सत्रहवें अध्याय में अर्जुन पूछते हैं कि जो लोग शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है। कृष्ण तीन प्रकार की श्रद्धा – सात्विक, राजसिक और तामसिक – का वर्णन करते हैं और भोजन, यज्ञ, तप, दान के तीन भेद बताते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन अध्याय का शीर्षक "श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)" है। यह अध्याय कर्म, भक्ति और ज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों का एक उत्कृष्ट समन्वय है।
अध्याय संदेश
सत्रहवें अध्याय में अर्जुन पूछते हैं कि जो लोग शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है। कृष्ण तीन प्रकार की श्रद्धा – सात्विक, राजसिक और तामसिक – का वर्णन करते हैं और भोजन, यज्ञ, तप, दान के तीन भेद बताते हैं।
२. अध्याय के पावन श्लोक (Gita Shlokas)
प्रत्येक श्लोक को उसके मूल देवनागरी पाठ और हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद के साथ नीचे सूचीबद्ध किया गया है।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१॥
हिंदी अनुवाद: “परन्तु जो दान बदले की भावना से, या फल की इच्छा से, या कष्ट (अरुचि) के साथ दिया जाता है – वह दान राजस कहा गया है।”
English Translation: But that gift which is given with a view to receive something in return, or looking for a reward, or which is given reluctantly – that charity is considered rajasic.
हिंदी अनुवाद: “जो दान अनुचित देश-काल में, अपात्रों को, बिना सत्कार के और तिरस्कारपूर्वक दिया जाता है – वह तामस कहा गया है।”
English Translation: That gift which is given at an improper place and time, to unworthy persons, without respect and with contempt – is declared tamasic.
हिंदी अनुवाद: “ॐ, तत्, सत् – यह ब्रह्म (परमात्मा) का तीन प्रकार से निर्देश (नाम) कहा गया है। इसी (तीन नामों) द्वारा प्राचीन काल में ब्राह्मण, वेद और यज्ञ रचे गए।”
English Translation: Om Tat Sat – this has been declared as the threefold designation of Brahman. By that were created, in ancient times, the Brahmins, the Vedas, and the sacrifices.
हिंदी अनुवाद: “इसलिए, वेदों के अनुयायी (ब्रह्मवादी) लोग शास्त्र-विधि से नियत यज्ञ, दान और तप की क्रियाओं को "ॐ" का उच्चारण करके ही आरम्भ करते हैं।”
English Translation: Therefore, acts of sacrifice, charity, and austerity, as prescribed in the scriptures, are always begun by the followers of the Vedas after uttering Om.
हिंदी अनुवाद: “फल की इच्छा न रखते हुए, "तत्" का उच्चारण करके, मोक्ष के इच्छुक पुरुषों द्वारा यज्ञ, तप और दान की विविध क्रियाएँ की जाती हैं।”
English Translation: Uttering Tat, without desiring the fruits, the various acts of sacrifice, austerity, and charity are performed by the seekers of liberation.
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते। प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६॥
हिंदी अनुवाद: “सत् शब्द का प्रयोग सद्भाव (वस्तु की सत्ता) और साधुभाव (उत्तमता) के अर्थ में होता है। तथा हे पार्थ! प्रशस्त (शुभ) कर्म में भी सत् शब्द का प्रयोग किया जाता है।”
English Translation: The word Sat is used in the sense of reality and goodness; and also, O Partha, the word Sat is used in the sense of an auspicious act.
हिंदी अनुवाद: “यज्ञ, तप और दान में स्थिति (निष्ठा) को भी "सत्" कहा जाता है, तथा उस परमात्मा के लिए किया गया कर्म भी "सत्" ही कहलाता है।”
English Translation: Steadfastness in sacrifice, austerity, and charity is also called Sat; and action for the sake of the Supreme is certainly called Sat.
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८॥
हिंदी अनुवाद: “हे पार्थ! जो यज्ञ (हवन) किया जाता है, जो दान दिया जाता है, जो तप तपा जाता है और जो भी कर्म बिना श्रद्धा के किया जाता है – वह "असत्" कहलाता है। उसका कोई फल इस लोक में नहीं मिलता और न ही परलोक में।”
English Translation: Whatever is offered in sacrifice, given in charity, or performed in austerity or any action without faith – is called Asat, O Partha; it is naught here or hereafter.