॥ श्री वराह भगवान की आरती - ॐ जय वराह देवा, स्वामी जय वराह देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन धर्म में भगवान विष्णु के अवतारों की श्रृंखला में तृतीय अवतार 'श्री वराह भगवान' का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और ब्रह्मांडीय कल्याणकारी है। जब दैत्य हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को रसातल में डुबो दिया था, तब सृष्टि की रक्षा और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए श्री हरि ने महावराह (सूअर) रूप धारण कर अपने विशाल दाँतों पर पृथ्वी को सुरक्षित उठाया था। भगवान वराह की यह आरती न केवल उनके इस महापराक्रम की वंदना करती है, बल्कि साधक के अंतःकरण के अज्ञान रूपी अंधकार को भी दूर करती है। Bhaktilok.in के इस पावन आलेख में हम भगवान वराह की संपूर्ण आरती, उसके गूढ़ भावार्थ, नियम, पूजा विधि और आध्यात्मिक लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय वराह देवा, स्वामी जय वराह देवा।
धरा उद्धारन कारन, जग के तुम खेवा।। ॐ जय वराह देवा...॥
ररकार रूप धारे, पाताल को पधारे।
हिरण्याक्ष संहारे, सुर मुनि जन तारे।। ॐ जय वराह देवा...॥
दंत अग्र धर वसुधा, लीला अति भारी।
देखत सुर विमानन, जय जय कारी भारी।। ॐ जय वराह देवा...॥
ब्रह्मा शिव सुर द्विज सनकादिक गुण गावें।
ध्यान धरत योगी जन, परम गति पावें।। ॐ जय वराह देवा...॥
रूप विशाल तुम्हारा, त्रिभुवन मन मोहे।
कोटि काम छवि लज्जित, कोटिन रवि सोहे।। ॐ जय वराह देवा...॥
भगतन के प्रतिपालक, संकट सब टारे।
शरण गहे की लज्जा, राखु कुंजरारे।। ॐ जय वराह देवा...॥
आरती जो कोई गावे, नित प्रति नर नारी।
वांछित फल सब पावे, उतरे भव से पारी।। ॐ जय वराह देवा...॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान वराह की यह आरती अत्यंत ओजस्वी और भक्तिरस से परिपूर्ण है। इसके प्रत्येक शब्द में भगवान के पराक्रम और उनकी करुणा का गुणगान किया गया है। आइए इस आरती के गूढ़ भावार्थ को समझें:
आरती के आरंभ में भक्तगण भगवान वराह की वंदना करते हुए कहते हैं—हे प्रभु, हे वराह देव! आपकी जय हो। आप ही इस संसार की नैया को पार लगाने वाले खेवनहार (खैवैया) हैं, जिन्होंने रसातल में डूबी हुई धरा (पृथ्वी) का उद्धार किया है। भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा के लिए वराह अवतार लिया और पाताल लोक में जाकर क्रूर दैत्य हिरण्याक्ष का वध किया। इस प्रकार उन्होंने देवताओं, ऋषियों और मुनियों को भयमुक्त किया और उनका उद्धार किया।
आगे की पंक्तियों में उनके अद्भुत पराक्रम का वर्णन है कि भगवान ने अपनी दाँतों के अग्रभाग पर संपूर्ण पृथ्वी को धारण कर लिया। उनकी यह लीला इतनी अलौकिक और विशाल थी कि आकाश से देवी-देवता विमानों में बैठकर उनके इस रूप के दर्शन कर रहे थे और जय-जयकार कर रहे थे। ब्रह्मा, शिव, ब्राह्मण और सनकादि ऋषि निरंतर उनके गुणों का गान करते हैं। योगी जन जिनका ध्यान धरकर परम मोक्ष (गति) को प्राप्त होते हैं, वे ही वराह भगवान हमारे आराध्य हैं।
आरती के अंत में भक्त प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! आपका यह विशाल रूप तीनों लोकों के प्राणियों के मन को मोह लेता है। आपके इस दिव्य रूप के आगे करोड़ों कामदेवों की सुंदरता भी लज्जित हो जाती है और करोड़ों सूर्यों के समान आपकी कांति दमकती है। आप अपने भक्तों के सच्चे प्रतिपालक हैं और उनके समस्त संकटों को हरने वाले हैं। जो भी मनुष्य श्रद्धा और नियम के साथ इस आरती का गान करता है, वह समस्त भौतिक सुखों को भोगता हुआ अंत में भवसागर से पार हो जाता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
पुराणों के अनुसार, भगवान वराह का प्राकट्य श्वेत वाराह कल्प के आरंभ में हुआ था। यह अवतार यह संदेश देता है कि भगवान किसी भी योनि में प्रकट होकर अपने भक्तों की रक्षा कर सकते हैं और धर्म की स्थापना कर सकते हैं। वराह रूप का अर्थ है—वह शक्ति जो अज्ञान और प्रलय के कीचड़ से निकालकर धर्म को पुनर्जीवित करती है। भगवान वराह की आरती गाने या सुनने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है, भूमि और भवन से संबंधित दोष दूर होते हैं, तथा कुंडली में राहु-केतु और शनि के अशुभ प्रभाव शांत होते हैं।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
भगवान वराह की आरती करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:
- प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर भगवान वराह या उनके विग्रह (या शालिग्राम रूप) को स्थापित करें।
- धूप, दीप, रोष्ट, अक्षत, नैवेद्य और तुलसी दल अर्पित करें।
- आरती करते समय मन को एकाग्र रखें और घंटी तथा शंखनाद के साथ सस्वर आरती गाएं।
- आरती के पश्चात भगवान को प्रणाम कर अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
एक आदर्श आरती के थाल में निम्नलिखित सामग्रियों का होना अनिवार्य है:
- चांदी, पीतल या तांबे का स्वच्छ थाल
- शुद्ध घी का दीपक (या कपूर की जोत)
- रोटी, कुमकुम और अक्षत (चावल)
- ताजे पुष्प और तुलसी दल
- आरती उतारने के लिए घंटी और शंख
- भगवान को भोग लगाने के लिए मिष्ठान या फल
राग, ताल एवं गायन समय
भगवान वराह की आरती को 'राग कल्याण' या 'राग यमन' की धुनों में गाया जाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसे तीन ताल (16 मात्राओं) या कहरवा ताल (8 मात्राओं) में गाया जा सकता है। आरती का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल (सूर्योत्सव के समय) या प्रदोष काल (संध्या बेला) का होता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से श्री वराह भगवान की आरती करने से साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- जीवन में आने वाली बड़ी से बड़ी बाधाएं और संकट स्वतः दूर हो जाते हैं।
- भूमि विवाद, मकान निर्माण में आने वाली अड़चनें और प्रॉपर्टी से जुड़े मामलों में विजय मिलती है।
- मन शांत रहता है और भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है।
- अंत समय में वैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है और मनुष्य चक्रव्यूह रूपी संसार से मुक्त हो जाता है।