॥ श्री बासुकी नाग जी की आरती - ॐ जय बासुकी देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं नाग पंचमी विशेष ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन धर्म में नाग देवताओं को भगवान शिव का आभूषण और ब्रह्मांड की संतुलन शक्ति के रूप में पूजा जाता है। नागों के राजा श्री बासुकी नाग (Vasuki Nag) का हिंदू पौराणिक कथाओं में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। समुद्र मंथन के समय जब क्षीरसागर को मथा जा रहा था, तब मंदराचल पर्वत को मथनी और बासुकी नाग को रस्सी (नेती) बनाया गया था। नाग पंचमी और अन्य विशेष पर्वों पर बासुकी नाग जी की आरती करने से कालसर्प दोष शांत होता है, घर में सुख-समृद्धि आती है और नाग देवता की कृपा से सर्प भय से मुक्ति मिलती है। Bhaktilok.in के इस पावन आलेख में प्रस्तुत है श्री बासुकी नाग जी की सम्पूर्ण आरती, उसका विस्तृत भावार्थ, पूजा की विधि और धार्मिक महत्व।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
ॐ जय बासुकी देवा, स्वामी जय बासुकी देवा।
फन पर मणि चमके, त्रिभुवन भय हरता॥ ॐ जय...
शेष नाग के तुम राजा, भक्तों के रखवाले।
अमृत मंथन में तुमने, कष्ट बहुत पाले॥ ॐ जय...
मंदराचल पर्वत की, डोरी तुम बने महान।
देव-दानव मिलकर के, करते तुम्हारा गुणगान॥ ॐ जय...
शिवजी के गले में तुम, हार बनके सोते हो।
भक्तों की पीड़ा को पल में दूर करते हो॥ ॐ जय...
नाग पंचमी के दिन जो, ध्यान तुम्हारा धरते।
उनके जीवन के संकट, पल में दूर करते॥ ॐ जय...
दूध और लावा जो, श्रद्धा से चढ़ावे।
मनवांछित फल पाकर, भव से तर जावे॥ ॐ जय...
जो कोई गावे आरती, बासुकी जी की प्यारे।
उसके घर में सदा, वास करें भंडारे॥ ॐ जय...
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
श्री बासुकी नाग जी की यह दिव्य आरती केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि भक्तों के लिए रक्षा कवच है। आइए इस आरती की प्रत्येक पंक्ति के गूढ़ भावार्थ को समझते हैं:
प्रथम पद का भावार्थ: "ॐ जय बासुकी देवा, स्वामी जय बासुकी देवा। फन पर मणि चमके, त्रिभुवन भय हरता॥" - हे बासुकी देव! आपकी जय हो। आपके फन पर दैदीप्यमान मणियां सुशोभित हैं, जो तीनों लोकों के अंधकार और भय का नाश करती हैं। आपके दर्शन मात्र से भक्तों के सारे भय समाप्त हो जाते हैं।
द्वितीय पद का भावार्थ: "शेष नाग के तुम राजा, भक्तों के रखवाले। अमृत मंथन में तुमने, कष्ट बहुत पाले॥" - आप नागराज हैं और अपने सभी शरणागत भक्तों की रक्षा करते हैं। पौराणिक काल में जब देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन हुआ, तब आपने मंदराचल पर्वत को अपने शरीर से लपेटकर (रस्सी बनकर) महान कष्ट सहन किए और ब्रह्मांड को अमृत प्राप्ति में सहयोग दिया।
तृतीय पद का भावार्थ: "शिवजी के गले में तुम, हार बनके सोते हो। भक्तों की पीड़ा को पल में दूर करते हो॥" - भगवान महादेव जो कि स्वयं संपूर्ण ब्रह्मांड के आराध्य हैं, वे आपको अपने गले में आभूषण (हार) की तरह धारण करते हैं। आप भगवान शिव के इतने प्रिय हैं कि भक्तों की पीड़ा हरने में आप सदा तत्पर रहते हैं।
चतुर्थ पद का भावार्थ: "नाग पंचमी के दिन जो, ध्यान तुम्हारा धरते। उनके जीवन के संकट, पल में दूर करते॥" - श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि यानी नाग पंचमी के पावन पर्व पर जो भी भक्त पूरी श्रद्धा से आपका ध्यान, पूजन और आरती करता है, उसके जीवन के समस्त संकट और बाधाएं समाप्त हो जाती हैं।
पंचम पद का भावार्थ: "दूध और लावा जो, श्रद्धा से चढ़ावे। मनवांछित फल पाकर, भव से तर जावे॥" - जो भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ नाग देवता को दूध, लावा और पुष्प अर्पित करते हैं, वे अपनी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण कर इस भवसागर से तर जाते हैं।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
हिन्दू पौराणिक ग्रंथों में नाग जाति को अत्यंत शक्तिशाली और दिव्य माना गया है। बासुकी नाग भगवान शिव के अनन्य गणों और आभूषणों में प्रमुख हैं। पुराणों के अनुसार, बासुकी नाग पाताल लोक के राजाओं में गिने जाते हैं और उनकी महानता का वर्णन स्वयं श्री कृष्ण ने भगवद्गीता में 'अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्' कहकर किया है (जहाँ उन्होंने स्वयं को नागों में वासुकी/अनंत बताया है)।
समुद्र मंथन का प्रसंग बासुकी नाग के बिना अधूरा है। जब देवताओं और दानवों में अमृत प्राप्ति के लिए संघर्ष चल रहा था, तब भगवान विष्णु के निर्देशानुसार बासुकी नाग को ही मथनी (मंदराचल) की नेती (रस्सी) बनाया गया था। इस भीषण मंथन के दौरान बासुकी नाग के शरीर पर जो घर्षण हुआ, उससे उत्पन्न हलाहल विष और श्रम को उन्होंने सहन किया। इस महान उपकार के कारण वे संपूर्ण सृष्टि द्वारा पूजनीय बने।
नाग पंचमी के दिन बासुकी नाग की पूजा करने से राहु-केतु के दुष्प्रभावों और कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। कृषि में वृद्धि होती है क्योंकि नाग खेतों के चूहों और कीटों को खाकर किसानों की फसल की रक्षा करते हैं।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
- स्थान की शुद्धि: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें।
- मूर्ति स्थापना: बासुकी नाग की प्रतिमा, तस्वीर या मिट्टी से बने नाग देवता के प्रतीक को चौकी पर स्थापित करें।
- षोडशोपचार पूजन: जल, रोली, अक्षत, पीले या लाल पुष्प, दूर्वा, धूप, दीप और नैवेद्य (विशेषकर दूध, लावा और मिष्ठान) अर्पित करें।
- मंत्र जाप: पूजा के दौरान 'ॐ वासुकिनाय नमः' या 'सर्वे नागाः प्रीयन्ताम् मे ये कगले संस्थिताः' मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
- आरती गान: घी का दीपक और कपूर जलाकर श्रद्धापूर्वक शंख और घंटी की ध्वनि के साथ बासुकी नाग की आरती गाएं।
- प्रसाद वितरण: आरती के पश्चात उपस्थित भक्तों में प्रसाद वितरित करें और क्षमा प्रार्थना करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
आरती को विधि-विधान से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:
- शुद्ध घी का दीपक (पंचमुखी या एकमुखी)
- कपूर और प्रज्वलित करने के लिए माचिस
- पूजा की थाली (तांबे, पीतल या चांदी की)
- ताजे पुष्प (विशेषकर पीले और सफेद फूल)
- रोली, कुमकुम और अक्षत (चावल)
- धूपबत्ती और अगरबत्ती
- शंख और घंटी (Ghanti & Shankh)
- नैवेद्य के लिए दूध, लावा, बताशे या मिठाई
- जल से भरा आचमनी या कलश
राग, ताल एवं गायन समय
श्री बासुकी नाग जी की आरती को शास्त्रीय संगीत के राग कल्याण या राग यमन की धुनों में गाया जाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस आरती का गायन मध्यलय (Moderate Tempo) में करना चाहिए ताकि शब्दों का उच्चारण स्पष्ट रहे।
गायन का सर्वोत्तम समय:
- प्रतिदिन प्रातः काल की पूजा के समय (विशेषकर सोमवार को)
- श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की नाग पंचमी के दिन
- जब भी कालसर्प दोष निवारण या महामृत्युंजय अनुष्ठान किया जा रहा हो
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
बासुकी नाग जी की आरती नियमित रूप से करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- कालसर्प दोष शांति: कुंडली में उपस्थित कालसर्प दोष और पितृ दोष का प्रभाव कम होता है।
- भय मुक्ति: जीवन से अज्ञात भय, शत्रुओं का भय और सर्प भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
- कुण्डलिनी जागरण: योग साधना और कुंडलिनी जागरण के मार्ग में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं क्योंकि मूलाधार चक्र में नाग शक्ति का ही वास माना गया है।
- आरोग्य लाभ: विषजन्य रोगों और चर्म रोगों से रक्षा होती है।
- पारिवारिक सुख-शांति: घर-परिवार में कलह समाप्त होकर सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।