पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री माँ विंध्यवासिनी आरती
7 पाठ

श्री विंध्याचल माता की पावन आरती - जय विंध्यवासिनी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन / भैरवी शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री विंध्याचल माता की पावन आरती - जय विंध्यवासिनी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

माँ विंध्यवासिनी की पवित्र नगरी विंध्याचल भारत के सबसे प्राचीन और जागृत शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ भगवती आदिशक्ति अपने त्रिगुणमयी स्वरूप - महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के साथ साक्षात विराजमान हैं। विंध्य पर्वत पर निवास करने के कारण इन्हें 'विंध्यवासिनी' कहा जाता है। विंध्याचल धाम में माँ की पावन आरती का गायन करना और श्रवण करना साधक के जीवन के समस्त दुखों का नाश कर परम शांति, भुक्ति और मुक्ति प्रदान करता है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत आरती गाइड में हम माँ विंध्यवासिनी की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गूढ़ भावार्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि और इसके आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

जय विंध्यवासिनी माता, तू ही जगत की त्राता।
मैया जय विंध्यवासिनी माता, तू ही जगत की त्राता॥
ऊँ जय विंध्यवासिनी माता...

धवल शंख मंजीर बजत मन भावे, डमरू डम-डम बाजत अस्तुति मन लावे।
देवन के सिरताज मुकुट मणि साजे, चरण कमल पर भ्रमर सदा ही छाजे॥
ऊँ जय विंध्यवासिनी माता...

ब्रह्मा, विष्णु, शिवजी तेरी सेवा करते, वेद पुराण निरंतर महिमा उच्चरते।
रूप चतुर्भुज धारी त्रिभुवन की माता, आदि शक्ति जगदम्बे संकट सब त्राता॥
ऊँ जय विंध्यवासिनी माता...

बालक रूप धरे तू कंस पछतायो, कृष्ण जन्म ले देवकी को सुख पायो।
योगनिद्रा तू कहलाई कंस डर पायो, हाथ छुटाकर आसमान में पहुँचो हरसायो॥
ऊँ जय विंध्यवासिनी माता...

विंध्य पर्वत पर तेरा सुंदरि थान विराजे, त्रिकोण यंत्र पर शक्ति तेरी राजै।
अष्टभुजी महाकाली महालक्ष्मी माता, महासरस्वती स्वरूपा भक्तन की त्राता॥
ऊँ जय विंध्यवासिनी माता...

धूप, दीप, नैवेद्य आरती जो कोई गावे, सुख-संपत्ति पाकर भवसागर तर जावे।
दास तुम्हारा जो नित्या ध्यान लगावे, मनवांछित फल पाकर बैकुंठ सिधावे॥
ऊँ जय विंध्यवासिनी माता...

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

माँ विंध्यवासिनी की यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह सनातन वैदिक चेतना और शाक्त परंपरा का जीवंत दस्तावेज है। प्रत्येक पंक्ति में माता के दिव्य स्वरूप और उनके परम प्रभाव का सुंदर वर्णन किया गया है।

"जय विंध्यवासिनी माता, तू ही जगत की त्राता।"
इस प्रथम पंक्ति में भक्त माता की जयकार करते हुए उन्हें पूरे ब्रह्मांड का पालनहार और रक्षक (त्राता) स्वीकार करता है। विंध्य पर्वत पर निवास करने वाली हे माता, आप ही संपूर्ण सृष्टि का कल्याण करने वाली हैं।

"धवल शंख मंजीर बजत मन भावे..."
आरती के समय बजने वाले शंख, मंजीर और डमरू की मधुर ध्वनियाँ मन को प्रफुल्लित करती हैं। देवताओं के मुकुट की मणियाँ माता के चरणों में झुकती हैं और उनके चरण-कमलों का भ्रमर रूपी भक्त हमेशा पान करना चाहते हैं।

"ब्रह्मा, विष्णु, शिवजी तेरी सेवा करते..."
इस संसार के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, पालनकर्ता विष्णु और संहारकर्ता शिव स्वयं आदिशक्ति माता विंध्यवासिनी की वंदना और सेवा करते हैं। वेद और पुराण निरंतर माता की महिमा का गान करते हैं।

"बालक रूप धरे तू कंस पछतायो..."
यह पौराणिक प्रसंग श्रीमद्भागवत और हरिवंश पुराण से जुड़ा है, जहाँ योगनिद्रा के रूप में माता यशोदा के यहाँ प्रकट हुईं और कंस को उसकी पराजय का संदेश देकर विंध्याचल पर्वत पर आकर स्थापित हो गईं।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

सनातन धर्म में विंध्याचल धाम को सिद्धपीठों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। मार्कंडेय पुराण और दुर्गा सप्तशती के अनुसार, विंध्य पर्वत ही वह पवित्र स्थल है जहाँ आदिशक्ति ने विभिन्न असुरों का वध किया और ब्रह्मांड की रक्षा की।

विंध्याचल में गंगा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर त्रिकोण साधना का प्रमुख केंद्र है, जहाँ एक ही प्रांगण में माँ विंध्यवासिनी, माता काली और माता अष्टभुजा के दर्शन होते हैं। इस त्रिकोण परिक्रमा और प्रतिदिन होने वाली संध्या आरती का महत्व अश्वमेघ यज्ञ के समान माना गया है। जो भी भक्त विंध्याचल में नियमित रूप से माता की आरती करता है, उसके कुल में सात पीढ़ियों तक अकाल मृत्यु या दारिद्र्य का भय नहीं रहता है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

माता विंध्यवासिनी की आरती शास्त्रीय विधान और पूर्ण श्रद्धा के साथ करनी चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना अनिवार्य है:

  • प्रातःकाल ब्रह्म बेला में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
  • मंदिर या पूजा घर को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
  • माँ विंध्यवासिनी की मूर्ति या चित्र के समक्ष चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर उनकी स्थापना करें।
  • शुद्ध घी का दीपक और धूपबत्ती प्रज्वलित करें।
  • आरती की थाल में रोली, अक्षत, पुष्प, कुमकुम और कपूर रखें।
  • आरती गाते समय एक लय और ताल के साथ क्लॉकवाइज (घड़ी की सुई की दिशा में) थाल को कम से कम चार बार घुमाएं।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

एक संपूर्ण और फलदायी आरती के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना आवश्यक है:

  • पंचमुखी या एकमुखी दीप: शुद्ध गाय के घी या तिल के तेल का दीपक।
  • कपूर: आरती के अंत में माता की नजर उतारने और वातावरण को शुद्ध करने के लिए।
  • आरती की थाल: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
  • घंटी और शंख: नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मक स्पंदन के लिए।
  • पुष्प एवं अक्षत: माता के चरणों में अर्पित करने के लिए ताजे फूल और साबुत चावल।
  • नैवेद्य या भोग: मखाने, पतासे, फल या मिष्ठान का भोग।

राग, ताल एवं गायन समय

माँ विंध्यवासिनी की आरती का गायन प्रायः संध्या बेला (प्रदोष काल) में करना सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अतिरिक्त प्रातःकाल की मंगला आरती का भी विशेष महत्व है।

इस आरती को गाने के लिए राग कल्याण या राग यमन का प्रयोग किया जाता है, जो मन में भक्तिभाव और शीतलता का संचार करते हैं। ताल के रूप में कहरवा (8 मात्रा) या दादरा (6 मात्रा) ताल का उपयोग करने से आरती का प्रवाह बहुत ही आनंददायक हो जाता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नित्य नियम से श्री विंध्याचल माता की आरती करने और सुनने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक शांति: तनाव, अवसाद और मानसिक अशांति से मुक्ति मिलती है।
  • शत्रु विजय: गुप्त और प्रकट शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
  • आरोग्य लाभ: शारीरिक बीमारियाँ दूर होती हैं और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
  • धन-धान्य की वृद्धि: माँ महालक्ष्मी की कृपा से घर में कभी भी अन्न और धन का अभाव नहीं होता।
  • मोक्ष प्राप्ति: अंत समय में भगवती के चरणों में स्थान प्राप्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: विंध्यवासिनी माता की आरती किस समय करनी चाहिए?
उत्तर: माता विंध्यवासिनी की आरती मुख्य रूप से प्रातः काल (मंगला आरती) और संध्या काल (संध्या आरती) में करनी चाहिए। प्रदोष काल में आरती करना अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है।

प्रश्न 2: क्या घर पर विंध्यवासिनी माता की आरती की जा सकती है?
उत्तर: हाँ, आप अपने घर के पूजा मंदिर में माता विंध्यवासिनी का चित्र या विग्रह स्थापित कर विधि-विधान से प्रतिदिन सुबह और शाम आरती कर सकते हैं।

प्रश्न 3: विंध्याचल में त्रिकोण परिक्रमा का क्या महत्व है?
उत्तर: विंध्याचल धाम में माँ विंध्यवासिनी, माँ काली और माँ अष्टभुजा—इन तीनों रूपों के दर्शन की त्रिकोण परिक्रमा करने से समस्त मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और महाशक्ति की कृपा मिलती है।

प्रश्न 4: आरती के समय शंख और घंटी क्यों बजाई जाती है?
उत्तर: शंख और घंटी की ध्वनि से उत्पन्न होने वाले कंपन से वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और सकारात्मक तथा दैवीय ऊर्जा का संचार होता है।

१. श्री विंध्याचल माता की पावन आरती - जय विंध्यवासिनी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री माँ विंध्यवासिनी के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री माँ विंध्यवासिनी जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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