॥ श्री यमराज भगवान की पावन आरती - ॐ जय यमराज देवा, स्वामी जय यमराज देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★धर्मराज यमराज को न्याय का अधिष्ठाता और दक्षिण दिशा का स्वामी माना जाता है। वे सूर्यपुत्र हैं और सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं। श्री यमराज की आरती करना न केवल भय से मुक्ति दिलाता है, बल्कि यह हमें अपने कर्मों के प्रति सजग और धर्मपरायण बनाता है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय यमराज देवा, स्वामी जय यमराज देवा।
पाप-पुण्य के ज्ञाता, तुम हो न्याय-अभेदा॥ ॐ जय यमराज देवा॥
सूर्यपुत्र तुम कहलाते, न्याय धर्म के स्वामी।
जीव-जगत की रक्षा करते, अंतर्यामी नामी॥ ॐ जय यमराज देवा॥
दंड-विधान तुम्हारा सच्चा, कोई न बच पाता।
कर्म-फल के अनुसार ही, सबको फल मिल जाता॥ ॐ जय यमराज देवा॥
महिष सवारी करते प्रभु तुम, दण्ड हाथ में धारी।
भक्तों के तुम रक्षक स्वामी, मिटाओ विपदा भारी॥ ॐ जय यमराज देवा॥
यम-द्वितीया के दिन जो नर, पूजा तुमको करते।
अकाल मृत्यु का भय न उनको, सब संकट वे हरते॥ ॐ जय यमराज देवा॥
चित्रगुप्त हैं सहायक जिनके, लेखा-जोखा रखते।
सत्य मार्ग पर चलने वाले, भवसागर को तरते॥ ॐ जय यमराज देवा॥
ॐ जय यमराज देवा, स्वामी जय यमराज देवा।
पाप-पुण्य के ज्ञाता, तुम हो न्याय-अभेदा॥ ॐ जय यमराज देवा॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
इस आरती का भाव यह है कि यमराज केवल मृत्यु के देवता नहीं, बल्कि वे 'धर्मराज' हैं। 'ॐ जय यमराज देवा' का अर्थ है कि हम उस परम न्यायकर्ता को नमन करते हैं जो पाप और पुण्य के भेद को भली-भांति जानते हैं। वे सूर्य के पुत्र हैं, अतः उनमें तेज और प्रकाश का वास है। वे न्याय के स्वामी हैं, जिसका अर्थ है कि उनके दरबार में किसी के साथ अन्याय नहीं होता। 'दंड-विधान' पंक्ति हमें याद दिलाती है कि हमारे कर्म ही हमारा भविष्य तय करते हैं। 'यम-द्वितीया' का उल्लेख भाई-बहन के प्रेम और यमराज की कृपा को दर्शाता है, जहाँ यमराज ने यमुना को वरदान दिया था कि जो भाई-बहन इस दिन यमुना में स्नान करेंगे, वे अकाल मृत्यु से बचेंगे।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, यमराज वेदों में 'पितृपति' कहे गए हैं। वे पितरों के लोक के अधिपति हैं। यमराज की पूजा करने से व्यक्ति के भीतर अनुशासन आता है। वे यम-नियम के प्रतीक हैं। उनकी उपासना करने से व्यक्ति के मन से मृत्यु का भय निकल जाता है और वह जीवन के सत्य को स्वीकार कर धर्म के मार्ग पर अग्रसर होता है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
- प्रातःकाल या सायंकाल स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- यमराज की प्रतिमा या चित्र को पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर मुख करके स्थापित करें।
- शुद्ध घी का दीपक जलाएं।
- धूप, दीप, नैवेद्य और पुष्प अर्पित करें।
- आरती करते समय घंटी और शंख का प्रयोग करें।
- आरती के पश्चात क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
- शुद्ध गाय का घी
- कपूर (आरती के लिए)
- तांबे या पीतल की थाली
- धूपबत्ती या अगरबत्ती
- ताजे पुष्प (विशेषकर लाल पुष्प)
- नैवेद्य (मिठाई या फल)
- शंख और घंटी
राग, ताल एवं गायन समय
यमराज की आरती को शांत और गंभीर भाव से गाना चाहिए। इसके लिए 'राग कल्याण' या 'राग यमन' अत्यंत उपयुक्त है। इसे मध्यम लय में गाया जाना चाहिए ताकि मन में शांति और श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से यमराज की आरती करने से व्यक्ति के भीतर सत्य बोलने का साहस आता है। यह मानसिक शांति प्रदान करता है और व्यक्ति को गलत कार्यों से दूर रहने की प्रेरणा देता है। अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।