पाँचवाँ अध्याय कर्मयोग और संन्यास के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि सच्चा संन्यासी वह है जो फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य-कर्म करता है, न कि केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला। यह अध्याय समदर्शिता, ज्ञान-विज्ञान और भक्ति के मार्ग का वर्णन करता है।
परिचय / Introduction
अध्याय ४ के अंत में कृष्ण ने ज्ञान और कर्म के रहस्य बताए। अब अर्जुन के मन में यह संदेह उठता है कि कर्मों का त्याग (संन्यास) श्रेष्ठ है या निष्काम कर्मयोग। यह अध्याय इसी दुविधा का समाधान करता है।
मुख्य विषय / Key Themes
कर्मसंन्यास और कर्मयोग में समानता (Equality of Renunciation and Action): दोनों ही मोक्ष के साधन हैं, पर कर्मयोग अधिक व्यावहारिक है।
सच्चा संन्यासी (True Renunciate): जो द्वेष और आसक्ति से रहित होकर कर्तव्य-कर्म करता है, वही सच्चा संन्यासी है।
समदर्शिता (Equal Vision): ज्ञानी सभी प्राणियों में एक ही परमात्मा को देखता है, चाहे वे ब्राह्मण हों, गाय, हाथी, कुत्ते या चाण्डाल।
भक्ति और शांति (Devotion and Peace): जो पुरुष भगवान में मन लगाकर कर्म करता है, वह परम शांति को प्राप्त होता है।
यह अध्याय हमें सिखाता है कि बाहरी त्याग नहीं, बल्कि भावना का त्याग महत्वपूर्ण है। ईश्वर को समर्पित भाव से किया गया प्रत्येक कर्म ही सच्चा संन्यास है। This chapter reveals that true renunciation is not giving up actions, but performing them as an offering to the Divine, which leads to eternal peace.
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१॥
“बाह्य विषयों के सुखों में अनासक्त हुआ पुरुष अपने भीतर जो सुख पाता है, वह ब्रह्मयोग में लगा हुआ उस अक्षय सुख को भोगता है।”
English: With the self unattached to external contacts, he finds the joy that is in the Self. With the self engaged in the yoga of Brahman, he enjoys imperishable bliss.
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२॥
“हे कौन्तेय! इन्द्रियों के विषयों से उत्पन्न होने वाले जो भोग हैं, वे दुःख के कारण ही हैं, क्योंकि उनका आदि और अन्त है (वे नाशवान हैं)। इसलिए बुद्धिमान पुरुष उनमें नहीं रमते।”
English: The pleasures that arise from contact (with sense objects) are indeed sources of sorrow. They have a beginning and an end, O son of Kunti; the wise do not delight in them.
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४॥
“जो पुरुष अन्तःकरण में ही सुख वाला है, अन्तर में ही रमण करने वाला है, और अन्तर में ही ज्योति वाला है, वह योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होता है।”
English: He who finds his happiness within, his delight within, and his light within – that yogi, having become one with Brahman, attains Brahmanirvana (liberation in Brahman).
“जिनके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब सन्देह कट गए हैं, जो संयत चित्त वाले हैं और सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं – ऐसे ऋषिगण ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त करते हैं।”
English: The sages whose sins are destroyed, whose doubts are cut asunder, whose minds are controlled, and who are engaged in the welfare of all beings, attain Brahmanirvana.
“काम और क्रोध से रहित, संयत चित्त वाले, आत्मज्ञानी योगियों के लिए ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) सब ओर (निकट ही) विद्यमान है।”
English: For those who are free from desire and anger, who have controlled their minds and known the Self, Brahmanirvana is near at hand (exists on all sides).
“बाह्य (सब) विषयों को बाहर ही त्यागकर, दोनों भौहों के बीच दृष्टि को स्थिर करके, नासिका के भीतर विचरण करने वाले प्राण और अपान वायु को समान करके...”
English: Shutting out all external sense objects, fixing the vision between the eyebrows, making the prana and apana (incoming and outgoing breaths) even and flowing within the nostrils...