सनातन धर्म के समस्त व्रतों और उपवासों में एकादशी व्रत (Ekadashi Vrat) को सर्वश्रेष्ठ और 'व्रतराज' कहा गया है। पद्म पुराण के उत्तरखंड में स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु ने देवर्षि नारद से कहा है कि—"न गंगा सदृशं तीर्थं न देवः केशवात्परः। न ह्येकादशी समं किंचित्पावनं विद्यते भुवि॥" अर्थात् गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, भगवान विष्णु के समान कोई देवता नहीं और एकादशी के समान कोई परम पावन व्रत इस पृथ्वी पर नहीं है।
१. एकादशी माता की उत्पत्ति और मुर दैत्य वध की पौराणिक कथा
सत्ययुग में मुर (Mur) नामक एक अत्यंत बलशाली और क्रूर दैत्य ने अपने आतंक से स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया तथा समस्त देवताओं को निष्कासित कर दिया। तब देवराज इंद्र की प्रार्थना पर भगवान श्रीहरि विष्णु ने उस दैत्य के साथ सैकड़ों वर्षों तक युद्ध किया। युद्ध करते-करते जब भगवान थक गए, तब वे बद्रिकाश्रम की हेमवती गुफा में विश्राम करने चले गए।
जब मुर दैत्य भगवान का वध करने हेतु गुफा में प्रविष्ट हुआ, उसी क्षण भगवान विष्णु के शरीर से एक अत्यंत तेजस्वी, दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से युक्त कन्या प्रकट हुई। उस देवी ने सिंहनाद करते हुए एक ही प्रहार में मुर दैत्य का वध कर दिया। भगवान जब निद्रा से जागे, तब उन्होंने उस कन्या से अत्यंत प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा। देवी ने कहा—"हे प्रभो! जो भी मनुष्य मेरे प्राकट्य दिवस पर उपवास रखकर आपका पूजन करे, उसके समस्त पाप नष्ट हों और उसे वैकुंठ धाम प्राप्त हो।" भगवान ने उनका नाम 'एकादशी' रखा, क्योंकि वे मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को प्रकट हुई थीं।
२. एकादशी व्रत के त्रिकाल नियम (दशमी, एकादशी और द्वादशी)
- दशमी के नियम (पूर्व संध्या): दशमी तिथि के दिन सूर्यास्त से पूर्व एक बार सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। इस दिन मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन, मसूर की दाल और पराया अन्न पूर्णतः त्याज्य है। रात्रि में ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- एकादशी के नियम (व्रत दिवस): प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठकर गंगाजल युक्त जल से स्नान करें और पीले वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु के समक्ष हाथ में जल व पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें। दिनभर सात्विक फलाहार (दूध, फल, मेवे) लें अथवा निर्जल उपवास रखें।
- द्वादशी के नियम (पारण दिवस): द्वादशी के दिन प्रातः पुनः स्नान कर भगवान विष्णु का पूजन करें। किसी सुयोग्य ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को भोजन कराएं तथा दान-दक्षिणा दें। इसके उपरांत शुभ मुहूर्त में तुलसी दल व चरणामृत लेकर पारण करें।
३. एकादशी के दिन चावल खाने का निषेध क्यों है? (वैज्ञानिक व धार्मिक रहस्य)
धार्मिक मान्यता के अनुसार, महर्षि मेधा ने जब अपने शरीर का त्याग किया था, तब उनके अंश पृथ्वी में समा गए और उनसे जौ व चावल उत्पन्न हुए। एकादशी के दिन चावल ग्रहण करना महर्षि मेधा के रक्त व मांस का भक्षण करने के समान पाप माना गया है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: चंद्रमा का पृथ्वी के जल और मनुष्य के शरीर के ७०% जल तत्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। एकादशी तिथि के दिन चंद्रमा की किरणें जलीय तत्वों को अशांत करती हैं। चावल में जल धारण करने की क्षमता सर्वाधिक होती है। चावल खाने से शरीर में आलस्य, तंद्रा और मन में चंचलता बढ़ती है, जिससे एकादशी के दिन ईश्वर ध्यान और साधना में बाधा उत्पन्न होती है।
४. पारण (Parana) का महत्व एवं हरिवासर का नियम
एकादशी व्रत का संपूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण (Parana) सही समय पर किया जाए। द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले पारण करना अनिवार्य होता है। यदि द्वादशी के दिन 'हरिवासर' (द्वादशी का प्रथम एक-चौथाई भाग) चल रहा हो, तो उस समय पारण कदापि नहीं करना चाहिए। हरिवासर समाप्त होने के बाद ही पारण करना शास्त्रसम्मत है।
यह एकादशी व्रत कैलेंडर उपलब्ध प्रामाणिक पंचांग संदर्भों, पद्म पुराण, स्कंद पुराण एवं द्रिक गणितीय सूर्य-सिद्धांत गणनाओं के आधार पर तैयार किया गया है। स्थानीय सूर्योदय के अनुसार पारण समय में कुछ मिनटों का सूक्ष्म अंतर संभव है।