प्रस्तावना, पौराणिक उत्पत्ति एवं ग्रंथ संदर्भ
महाभारत का युद्ध केवल दो सेनाओं के बीच का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह भावनाओं, संबंधों, धर्म और नियति के बीच का एक भीषण द्वंद्व था। इस महागाथा के सबसे हृदयविदारक प्रसंगों में से एक है—माता कुंती और उनके प्रथम पुत्र, सूर्यपुत्र कर्ण का मिलन। यह प्रसंग महाभारत के 'उद्योग पर्व' के अंतर्गत आता है। जब शांति के दूत बनकर आए भगवान श्रीकृष्ण के प्रस्ताव को दुर्योधन ने ठुकरा दिया और युद्ध अनिवार्य हो गया, तब कुंती के हृदय में अपने पुत्रों के प्रति ममता और भय का ज्वार उमड़ पड़ा।
उपलब्ध पौराणिक संदर्भों एवं शास्त्रीय परंपरा के अनुसार, यह वह क्षण था जब एक माँ ने अपने उस पुत्र को पहचानने और अपनाने का प्रयास किया जिसे उसने लोक-लाज के भय से जन्म देते ही त्याग दिया था। यह कथा केवल एक पारिवारिक पुनर्मिलन नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के चरित्र की दृढ़ता, दानवीरता और वचनबद्धता की पराकाष्ठा है।
तिथि एवं दिव्य पृष्ठभूमि
यह घटना कुरुक्षेत्र युद्ध के आरम्भ होने से कुछ समय पूर्व की है। कार्तिक मास की समाप्ति और मार्गशीर्ष के आगमन का वह समय था जब प्रकृति भी आने वाले विनाश की आहट से स्तब्ध थी। भगवान श्रीकृष्ण ने पहले ही कर्ण को उसके जन्म का रहस्य बताकर उसे पांडवों के पक्ष में आने का निमंत्रण दिया था, किंतु कर्ण ने अपनी मित्रता और कृतज्ञता के कारण उसे अस्वीकार कर दिया। इसके पश्चात, माता कुंती ने स्वयं पहल करने का निर्णय लिया।
प्रमुख पात्र एवं दिव्य संदर्भ
| पात्र | भूमिका एवं परिचय |
|---|---|
| कर्ण | सूर्यपुत्र, कुंती के ज्येष्ठ पुत्र, अंगराज और दुर्योधन के परम मित्र। |
| कुंती | पांडवों की माता, जिन्होंने दुर्वासा ऋषि के मंत्र से कर्ण को प्राप्त किया था। |
| भगवान श्रीकृष्ण | धर्म के रक्षक और इस संपूर्ण लीला के सूत्रधार। |
| सूर्य देव | कर्ण के दिव्य पिता, जिन्होंने कर्ण को स्वप्न में सचेत किया था। |
सम्पूर्ण पौराणिक एवं पावन कथा
जब कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध की भेरियाँ बजने ही वाली थीं, तब माता कुंती का मन अत्यंत अशांत हो उठा। उन्हें ज्ञात था कि कर्ण और अर्जुन, जो दोनों ही उनके पुत्र हैं, एक-दूसरे के प्राणों के प्यासे हैं। एक ओर पाँच पांडव थे जिन्हें उन्होंने पाल-पोसकर बड़ा किया था, और दूसरी ओर वह ज्येष्ठ पुत्र था जिसे उन्होंने गंगा की लहरों में बहा दिया था।
एक दोपहर, जब सूर्य अपनी पूरी प्रखरता के साथ आकाश के मध्य में थे, कुंती गंगा के तट पर पहुँचीं। वहाँ कर्ण अपनी दैनिक उपासना में लीन थे। कर्ण का नियम था कि वे मध्याह्न काल में सूर्य की उपासना करते थे और उस समय जो भी याचक उनके पास आता, वे उसे रिक्त हाथ नहीं जाने देते थे।
कुंती का आगमन और कर्ण की वंदना
कर्ण गंगा के जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य दे रहे थे। जब उन्होंने अपनी प्रार्थना समाप्त की और पीछे मुड़े, तो उन्होंने एक वृद्धा को खड़ा पाया। वह कोई और नहीं, स्वयं कुंती थीं। कर्ण ने अत्यंत विनम्रता से झुककर प्रणाम किया और कहा:
"हे देवी! राधा और अधिरथ का पुत्र सूतपुत्र कर्ण आपको प्रणाम करता है। इस समय आपके यहाँ आने का क्या प्रयोजन है? मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?"
कर्ण के मुख से 'राधापुत्र' शब्द सुनकर कुंती का हृदय छलनी हो गया। उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली। उन्होंने कांपते स्वर में कहा, "पुत्र! तुम राधा के पुत्र नहीं हो। तुम तो कुंती के पुत्र हो। तुम सूतपुत्र नहीं, बल्कि कौंतेय हो। तुम राजा पांडु के ज्येष्ठ पुत्र और पांडवों के बड़े भाई हो।"
रहस्योद्घाटन और कुंती की विनती
कुंती ने कर्ण को उसके जन्म की पूरी कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि कैसे कौमार्य अवस्था में दुर्वासा ऋषि के मंत्र का परीक्षण करने हेतु उन्होंने सूर्य देव का आह्वान किया था और फलस्वरूप कर्ण का जन्म हुआ। लोक-निंदा के भय से उन्होंने उसे एक पेटी में रखकर गंगा में प्रवाहित कर दिया था।
कुंती ने रोते हुए कहा, "बेटा, दुर्योधन का साथ छोड़ दो। तुम पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता हो। यदि तुम उनके साथ मिल जाओगे, तो युधिष्ठिर स्वयं तुम्हारे चरणों में अपना मुकुट रख देंगे। अर्जुन और भीम तुम्हारी सेवा करेंगे। यह युद्ध रुक जाएगा और तुम चक्रवर्ती सम्राट बनोगे।"
कर्ण का तर्क और धर्म संकट
कर्ण, जो अपनी दानवीरता और सत्यवादिता के लिए विख्यात थे, कुंती की बातें सुनकर विचलित नहीं हुए। उनके चेहरे पर एक विषादपूर्ण मुस्कान आई। उन्होंने कहा:
"हे माता! आज वर्षों बाद आपको अपनी ममता की याद आई? जब मैं समाज के तानों को सह रहा था, जब द्रोणाचार्य ने मुझे शिक्षा देने से मना कर दिया था, जब द्रौपदी के स्वयंवर में मुझे 'सूतपुत्र' कहकर अपमानित किया गया था, तब आपकी यह ममता कहाँ थी? उस समय केवल दुर्योधन ने मुझे सम्मान दिया, मुझे अंग देश का राजा बनाया और मुझे अपना मित्र माना।"
कर्ण ने आगे कहा, "आज जब युद्ध सामने खड़ा है और आपके पाँचों पुत्रों के प्राण संकट में हैं, तब आप मुझे मेरा अधिकार देने आई हैं। यदि मैं आज दुर्योधन को छोड़ देता हूँ, तो संसार मुझे कृतघ्न और कायर कहेगा। मैं अपनी मित्रता और अपने वचन के साथ विश्वासघात नहीं कर सकता।"
महान त्याग और कर्ण का वचन
कुंती को अत्यंत दुखी देखकर कर्ण का हृदय पसीज गया। उन्होंने अपनी माता को रिक्त हाथ न भेजने का निर्णय लिया। कर्ण ने कहा, "माता! मैं दुर्योधन का पक्ष तो नहीं छोड़ सकता, लेकिन मैं आपको वचन देता हूँ कि आपके पाँच पुत्र सदैव जीवित रहेंगे।"
कुंती ने आश्चर्य से देखा, तो कर्ण ने स्पष्ट किया, "मैं अर्जुन के अतिरिक्त अन्य चार पांडवों—युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव—का वध नहीं करूँगा, भले ही वे मेरे वश में क्यों न हों। युद्ध के अंत में या तो कर्ण जीवित रहेगा या अर्जुन। इस प्रकार आपके पाँच पुत्र सदैव रहेंगे—या तो अर्जुन के साथ चार भाई, या मेरे साथ चार भाई।"
यह सुनकर कुंती के हृदय में मिश्रित भावनाएं थीं। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र के इस महान त्याग को देखा और उसे गले लगाकर भारी मन से विदा ली।
कथा का गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य एवं दार्शनिक संदेश
कर्ण और कुंती का यह मिलन केवल एक भावनात्मक दृश्य नहीं है, बल्कि यह 'स्वधर्म' की व्याख्या करता है। कर्ण जानते थे कि वे अधर्म के पक्ष में हैं, लेकिन उनके लिए 'कृतज्ञता' और 'मित्रता' का धर्म सर्वोपरि था।
- नियति का खेल: यह कथा दर्शाती है कि मनुष्य अपनी परिस्थितियों का दास हो सकता है, लेकिन उसके संस्कार और निर्णय उसे महान बनाते हैं।
- मातृत्व की विवशता: कुंती का चरित्र हमें सिखाता है कि एक गलत निर्णय (कर्ण का त्याग) जीवनभर का पश्चाताप बन सकता है।
- त्याग की पराकाष्ठा: कर्ण का यह जानते हुए भी कि उनकी मृत्यु निश्चित है, अपनी माता को दान देना उन्हें 'दानवीर' की उपाधि का वास्तविक अधिकारी बनाता है।
प्रामाणिक पूजा सामग्री एवं सूची
यद्यपि यह एक कथा प्रसंग है, किंतु इस प्रसंग के स्मरण और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्ति हेतु निम्नलिखित सामग्री का उपयोग किया जा सकता है:
- भगवान श्रीकृष्ण और सूर्य देव का चित्र या विग्रह।
- शुद्ध गंगाजल और पंचामृत।
- पीले पुष्प, तुलसी दल और अक्षत।
- धूप, दीप और अगरबत्ती।
- नैवेद्य (मिश्री, माखन या ऋतु फल)।
- लाल चंदन और कलावा।
क्रमबद्ध व्रत पूजन विधि एवं संकल्प नियम
इस कथा का श्रवण विशेष रूप से रविवार या एकादशी के दिन करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
- स्नान एवं शुद्धि: प्रातः काल उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- संकल्प: हाथ में जल लेकर संकल्प करें कि आप भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रीति और कर्ण जैसी दानवीरता की भावना हेतु यह कथा श्रवण कर रहे हैं।
- सूर्य अर्घ्य: सर्वप्रथम सूर्य देव को तांबे के पात्र से जल अर्पित करें, क्योंकि कर्ण सूर्यपुत्र थे।
- पूजन: श्रीकृष्ण के सम्मुख दीप प्रज्वलित करें और उन्हें पुष्प अर्पित करें।
- कथा श्रवण: शांत चित्त होकर कर्ण-कुंती संवाद का पाठ करें या श्रवण करें।
- आरती: अंत में श्रीकृष्ण की आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें।
ध्यान मंत्र, स्तुति एवं समर्पण श्लोक
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते पुरुषोत्तम।
नमस्ते सर्वलोकेश नमस्ते तिग्मतेजसे॥
कर्ण की दानवीरता को स्मरण करते हुए इस श्लोक का पाठ करें:
दाता च समदृष्टिश्च धीरश्चैव नरोत्तमः।
कर्णः सूर्यसुतो धीमान् सर्वशस्त्रभृतां वरः॥
समापन आरती एवं क्षमा प्रार्थना
आरती के पश्चात हाथ जोड़कर यह प्रार्थना करें: "हे प्रभु, इस कथा के श्रवण से हमारे भीतर के अहंकार का नाश हो। हमें कर्ण जैसी अटूट निष्ठा और कुंती जैसी धैर्यशक्ति प्रदान करें। अनजाने में हुई किसी भी त्रुटि के लिए हमें क्षमा करें।"
व्रत के आवश्यक नियम एवं सावधानियां
- कथा के दौरान मन में किसी के प्रति द्वेष या ईर्ष्या न रखें।
- कर्ण के चरित्र से केवल उनकी दानवीरता और निष्ठा को ग्रहण करें, अधर्म के साथ को नहीं।
- इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करें और यथाशक्ति दान अवश्य करें।
- ब्रह्मचर्य का पालन करें और वाणी में मधुरता बनाए रखें।
आधुनिक एवं दैनिक जीवन में कथा की सीख
आज के युग में यह कथा हमें सिखाती है कि हमारे द्वारा अतीत में लिए गए निर्णय हमारे भविष्य को निर्धारित करते हैं। कुंती का पश्चाताप हमें सिखाता है कि सामाजिक भय में आकर अपने उत्तरदायित्वों से नहीं भागना चाहिए। वहीं, कर्ण का चरित्र हमें सिखाता है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अपनी नैतिकता और वचनबद्धता को नहीं छोड़ना चाहिए। यह कथा हमें 'कृतज्ञता' का मूल्य समझाती है।
गंगा तट पर कुंती और कर्ण का संवाद: एक आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
महाभारत के युद्ध की रणभेरी बजने से पूर्व, जब शांति के सभी मार्ग अवरुद्ध हो चुके थे, तब माता कुंती के हृदय में अपने ज्येष्ठ पुत्र कर्ण के प्रति ममता और भय का ज्वार उमड़ रहा था। गंगा के तट पर संध्या वंदन में लीन कर्ण के समक्ष जब कुंती पहुंची, तो वह केवल एक माता नहीं, बल्कि अपने अतीत के अपराधबोध से दबी एक स्त्री भी थीं। इस मिलन का आध्यात्मिक महत्व यह है कि यहाँ सत्य और सामाजिक मर्यादा के बीच का द्वंद्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कुंती का वहां जाना भगवान श्रीकृष्ण की उस योजना का हिस्सा था, जिसमें वे चाहते थे कि कर्ण को अपनी वास्तविकता का ज्ञान हो, ताकि युद्ध के समय उसके मन में धर्म और अधर्म को लेकर एक सूक्ष्म संशय बना रहे।
जब कर्ण ने अपनी आँखें खोलीं और अपनी जन्मदात्री को पहचाना, तो उनके बीच का संवाद केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं था, बल्कि दो आत्माओं का विलाप था। कर्ण ने कुंती को 'राधेय' कहकर संबोधित किया, जो उनकी अपनी माता राधा के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक था। कुंती ने जब उन्हें 'कौन्तेय' (कुंती पुत्र) होने का सत्य बताया और पांडवों के पक्ष में आने का आग्रह किया, तब कर्ण के भीतर एक भीषण मानसिक युद्ध छिड़ गया। एक ओर जन्म देने वाली माता का स्नेह था और दूसरी ओर पालने वाली माता का ऋण तथा दुर्योधन की मित्रता का धर्म।
इस मिलन में कर्ण का तर्क अत्यंत गूढ़ है। उन्होंने कुंती से प्रश्न किया कि जब उन्हें समाज के तिरस्कार की आवश्यकता थी, तब वे कहाँ थीं? आज जब पांडवों को उनकी शक्ति की आवश्यकता है, तब वे ममता का आंचल लेकर आई हैं। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि समय पर लिया गया निर्णय ही धर्म होता है; असमय प्रकट किया गया सत्य कभी-कभी केवल पीड़ा ही देता है। कर्ण ने स्पष्ट किया कि यद्यपि वे जानते हैं कि विजय पांडवों की होगी क्योंकि उनके साथ श्रीकृष्ण हैं, फिर भी वे अपने मित्र दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ सकते।
कर्ण की अडिग निष्ठा और कुंती का मातृ-हृदय
कर्ण और कुंती के इस मिलन में कर्ण की महानता का एक नया आयाम उभर कर आता है। उन्होंने कुंती को वह सम्मान दिया जो एक पुत्र अपनी माता को देता है, किंतु अपनी नैतिकता से समझौता नहीं किया। कर्ण ने कुंती से कहा, "हे माता! आपने मुझे तब त्यागा जब मुझे आपकी सबसे अधिक आवश्यकता थी, और आज आप मुझे उस समय अपनाने आई हैं जब मेरा अंत निकट है।" यह वाक्य महाभारत के सबसे मर्मस्पर्शी संवादों में से एक है। यहाँ कुंती का मौन उनके पश्चाताप की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
कुंती का वहां जाना केवल पुत्र मोह नहीं था, बल्कि एक माता का अपने अन्य पांच पुत्रों को ज्येष्ठ भ्राता के कोप से बचाने का प्रयास भी था। वे जानती थीं कि यदि कर्ण अपनी पूरी शक्ति से पांडवों पर प्रहार करेंगे, तो अर्जुन के अतिरिक्त कोई भी जीवित नहीं बचेगा। इस मिलन के दौरान कुंती की आंखों के आंसू और कर्ण की वाणी की दृढ़ता के बीच जो मौन व्याप्त था, वह कुरुक्षेत्र के आगामी विनाश की पूर्व सूचना दे रहा था।
पांच पुत्रों का वचन: एक अद्भुत त्याग और कूटनीतिक संतुलन
इस मिलन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वह क्षण था जब कर्ण ने कुंती को एक अभूतपूर्व वचन दिया। कर्ण ने देखा कि उनकी माता अत्यंत भयभीत हैं, विशेषकर अर्जुन की सुरक्षा को लेकर। तब कर्ण ने अपनी दानवीरता का परिचय देते हुए कहा कि युद्ध के अंत में कुंती के पांच पुत्र सदैव जीवित रहेंगे। यह वचन न केवल कर्ण की वीरता का प्रमाण था, बल्कि उनके भीतर छिपे उस पुत्र का समर्पण भी था जिसने कभी अपनी माता का सुख नहीं भोगा था।
| पांडव भ्राता | कर्ण का निर्णय | आध्यात्मिक कारण |
|---|---|---|
| युधिष्ठिर | जीवनदान दिया | धर्मराज की रक्षा करना धर्म की रक्षा के समान था। |
| भीम | पराजित कर छोड़ दिया | कुंती को दिए वचन का पालन और भ्रातृ प्रेम। |
| अर्जुन | प्राणघातक युद्ध का संकल्प | नियति और प्रतिद्वंद्विता का अंतिम परिणाम। |
| नकुल एवं सहदेव | शस्त्रहीन कर मुक्त किया | अनुजों के प्रति दया और माता को दिया वचन। |
कर्ण ने कुंती से कहा, "माता, आपके पांच पुत्र सुरक्षित रहेंगे। या तो अर्जुन मरेगा और मैं जीवित रहूँगा, या मैं मरूँगा और अर्जुन जीवित रहेगा। दोनों ही स्थितियों में आपके पांच पुत्र (चार अन्य और हम दोनों में से एक) जीवित रहेंगे।" यह प्रतिज्ञा कर्ण के चरित्र की उस गहराई को दर्शाती है जहाँ वे जानते थे कि उनका अंत निश्चित है, फिर भी उन्होंने अपनी माता की झोली खाली नहीं रहने दी। यह दान उनके द्वारा दिए गए किसी भी स्वर्ण दान से बड़ा था क्योंकि यहाँ उन्होंने अपने जीवन की सुरक्षा का दान दिया था।
भगवान श्रीकृष्ण की लीला और इस मिलन का गूढ़ उद्देश्य
यद्यपि यह मिलन कुंती और कर्ण के बीच था, किंतु इसके पीछे भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य दृष्टि कार्य कर रही थी। श्रीकृष्ण जानते थे कि कर्ण के कवच-कुंडल जाने के बाद भी, उनकी मानसिक शक्ति और अजेय अस्त्र पांडवों के लिए संकट बन सकते हैं। कुंती के माध्यम से कर्ण को भावुक करना और उनसे वचन लेना, युद्ध के परिणाम को धर्म के पक्ष में मोड़ने की एक सूक्ष्म रणनीति थी। श्रीकृष्ण ने सिद्ध किया कि युद्ध केवल अस्त्रों से नहीं, बल्कि भावनाओं और वचनों के प्रबंधन से भी जीता जाता है।
"कर्ण और कुंती का मिलन यह संदेश देता है कि संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्णतः बुरा या पूर्णतः सुखी नहीं है। हर पात्र अपने कर्मों और प्रारब्ध के जाल में उलझा हुआ है, जहाँ केवल ईश्वर की शरणागति ही शांति प्रदान कर सकती है।"
इस मिलन के पश्चात जब कुंती भारी मन से वापस लौटीं, तो उनके पास सांत्वना तो थी पर संतोष नहीं। उन्होंने जान लिया था कि उनका ज्येष्ठ पुत्र धर्म के विरुद्ध खड़ा होने के बावजूद, नैतिकता के शिखर पर आसीन है। कर्ण ने सिद्ध कर दिया कि कुल और जन्म से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति का चरित्र और उसके द्वारा निभाए गए वचन होते हैं। आज भी यह प्रसंग हमें रिश्तों की जटिलता और सत्य को स्वीकार करने के साहस की प्रेरणा देता है।
जीवन प्रबंधन के सूत्र: कर्ण-कुंती प्रसंग से सीख
कर्ण और कुंती के इस मार्मिक प्रसंग से आधुनिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण पाठ मिलते हैं। पहला पाठ 'स्वीकार्यता' का है। कर्ण ने सत्य जानने के बाद भी अपनी वर्तमान स्थिति और अपने पालने वाले माता-पिता के प्रति अपनी निष्ठा को नहीं बदला। यह हमें सिखाता है कि हमारी जड़ें वही हैं जिन्होंने हमें सींचा है, न कि वे जिन्होंने केवल हमें जन्म दिया है। आज के समय में जब लोग सफलता मिलते ही अपने पुराने संबंधों को भूल जाते हैं, कर्ण का उदाहरण एक आदर्श प्रस्तुत करता है।
दूसरा महत्वपूर्ण पाठ 'वचनबद्धता' का है। कर्ण जानते थे कि कुंती को दिया गया वचन उनकी मृत्यु का कारण बन सकता है, क्योंकि अर्जुन को न मारना उनके लिए आत्मघाती था। फिर भी, उन्होंने अपनी माता को निराश नहीं किया। जीवन में कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों और वचनों पर अडिग रहना ही वास्तविक वीरता है। कुंती का पश्चाताप हमें यह सिखाता है कि सामाजिक भय के कारण किए गए गलत निर्णय जीवन भर का मानसिक बोझ बन जाते हैं, इसलिए सदैव सत्य और धर्म का मार्ग चुनना चाहिए, चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो।
अंततः, यह कथा हमें 'क्षमा' और 'त्याग' की शक्ति बताती है। कर्ण ने कुंती को उनके परित्याग के लिए क्षमा किया और कुंती ने अपने अहंकार को त्याग कर अपने पुत्र के सामने याचना की। यह मिलन कुरुक्षेत्र की उस भूमि पर मानवता का एक ऐसा दीप था, जो युद्ध की विभीषिका के बीच भी प्रेम और कर्तव्य की लौ जलाए हुए था। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से यह प्रसंग महाभारत का सबसे भावुक और शिक्षाप्रद अध्याय बन गया, जो युगों-युगों तक भक्तों और जिज्ञासुओं का मार्गदर्शन करता रहेगा।
यह पावन पौराणिक कथा एवं व्रत विधान उपलब्ध धार्मिक शास्त्रों (पद्म पुराण, स्कंद पुराण, भविष्य पुराण, श्रीमद्भागवत एवं अन्य प्रामाणिक संदर्भों) के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा शोध एवं समीक्षा उपरांत सरल हिंदी भाषा में प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य सनातन धर्म की अमूल्य परंपराओं एवं नैतिक शिक्षाओं का जन-जन तक प्रसार करना है।
भक्ति विचार एवं टिप्पणियाँ (0)