मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन हिंदू धर्म और शाक्त परंपरा में भगवती महामाया आदिशक्ति माँ दुर्गा की उपासना का सर्वोच्च स्थान है। मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत आने वाली विश्वप्रसिद्ध 'श्री दुर्गा सप्तशती' (चंडी पाठ) एक ऐसा अलौकिक ग्रंथ है, जिसका प्रत्येक श्लोक एक मंत्र के समान चैतन्य और ऊर्जावान है। दुर्गा सप्तशती के पाठ का मुख्य आधार और प्राण 'नवार्ण मंत्र' को माना जाता है। नवार्ण का शाब्दिक अर्थ होता है - 'नौ अक्षरों (वर्णों) से बना हुआ मंत्र'। यह महामंत्र कुल नौ शक्तिशाली अक्षरों से मिलकर बना है, जो माँ दुर्गा की नौ अलग-अलग शक्तियों (नवदुर्गा) का प्रतिनिधित्व करता है।
वैदिक ज्योतिष और तंत्र शास्त्र के अनुसार, इस महामंत्र के ऋषि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं। इसके छंद 'गायत्री', 'उष्णिह्' और 'अनुष्टुप' हैं, तथा इस महामंत्र की अधिष्ठात्री देवता महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती स्वरूपा साक्षात् भगवती दुर्गा हैं। इस मंत्र के माध्यम से साधक अपने शरीर के नौ द्वारों को शुद्ध करते हुए कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करता है और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ अपना सीधा संबंध स्थापित करता है। नवार्ण मंत्र की प्रत्येक बीजाक्षरी में इतनी प्रचंड ऊर्जा निहित है कि इसके निरंतर और विधि-विधान से जप करने मात्र से मनुष्य के जीवन के सभी प्रकार के कष्ट, बाधाएं, भय, और नकारात्मक ऊर्जाएं स्वतः ही समाप्त होने लगती हैं।
मूल शुद्ध मंत्र एवं लिपिबद्ध उच्चारण
नवार्ण मंत्र का प्रत्येक अक्षर अत्यंत शुद्ध उच्चारण की मांग करता है। इस मंत्र को संस्कृत देवनागरी लिपि में इस प्रकार लिखा जाता है:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
इसकी अंग्रेजी वर्णमाला इस प्रकार है:
Om Aim Hreem Kleem Chamundayai Vichche
मंत्र के उच्चारण में मात्राओं का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 'ॐ' प्रणव मंत्र है जो ब्रह्मांड की मूल ध्वनि है। 'ऐं' सरस्वती बीज है, 'ह्रीं' महामाया या भुवनेश्वरी/लक्ष्मी बीज है, और 'क्लीं' कामराज बीज है। इसके उपरांत 'चामुण्डायै' भगवती चामुण्डा का नाम है और अंत में 'विच्चे' पद आता है। इन नौ अक्षरों का यह क्रम अत्यंत वैज्ञानिक और आध्यात्मानुकूल है जो मानव शरीर के चक्रों को सक्रिय करने की अद्भुत क्षमता रखता है।
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
नवार्ण मंत्र का प्रत्येक शब्द अपने आप में एक विराट ब्रह्मांडीय सत्य को समेटे हुए है। आइए इसके एक-एक पद के गूढ़ अर्थ को समझें:
- ॐ : यह समस्त ब्रह्मांड का नाद है। यह ब्रह्म, विष्णु और महेश तीनों शक्तियों का संयुक्त रूप तथा परमात्मा का मूल नाम है।
- ऐं : यह महासरस्वती का बीज मंत्र है। इसे 'वाग्भव बीज' भी कहा जाता है। यह बुद्धि, ज्ञान, स्मरण शक्ति, कला, संगीत और वाणी की शुद्धि प्रदान करता है।
- ह्रीं : यह महालक्ष्मी और भुवनेश्वरी का बीज मंत्र है। इसे 'माया बीज' कहते हैं। यह भौतिक समृद्धि, ऐश्वर्य, आकर्षण और माया के बंधनों से पार पाने की शक्ति देता है।
- क्लीं : यह महाकाली और कामराज का बीज मंत्र है। इसे 'काम बीज' कहा जाता है। यह सभी प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने वाला, आकर्षण और पराक्रम बढ़ाने वाला तथा सभी प्रकार के संतापों को दूर करने वाला है।
- चामुण्डा : यह भगवती दुर्गा का वह रूप है जिन्होंने चण्ड और मुण्ड नामक असुरों का संहार किया था। यहाँ 'चामुण्डा' का अर्थ अहंकार, अज्ञान, और दुष्ट प्रवृत्तियों का वध करने वाली माता से है।
- विच्चे : यह पद ज्ञान के आवरण को काटने या छिन्न-भिन्न करने का सूचक है। इसका भाव है कि हे माँ! हमारे हृदय पर पड़े अज्ञान और मोह के आवरण को काटकर हमें सत्य का दर्शन कराएं।
समग्र रूप से इस मंत्र का भाव यह है कि हम तीनों देवियों (महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती) के बीज मंत्रों से युक्त चामुण्डा रूपी माँ दुर्गा का आह्वान करते हैं, जो हमारे अज्ञान और बंधनों को काटकर हमें मुक्ति और सर्वैश्वर्य प्रदान करें।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
किसी भी मंत्र की साधना को फलीभूत करने के लिए उसका विनियोग और न्यास करना अनिवार्य माना जाता है। इसके बिना मंत्र का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
विनियोग
हाथ में जल लेकर निम्नलिखित विनियोग का पाठ करें और जल को जमीन पर छोड़ दें:
अस्य श्रीनवार्ण मन्त्रस्य ब्रह्मा-विष्णु-रुद्रा ऋषयः, गायत्री-उष्णिह्-अनुष्टुपाश्छन्दांसि, महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवताः, ऐं बीजं, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकं, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वतीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
करन्यास एवं हृदयादि अंगन्यास
मंत्र के जप से पहले शरीर और अंगुलियों में ऊर्जा का संचार करने के लिए न्यास किया जाता है। हृदय, शिखा, और अंगुलियों का स्पर्श करते हुए न्यास संपन्न करें:
- ॐ ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः (तर्जनी से अंगूठे का स्पर्श)
- ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः (मध्यमा से तर्जनी का स्पर्श)
- ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः (अंगूठे से मध्यमा का स्पर्श)
- ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः (अंगूठे से अनामिका का स्पर्श)
- ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः (अंगूठे से कनिष्ठिका का स्पर्श)
- ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
ध्यान श्लोक
जप शुरू करने से पहले भगवती दुर्गा के इस ध्यान श्लोक का मानसिक पाठ करना चाहिए:
खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः, शङ्खं दधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्। नीलद्युतिमिष्टपादकमलां सेवे महाकालिकाम्, महातीह महासुरासुरमिश्रं तारावलीं सुन्दरिम्॥
अथवा सप्तशती का प्रसिद्ध ध्यान: ॐ बद्धद्वाकराङ्गुलिनखरुचिश्रेकितेंदुप्रभां... (या सामान्य रूप से लाल वस्त्रधारी, सिंह पर आसीन, अस्त्र-शस्त्र सुशोभित माँ दुर्गा का ध्यान करें)।
जप विधि, माला एवं सर्वोत्तम समय
नवार्ण मंत्र की साधना अत्यंत पवित्र और अनुशासित वातावरण में की जानी चाहिए।
- समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 बजे से 6 बजे तक) अथवा गोधूलि बेला (संध्या काल) इस मंत्र के जप के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। रात्रि काल में भी गुप्त साधना के रूप में इसका विशेष महत्व है।
- दिशा: साधना के समय साधक का मुख पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
- आसन: कुशा या ऊन का शुद्ध लाल आसन उपयोग करना चाहिए।
- माला: स्फटिक की माला, रुद्राक्ष की माला या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जाप किया जा सकता है। स्फटिक की माला से जप करने से मानसिक शांति और एकाग्रता बढ़ती है।
- संख्या: प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) या अपनी सामर्थ्यनुसार 3, 5, या 11 माला का जाप करना चाहिए। अनुष्ठान के दौरान सवा लाख जप का विधान है।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
माँ दुर्गा के नवार्ण मंत्र का निरंतर जप करने से साधक को अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- शत्रु बाधा से मुक्ति: जीवन में गुप्त और प्रकट शत्रुओं द्वारा उत्पन्न सभी बाधाएं समाप्त होती हैं।
- मानसिक बल और निर्भयता: मन से हर प्रकार का भय, अज्ञात चिंता, फोबिया और हीन भावना दूर होती है। साधक सिंह के समान निर्भीक बनता है।
- बुद्धि और वाक् सिद्धि: 'ऐं' बीज के प्रभाव से स्मरण शक्ति, बुद्धि तीक्ष्ण होती है और वक्ता को वाणी में अद्भुत प्रभाव प्राप्त होता है।
- समृद्धि और ऐश्वर्य: 'ह्रीं' और 'क्लीं' के प्रभाव से घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है, आर्थिक तंगी दूर होती है और आकर्षण शक्ति बढ़ती है।
- कुंडलिनी जागरण: नौ अक्षर शरीर के प्रमुख चक्रों को जाग्रत करते हैं, जिससे आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
सावधानियां एवं नियम
तंत्र और मंत्र साधना में नियमों की पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है:
- मंत्र जाप के दौरान पूर्ण सात्विक आहार (प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा का पूर्ण त्याग) का पालन करें।
- जप के समय मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, द्वेष या दुर्भावना न रखें।
- जप की संख्या को गुप्त रखें और माला को हमेशा गोमुखी (थैली) के अंदर रखकर ही जप करें, माला को खुले में जमीन पर न रखें।
- ब्रह्मचर्य नियमों का कड़ाई से पालन करें।
- उच्चारण को स्पष्ट रखें, बहुत तेजी से या मन ही मन बड़बड़ाते हुए मंत्र न जपें; या तो मानसिक जप करें या धीमी आवाज (उपशुक्र जप) से करें।