॥ यमुना माता सर्व संकट निवारक शक्तिपीठ आरती: ॐ जय एकादशी माता मैया जय एकादशी माता का शुद्ध पाठ एवं भावार्थ ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता
सनातन सनातन धर्म में नदियों, तिथियों और शक्तिपीठों को प्रत्यक्ष रूप से परम ब्रह्म का स्वरूप माना गया है। इनमें सूर्यपुत्री यमुना (कालिंदी) और जगत जननी श्री हरि विष्णु की प्रिय तिथि एकादशी का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। जब हम यमुना माता और एकादशी माता के पावन संयोजन का स्मरण करते हैं, तो यह केवल जल या तिथि मात्र नहीं रह जाती, बल्कि यह जीव की मुक्ति का परम मार्ग बन जाती है। यमुना जी को भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी और साक्षात भक्ति रस की धारा कहा गया है, वहीं एकादशी व्रत को समस्त व्रतों में राजा यानी सर्वोपरि माना गया है।
इस दिव्य आरती के रचयिता प्राचीन संत और महान वैष्णव आचार्य रहे हैं, जिन्होंने जन-कल्याण के लिए इस महामंत्र स्वरूप आरती की रचना की। इस आरती का गान करने मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मन्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे भगवान विष्णु के वैकुण्ठ धाम तथा यमुना के पावन तटों पर अनन्त भक्ति की प्राप्ति होती है। यह आरती साधक के जीवन के सभी भौतिक और आध्यात्मिक संकटों का निवारण करने वाली सर्वशक्तिशाली शक्तिपीठ आरती के रूप में प्रतिष्ठित है।
सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल
ॐ जय एकादशी माता, मैया जय एकादशी माता।
सतगुरु दयालु किजै, कृपा दृष्टि माता॥ ॐ जय...॥
इन्द्रा और कमला सुर-मुनि जन गावत।
नारद और ब्रम्हा जी चरणों में ध्यावत॥ ॐ जय...॥
डमरू मृदंग बाजत बाजे सहनाई।
चहुं दिशि आनंद उमग्यो, लोक भई भाई॥ ॐ जय...॥
पतित पावन हरणी भव भय की भारी।
शरण गहे जो तेरी, उतरे भव से पारी॥ ॐ जय...॥
कृष्ण भक्ति प्रदायिनी भव की डरहारी।
चरण कमल ध्यावत सुर नर मुनि भारी॥ ॐ जय...॥
व्रत जो करे तुम्हारा विधि विधान से।
पाप कटे सब उसके, छूटे भव मान से॥ ॐ जय...॥
यमुना जल सम पावन महिमा अति भारी।
गावत वेद पुराण सब, महिमा तुम्हारी॥ ॐ जय...॥
जो यह आरती गावे ध्यावे मन लागी।
उसकी सब विपदा हरै, होय दुःख भागी॥ ॐ जय...॥
पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ
प्रथम पद में भक्त माता की वंदना करते हुए पुकारता है कि हे एकादशी माता! आपकी जय हो। आप ही इस संसार में जीवों का उद्धार करने वाली हैं। सतगुरु की कृपा से हम आपके चरणों में ध्यान लगाते हैं और आपकी कृपा दृष्टि की अभिलाषा करते हैं।
द्वितीय पद का भाव यह है कि देवराज इंद्र, देवी लक्ष्मी (कमला), समस्त ऋषि-मुनि, देवर्षि नारद और सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी भी निरंतर आपके चरणों का ध्यान करते हैं। आपकी महिमा का गान त्रिभुवन में होता है।
तृतीय और चतुर्थ पद में आरती के समय बजने वाले वाद्ययंत्रों जैसे डमरू, मृदंग और सहनाई का वर्णन है, जो दिव्यता का प्रतीक हैं। आप पतितों को पावन करने वाली और भवसागर के भयों को हरने वाली हैं। जो भी आपकी शरण में आता है, वह इस भवसागर से आसानी से तर जाता है।
पंचम और षष्ठ पद में यह स्पष्ट किया गया है कि यह व्रत और आरती श्री कृष्ण की भक्ति प्रदान करने वाली है। विधि-विधान से आपका व्रत करने वाले मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वह आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाता है।
गायन का राग, ताल एवं धुन
इस पावन आरती का गायन मुख्य रूप से 'राग यमन' या 'राग भैरवी' में किया जाता है। शास्त्रीय संगीत के जानकारों के अनुसार, जब इसे मध्य लय में 'तीनताल' (16 मात्रा) या 'कहवा ताल' (8 मात्रा) के साथ गाया जाता है, तो यह श्रोताओं के मन में अद्भुत भक्ति रस और शांति का संचार करती है। हारमोनियम, मंजीरा और मृदंग की थाप के साथ जब यह आरती गाई जाती है, तो वातावरण पूरी तरह से पवित्र और ऊर्जावान हो जाता है।
दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि
आरती करने की एक निश्चित शास्त्रीय पद्धति होती है। थाली में शुद्ध घी का दीपक (पंचमुखी या एकमुखी), कपूर, रोली, अक्षत, पुष्प और जल का आचमन रखना चाहिए। आरती करते समय निम्नलिखित क्रम का पालन करना अनिवार्य है:
- सबसे पहले भगवान और माता के चरणों में चार बार दीप घुमाएं।
- दो बार उनकी नाभि या मध्य भाग की ओर घुमाएं।
- एक बार उनके मुखमंडल की ओर घुमाएं।
- अंत में सात बार संपूर्ण शरीर या विग्रह के चारों ओर पूर्ण चक्र में आरती घुमाएं।
इस प्रकार कुल सात बार थाली घुमाने से ब्रह्मांड की सातों ऊर्जाओं का संतुलन साधक के भीतर स्थापित होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
कर्पूर का महत्व व फलश्रुति
आरती के अंत में कपूर प्रज्वलित करने का गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ है। जिस प्रकार कपूर अग्नि में जलकर बिना कोई अवशेष छोड़े पूर्णतः विलीन हो जाता है, उसी प्रकार साधक का अहंकार भी ज्ञान की अग्नि में जलकर नष्ट हो जाना चाहिए। यह जीवात्मा के परमात्मा में पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। इस आरती की फलश्रुति यह है कि जो भी भक्त पूरी श्रद्धा, नियम और निष्ठा के साथ इस आरती का पाठ करता है, उसके घर में सुख, शांति, ऐश्वर्य और आरोग्य का वास होता है तथा अंत में उसे परम पद की प्राप्ति होती है।