॥ सूर्य देव जी की आरती - जय कश्यप नंदन ॐ जय अदिति नंदन त्रिभुवन तिमिर निकंदन भक्त हृदय चंदन ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता
सनातन संस्कृति में सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जिन्हें चक्षुः प्रसूति (संसार की आँख) कहा जाता है। 'जय कश्यप नंदन ॐ जय अदिति नंदन' आरती सूर्योपासना के क्षेत्र में एक अत्यंत महिमामयी, कर्णप्रिय और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रचना है। महर्षि कश्यप और माता अदिति के महान नंदन (पुत्र) के रूप में भगवान सूर्य की स्तुति करती हुई यह आरती साधक के भीतर आलस्य, अंधकार, अज्ञान और नकारात्मक ऊर्जा का नाश कर सकारात्मकता, ओज, तेज और ब्रह्म चेतना का संचार करती है।
इस आरती के रचयिता के संबंध में पौराणिक और लोक परंपराओं में दो धाराएं मिलती हैं। एक और जहां इसे प्राचीन वैदिक संप्रदाय की स्तोत्र परंपरा का सरल लोक-रूपांतरण माना जाता है, वहीं दूसरी ओर मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के संतों और कवियों द्वारा इसे जनसामान्य के कल्याणार्थ ब्रज-अवधि प्रभावित हिंदी में ढाला गया माना जाता है। सूर्य देव को अर्घ्य देने के उपरांत जब इस आरती का गान किया जाता है, तो संपूर्ण वातावरण सूर्य के सप्त अश्वों की गति जैसी दिव्य लय से प्रकंपित हो उठता है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित आदित्य हृदय स्तोत्र के बाद, दैनिक उपासना में इस आरती का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल
जय कश्यप नंदन, ॐ जय अदिति नंदन।
त्रिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चंदन॥
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भान।
सप्त अश्व पर साजे, रथ पर तुम विराजे।
लोचन तेज बिराजे, पातक सब भाजे॥
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भान।
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, तुम ही हो ईश्वर।
जग के प्राण सजीवन, तुम ही सुख आकर॥
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भान।
जो जन तुमको ध्यावै, मनवांछित फल पावै।
दुख दरिद्र मिट जावै, संकट टरि जावै॥
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भान।
वेद पुराण बखाने, महिमा सब जग जाने।
ऋषि मुनि तुमको ध्यावें, देवगण सिर नावें॥
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भान।
आरती जो कोई गावै, नित प्रति चित लावै।
सूरज सम सुख पावै, भवसागर तर जावै॥
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भान।
पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ
प्रथम पद:
जय कश्यप नंदन, ॐ जय अदिति नंदन। त्रिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चंदन॥
भावार्थ: हे महर्षि कश्यप के पुत्र (कश्यप नंदन) और माता अदिति के नंदन (अदिति नंदन), आपकी जय हो! आप तीनों लोकों (स्वर्ग, म्र्त्य, पाताल) के अज्ञान और अंधकार रूपी तिमिर का नाश करने वाले हैं। आप अपने भक्तों के हृदय के लिए चंदन के समान शीतल, पवित्र और शांतिदायक हैं।
द्वितीय पद:
सप्त अश्व पर साजे, रथ पर तुम विराजे। लोचन तेज बिराजे, पातक सब भाजे॥
भावार्थ: आपके रथ में सात घोड़े (जो सप्ताह के सातों दिनों के प्रतीक हैं) जुते हुए हैं और आप उस पर विराजमान हैं। आपके नेत्रों में अद्भुत ब्रह्मांडीय तेज दमकता है, जिसके दर्शन मात्र से भक्तों के सारे पाप (पातक) भाग जाते हैं।
तृतीय पद:
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, तुम ही हो ईश्वर। जग के प्राण सजीवन, तुम ही सुख आकर॥
भावार्थ: त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में आप ही सर्वेश्वर हैं। इस संपूर्ण जगत के लिए आप प्राणवायु और जीवन शक्ति (सजीवन) हैं। आप ही समस्त सुखों के मूल उद्गम (सुख आकर) हैं।
चतुर्थ पद:
जो जन तुमको ध्यावै, मनवांछित फल पावै। दुख दरिद्र मिट जावै, संकट टरि जावै॥
भावार्थ: जो भी मनुष्य सच्ची श्रद्धा के साथ आपका ध्यान करता है, वह अपनी इच्छा के अनुसार मनोवांछित फल प्राप्त करता है। उसके जीवन के सभी दुख और दरिद्रता नष्ट हो जाते हैं तथा सारे संकट टल जाते हैं।
पंचम पद:
वेद पुराण बखाने, महिमा सब जग जाने। ऋषि मुनि तुमको ध्यावें, देवगण सिर नावें॥
भावार्थ: समस्त वेद और पुराण आपकी महानता का बखान करते हैं। आपकी महिमा से सारा संसार भली-भांति परिचित है। महान ऋषि-मुनि आपका ध्यान करते हैं और देवतागण भी आपके चरणों में अपना सिर झुकाते हैं।
षष्ठम पद:
आरती जो कोई गावै, नित प्रति चित लावै। सूरज सम सुख पावै, भवसागर तर जावै॥
भावार्थ: जो भी साधक इस आरती को प्रतिदिन पूर्ण चित्त और एकाग्रता के साथ गाता है, वह सूर्य के समान तेजस्वी सुख प्राप्त करता है और अंत में इस भवसागर को पार कर जाता है।
गायन का राग, ताल एवं धुन
संगीत शास्त्र की दृष्टि से सूर्य देव की यह आरती ऊर्जावान, ओजस्वी और सात्विक भावों को जगाने वाली है। इसे प्रातःकाल के समय गाया जाता है, इसलिए इसके गायन के लिए 'राग भैरवी', 'राग बिलावल' या 'राग यमन' को अत्यंत उपयुक्त माना गया है।
- राग: बिलावल और भैरवी (प्रातःकालीन वेला के अनुकूल)।
- ताल: কাহারवा (कहरवा - 4/4 ताल) या दादरा ताल (6 मात्राएं), जो लयबद्ध तरीके से आरती की थाली घुमाने में अत्यंत सहायक होती है।
- लय: मध्य लय (Medium Tempo), जिससे शब्दों का उच्चारण स्पष्ट हो और उच्चारण का शुद्ध कंपन साधक के चक्रों को जागृत कर सके।
- वाद्य यंत्र: हारमोनियम, मंजीरा, मृदंग या ढोलक और घंटी (घंटा)।
दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि
सूर्य देव की आरती करते समय निम्नलिखित शास्त्रीय नियमों और विधियों का पालन करना अनिवार्य माना गया है:
- स्नान व अर्घ्य: सूर्योदय के समय स्नानादि से निवृत्त होकर तांबे के लोटे में जल, लाल रोली, अक्षत और लाल पुष्प लेकर 'ॐ सूर्याय नमः' या 'ॐ घृणि सूर्याय नमः' मंत्र का उच्चारण करते हुए सूर्य देव को अर्घ्य दें।
- आसन: पूर्व दिशा की ओर मुख करके तांबे के पात्र या शुद्ध आसन पर बैठें या खड़े हों।
- दीपक: आरती की थाली में शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। कपूर का भी प्रयोग किया जा सकता है।
- थाली घुमाने का क्रम:
- सबसे पहले भगवान सूर्य के चरणों की ओर दीपक को 4 बार घुमाएं।
- इसके पश्चात उनकी भुजाओं और तेज की ओर 2 बार घुमाएं।
- मुखमंडल की ओर 1 बार घुमाएं।
- अंत में संपूर्ण विग्रह (समग्र रूप) की ओर 7 बार गोलाकार रूप में आरती की थाली को घुमाएं।
- आचमन व समर्पण: आरती पूर्ण होने के बाद दोनों हाथों से आरती की ज्योति को अपनी आँखों और मस्तक पर लगाएं और अंत में आचमन कर जल भूमि पर छोड़ें।
कर्पूर का महत्व व फलश्रुति
आरती के अंत में कपूर जलाने का विशेष आध्यात्मिक अर्थ है। जिस प्रकार कपूर बिना किसी अवशेष (शेष राख) के अग्नि में पूरी तरह जलकर समाप्त हो जाता है, ठीक उसी प्रकार साधक के भीतर का अहंकार, वासनाएं और अज्ञान भी इस दिव्य ज्ञान-अग्नि में भस्म हो जाने चाहिए। कपूर की सुगंध संपूर्ण वातावरण को शुद्ध कर देती है, जिससे नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार होता है।
फलश्रुति: इस पावन सूर्य आरती का नियमित पाठ करने वाले व्यक्ति को कभी भी तेज, आरोग्य, यश और कीर्ति की कमी नहीं होती। नेत्र रोग, चर्म रोग और अस्थि संबंधी समस्याओं से मुक्ति मिलती है। समाज में मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है और मनुष्य अंत में सूर्य लोक को प्राप्त होता है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
प्रश्नोत्तर एक: सूर्य देव की आरती कब और किस समय करनी चाहिए?
उत्तर: सूर्य देव की आरती हमेशा प्रातः काल सूर्योदय के तुरंत बाद, जब आप सूर्य को अर्घ्य देते हैं, उस समय करना सबसे उत्तम माना गया है।
प्रश्नोत्तर दो: सूर्य आरती करते समय किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ होता है?
उत्तर: सूर्य देव को लाल, पीला, केसरिया या सुनहरे रंग के वस्त्र अति प्रिय हैं। अतः इन रंगों के वस्त्र पहनकर सूर्य उपासना करना अत्यंत फलदायी होता है।
प्रश्नोत्तर तीन: क्या बिना स्नान किए सूर्य देव की आरती की जा सकती है?
उत्तर: नहीं, सूर्य देव प्रत्यक्ष देवता हैं और इनकी उपासना में स्वच्छता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। स्नान के बिना सूर्य अर्घ्य या आरती वर्जित है।
प्रश्नोत्तर चार: सूर्य देव की आरती करने से कौन से मुख्य लाभ प्राप्त होते हैं?
उत्तर: सूर्य आरती से आरोग्यता, तेज, उत्तम स्वास्थ्य, आत्मविश्वास, यश, मान-सम्मान और नेत्रों की ज्योति में वृद्धि होती है तथा कुंडली के सूर्य दोष शांत होते हैं।