्र जप आरंभ करने से पहले मां पार्वती के इस रूप का मानसिक ध्यान करना चाहिए:

ध्यान मंत्र:
बालार्कयुतिमिन्दुशेखरमन्दारप्रसूनस्रजं
रत्नाभरणभूषितां प्रियतया आलिंगितां शङ्करम्।
वामे भागे स्थितां गौरीं वरदाभयपाणिनीं,
सर्वमङ्गलकारिणिं भजतु तां वाञ्छितार्थप्रदाम्॥

अर्थ: उगते हुए सूर्य के समान जिनकी कांति है, मस्तक पर चंद्रमा का मुकुट है, मन्दार के फूलों की माला धारण किए हुए हैं, रत्नों के आभूषणों से सुसज्जित हैं, जो भगवान शिव के वाम भाग में विराजमान हैं और वरद-अभय मुद्रा धारण किए हुए हैं, उन सर्वमंगलकारिणी मां गौरी का मैं ध्यान करता/करती हूँ, जो सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।

Sacred Chanting Rules, Rosary & Best Auspicious Timing (जप विधि व नियम)

इस साधना की सफलता के लिए नीचे दिए गए नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए:

  • शुभ मुहूर्त: इस साधना को शुक्ल पक्ष के किसी भी सोमवार, प्रदोष व्रत, या गौरी-तृतीयल (हरियाली तीज) के दिन से आरंभ करना चाहिए। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (4:00 से 6:00 बजे) या प्रदोष काल (संध्या समय) सबसे उत्तम माना गया है।
  • माला का चयन: स्फटिक माला या रुद्राक्ष की माला का उपयोग करना चाहिए। यह माला पूर्णतः सिद्ध और प्राणप्रतिष्ठित होनी चाहिए।
  • आसन एवं दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें। सामने लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मां पार्वती और भगवान शिव की संयुक्त मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  • पूजन सामग्री: माता को लाल फूल (विशेषकर गुलाब या गुड़हल), सिंदूर, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • जप संख्या: प्रतिदिन कम से कम 11 माला (108 दाने की माला के हिसाब से 1188 बार) का जप करें। 21 दिनों या 41 दिनों का अनुष्ठान सबसे प्रभावी माना जाता है।

Specific Spiritual & Material Benefits (विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति)

मां स्वयंवर पार्वती के इस सिद्ध मंत्र के नियमित और अनुशासित जप से साधक को निम्नलिखित आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • शीघ्र विवाह का योग: जिन जातकों के विवाह में अत्यधिक विलंब हो रहा है, उनके मार्ग की समस्त बाधाएं दूर होती हैं और शीघ्र विवाह के योग बनते हैं।
  • मनचाहा जीवनसाथी: साधक या साधिकिका को उसकी इच्छा के अनुरूप सुशिक्षित, संस्कारी और योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
  • वैवाहिक जीवन की मधुरता: जिन दंपत्तियों के वैवाहिक जीवन में कलह, मतभेद या अलगाव की स्थिति है, उनके संबंधों में प्रगाढ़ता और प्रेम बढ़ता है।
  • मांगलिक एवं ग्रह दोष शांति: कुंडली में मौजूद मांगलिक दोष, नाड़ी दोष या सप्तम भाव की कमजोरियों का नकारात्मक प्रभाव क्षीण होता है।
  • आत्मबल और आकर्षण में वृद्धि: इस मंत्र के निरंतर जप से व्यक्ति के औरा में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे उसका व्यक्तित्व आकर्षक बनता है।

Important Precautions & Dos and Don'ts (सावधानियां एवं नियम)

साधना काल के दौरान निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखें:

  • सात्विकता: साधना के दिनों में पूर्ण सात्विक आहार (प्याज, लहसुन, तामसिक भोजन का त्याग) का पालन करें।
  • ब्रह्मचर्य: शारीरिक और मानसिक रूप से ब्रह्मचर्य का कठोरता से पालन करें।
  • शुचिता: प्रतिदिन स्नान करके स्वच्छ, विशेषकर लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण कर ही जप करें।
  • नियमितता: संकल्पित दिनों की संख्या (जैसे 21 या 41 दिन) के बीच में क्रम टूटना नहीं चाहिए। यदि किसी कारणवश बाधा आए, तो संकल्प के अनुसार आगे बढ़ाएं।
  • गोपनीयता: अपनी साधना और मंत्र जप की बात किसी को न बताएं, साधना को गुप्त रखने से उसकी ऊर्जा में वृद्धि होती है।

इस साधना से संबंधित कुछ सामान्य प्रश्न और उनके उत्तर नीचे दिए गए हैं:

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
शीघ्र विवाह, मनचाहा जीवनसाथी, वैवाहिक जीवन की बाधाओं का निवारण
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
पूर्ण सात्विकता, ब्रह्मचर्य पालन और शुद्धता अनिवार्य है

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप ब्रह्म मुहूर्त या प्रदोष काल में स्फटिक या रुद्राक्ष माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
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