॥ श्री विठ्ठल भगवान की पावन आरती - युगे अठ्ठावीस विटेवरी उभा, वामांगी रखुमाई दिसे शोभा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★भगवान विठ्ठल, जिन्हें महाराष्ट्र और संपूर्ण भारत में पाण्डुरंग, विठोबा और पंढरीनाथ के नाम से जाना जाता है, जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु के ही अवतार हैं। पंढरपुर के पावन धाम में चन्द्रभागा नदी के तट पर ईंट (वीट) पर कमर पर हाथ रखकर खड़े भगवान विठ्ठल की यह महिमा अत्यंत अलौकिक है। उनके साथ उनकी अर्द्धांगिनी माता रखुमाई (रुक्मिणी) की यह जोड़ी भक्तों को भवसागर से पार लगाने वाली है। 'युगे अठ्ठावीस विटेवरी उभा' से प्रारंभ होने वाली यह आरती केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि भक्त पुंडलिक के प्रति भगवान के अगाध प्रेम और शरणागत वत्सल स्वभाव का जीवंत दस्तावेज है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम भगवान विठ्ठल की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गूढ़ भावार्थ, नियम, पूजा विधि और इसके आध्यात्मिक लाभों का संपूर्ण अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
युगे अठ्ठावीस विटेवरी उभा। वामांगी रखुमाई दिसे शोभा॥<पुंडलिके भेटी परब्रह्म आले। चरणकमळी त्याचे तयांचे वाहिले॥
जय देव जय देव जय पाण्डुरंगा। ध्यानी मनी तुझे चरण संग॥धृ॥
तुळसी हार गळा कंसे कासे पितांबर। आवडीने केली रूपाची ती साजिरी साजिरी॥
दर्शन मात्रे मन झाले समाधान। पांडुरंगा तुझे रूप हे अनुपम॥
जय देव जय देव जय पाण्डुरंगा...॥
चन्द्रभागा तीरी उभासे विटेवरी। भक्त काज लागी धावे घराघरी॥
कृपेचा सागर नामाचा कैवारी। भक्तांसी सांभाळी अंतरी बाहेरी॥
जय देव जय देव जय पाण्डुरंगा...॥
ओवाळू आरती चरणांवर माथा। तूचि माझा पिता तूचि माझी माता॥
दास पांडुरंगा चरणीं तुझा वास। तुझ्या दर्शने भागे सर्व आश ॥
जय देव जय देव जय पाण्डुरंगा...॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान विठ्ठल की इस महान आरती की प्रत्येक पंक्ति भक्तों के हृदय में भक्ति का रस घोल देती है। आइए इसके विस्तृत भावार्थ को समझते हैं:
प्रथम चरण का अर्थ: 'युगे अठ्ठावीस विटेवरी उभा, वामांगी रखुमाई दिसे शोभा' का अर्थ है कि हे पाण्डुरंग! आप अठ्ठावीस युगों से इस ईंट पर अनवरत खड़े हुए हैं। आपके बाईं ओर (वामांगी) माता रखुमाई (रुक्मिणी जी) विराजमान हैं, जिनकी शोभा अत्यंत मनमोहक और अलौकिक है। 'पुंडलिके भेटी परब्रह्म आले' यह उस पौराणिक प्रसंग को दर्शाता है जब परमब्रह्म स्वयं अपने परम भक्त पुंडलिक की माता-पिता की सेवा से प्रसन्न होकर उससे मिलने उसके द्वार आए थे और पुंडलिक ने उनके स्वागत के लिए ईंट फेंक दी थी, जिस पर आज भी भगवान खड़े हैं।
द्वितीय चरण का अर्थ: 'तुळसी हार गळा कंसे कासे पितांबर' - भगवान के गले में पवित्र तुलसी की माला सुशोभित है और उनके कटिप्रदेश पर पीतांबर (पीले वस्त्र) शोभा दे रहे हैं। उनके इस रूप का दर्शन मात्र करने से ही मानव मन की समस्त चिंताएं और अशांति समाप्त हो जाती है। भक्त कहता है कि हे पांडुरंगा! आपका यह रूप अत्यंत अनुपम और ध्यान आकर्षित करने वाला है।
तृतीय चरण का अर्थ: 'चन्द्रभागा तीरी उभासे विटेवरी, भक्त काज लागी धावे घराघरी' - भगवान पंढरपुर में पवित्र चन्द्रभागा (भीमा) नदी के तट पर विट (ईंट) पर खड़े होकर अपने भक्तों की पुकार सुनते हैं। जब भी किसी भक्त पर संकट आता है, वे दौड़े चले आते हैं। वे भक्तों के दुखों को हरने वाले और केवल 'विठ्ठल' नाम मात्र से प्रसन्न होने वाले कृपालु सागर हैं।
चतुर्थ चरण का अर्थ: 'ओवाळू आरती चरणांवर माथा, तूचि माझा पिता तूचि माझी माता' - भक्त अपनी संपूर्ण आस्था के साथ चरणों में अपना मस्तक झुकाकर यह आरती उतार रहा है। वह भगवान को ही अपना माता-पिता और सर्वस्व मानता है। संत एकनाथ, संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम जैसे महान संतों ने इसी भाव से पाण्डुरंग की सेवा की है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
पंढरपुर के विठोबा और रखुमाई की यह आरती वारकरी संप्रदाय की रीढ़ है। स्कंद पुराण और पद्म पुराण में भगवान विठ्ठल के इस स्वरूप का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। यह माना जाता है कि भगवान विष्णु ने भक्त पुंडलिक की अनन्य माता-पिता भक्ति की परीक्षा लेने के बाद उन्हें वरदान दिया था कि वे युगों-युगों तक इसी रूप में इस ईंट पर खड़े रहेंगे ताकि संसार के प्राणी उनके दर्शन मात्र से मोक्ष प्राप्त कर सकें। इस आरती का गान करने से मनुष्य के जन्म-जन्म के पाप कट जाते हैं और उसे पंढरीनाथ की प्राप्ति होती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
- प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके पवित्र वस्त्र धारण करें।
- विठ्ठल-रखुमाई की मूर्ति या चित्र को पाटे (चौकी) पर स्थापित करें।
- शुद्ध घी का दीपक जलाकर और धूप-अग्रबत्ती अर्पित करें।
- भगवान को तुलसी दल, पीले पुष्प, चंदन और नैवेद्य (प्रसाद) अर्पित करें।
- आरती की थाली को क्लॉकवाइज (घड़ी की दिशा में) कम से कम सात बार घुमाएं।
- आरती के पश्चात भगवान की परिक्रमा करें और क्षमा प्रार्थना करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
- शुद्ध घी का दीपक या कपूरदानी
- धूपबत्ती और अगरबत्ती
- ताजे पीले फूल और तुलसी दल
- अक्षत (बिना टूटे हुए चावल)
- घंटी और शंख
- नैवेद्य या प्रसाद (मिश्री, फल या माखन-मिश्री)
- तांबे या पीतल की सजी हुई थाली
राग, ताल एवं गायन समय
इस आरती को मुख्यतः राग कल्याण, यमन या पारंपरिक वारकरी धुन में गाया जाता है। इसे दादरा या कहहरवा ताल में गाया जाता है जो इसके भक्ति रस को और अधिक प्रगाढ़ बनाता है। इस आरती को करने का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल मंगला आरती के समय (सुबह 4 बजे से 5 बजे) या संध्या कालीन बेला (संध्या आरती, शाम 7 बजे से 8 बजे के बीच) का होता है। एकादशी के पवित्र दिनों में इसका सामूहिक गान विशेष फलदायी माना जाता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
जो भी भक्त नित्य प्रति इस पावन आरती का श्रद्धापूर्वक गान और श्रवण करता है, उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मानसिक तनाव दूर होता है, परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। अंतकाल में उसे वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है और वह भगवान पाण्डुरंग के चरण कमलों में स्थान पाता है।