पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री भगवान विष्णु (वराह अवतार) आरती
10 पाठ

श्री वराह भगवान की पावन आरती - ॐ जय वराह देवा, स्वामी जय वराह देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री वराह भगवान की पावन आरती - ॐ जय वराह देवा, स्वामी जय वराह देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म में भगवान विष्णु के दशअवतारों का विशेष महत्व है, जिनमें से तृतीय अवतार भगवान वराह के रूप में जाना जाता है। जब दैत्य हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को रसातल में पहुँचा दिया था, तब भगवान श्रीहरि ने विशाल वराह (सूअर) रूप धारण कर अपने दाँतों पर पृथ्वी को सुरक्षित उठाया था। भगवान वराह की यह पावन आरती (ॐ जय वराह देवा) भक्तों के जीवन के सभी संकटों को दूर करने वाली और ब्रह्मांडीय संतुलन को स्थापित करने वाली मानी जाती है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत गाइड में हम वराह आरती के संपूर्ण बोल, उसका गहरा आध्यात्मिक भावार्थ, पूजा विधि और इसके अचूक फलश्रुति की चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय वराह देवा, स्वामी जय वराह देवा।
प्रलय काल से उद्धारक, तुम ही हो देवा॥ ॐ जय वराह देवा॥

धरणी धारी महाबाहु, क्षीर सिंधु वासी।
असुर संहारक प्रभुजी, तुम घट-घट वासी॥ ॐ जय वराह देवा॥

हिरण्याक्ष को संहारा, पाताल सिधायो।
दंत-अग्र पर पृथ्वी को, तुरत उठायो॥ ॐ जय वराह देवा॥

देव मुनि जन सब मिलकर, जयकार पुकारे।
संकट मोचन स्वामी, भव से सब तारे॥ ॐ जय वराह देवा॥

नील शिला सम काया, तेजोमय रूपा।
भक्तन के हितकारी, भव-भय हर सूपा॥ ॐ जय वराह देवा॥

धूप दीप नैवेद्यम, अर्चन हम करते।
चरण कमल की सेवा, भव बंधन हरते॥ ॐ जय वराह देवा॥

जो जन वराह आरती, प्रेम सहित गावे।
वांछित फल पाकर के, परम गति पावे॥ ॐ जय वराह देवा॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

भगवान वराह की यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के चक्र में भगवान विष्णु की महिमा का गुणगान है। आइए इस आरती की प्रत्येक पंक्ति के गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ को समझें:

"ॐ जय वराह देवा, स्वामी जय वराह देवा। प्रलय काल से उद्धारक, तुम ही हो देवा॥"
इस प्रारंभिक पंक्ति में भक्त भगवान वराह की वंदना करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु! जब सम्पूर्ण सृष्टि प्रलय के जल में डूब जाती है और चारों ओर अंधकार व विनाश होता है, तब केवल आप ही इस चराचर जगत का उद्धार करते हैं। आप ही हमारे सर्वप्रधान स्वामी हैं।

"धरणी धारी महाबाहु, क्षीर सिंधु वासी। असुर संहारक प्रभुजी, तुम घट-घट वासी॥"
यहाँ भगवान को 'धरणी धारी' (पृथ्वी को धारण करने वाले) और 'महाबाहु' (विशाल भुजाओं वाले) कहकर संबोधित किया गया है। आप क्षीरसागर में निवास करने वाले नारायण ही हैं, जो समय आने पर अधर्मी असुरों का संहार करते हैं और प्रत्येक प्राणी के हृदय में अंतर्यामी रूप से वास करते हैं।

"हिरण्याक्ष को संहारा, पाताल सिधायो। दंत-अग्र पर पृथ्वी को, तुरत उठायो॥"
यह पंक्ति वराह पुराण की उस महान पौराणिक कथा की याद दिलाती है जब दुष्ट हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को चुराकर रसातल में छिपा दिया था। भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण किया, पाताल लोक गए, दुष्ट हिरण्याक्ष का वध किया और अपनी विशाल दाँतों (दंत-अग्र) पर पूरी पृथ्वी को सुरक्षित ऊपर उठा लिया।

"देव मुनि जन सब मिलकर, जयकार पुकारे। संकट मोचन स्वामी, भव से सब तारे॥"
पृथ्वी के पुनः अपनी कक्षा में स्थापित होने पर समस्त देवी-देवता, ऋषि-मुनि अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान वराह की जय-जयकार की। भक्त प्रार्थना करते हैं कि हे संकट मोचन! आप इसी प्रकार हम सभी भक्तों को इस भवसागर से पार उतारें।

"नील शिला सम काया, तेजोमय रूपा। भक्तन के हितकारी, भव-भय हर सूपा॥"
भगवान वराह के शरीर की आभा नीले पर्वत (नील शिला) के समान विशाल और गंभीर है। उनका रूप असीम तेज से परिपूर्ण है। वे सदैव अपने भक्तों का कल्याण करने वाले और उनके जन्म-मरण के भय को हरने वाले परम कृपालु हैं।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

सनातन संस्कृति में वराह अवतार का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। पुराणों के अनुसार, वराह कल्प की शुरुआत इसी अवतार से जुड़ी हुई है। जब पृथ्वी रसातल में चली गई थी, तब संपूर्ण ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया था। भगवान विष्णु ने अपनी योगमाया से वराह रूप प्रकट किया, जो यज्ञपुरुष के रूप में भी जाने जाते हैं।

वराह आरती करने से न केवल पर्यावरण और पृथ्वी के प्रति हमारी कृतज्ञता प्रकट होती है, बल्कि यह हमारे भीतर छिपे अहंकार (हिरण्याक्ष रूपी प्रवृत्ति) का नाश भी करती है। जो मनुष्य नियमित रूप से वराह भगवान की आरती गाता है, उसे भूमि दोष, वास्तु दोष और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है। यह आरती पर्यावरण संरक्षण और पृथ्वी की पवित्रता बनाए रखने का आध्यात्मिक संदेश भी देती है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

किसी भी देव-आराधना में विधि-विधान का होना उसकी सफलता को सुनिश्चित करता है। भगवान वराह की आरती करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

  • प्रातःकाल या संध्याकाल: वराह आरती मुख्य रूप से भूमि पूजन, गोवर्धन पूजा, या विशेष विष्णु पूजन के दिन सुबह या संध्या के समय की जानी चाहिए।
  • शुद्धता: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। आसन पर बैठकर मन को शांत रखें।
  • पंचोपचार पूजन: भगवान वराह की मूर्ति या उनके चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित करें। गंध, पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • आरती का क्रम: दीपक को प्रज्वलित कर भगवान के चरणों में चार बार, नाभि क्षेत्र में दो बार और मुख मंडल पर तीन बार घुमाते हुए कुल सात बार घुमाएं। तदुपरांत शंख और घंटी बजाकर जयकारा लगाएं।
  • आचमन: आरती समाप्त होने के बाद हाथ धोकर आचमन करें और आरती को परिवार के सभी सदस्यों तक पहुँचाएं ताकि सभी उस पवित्र ऊर्जा को ग्रहण कर सकें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

आरती को विधिपूर्वक संपन्न करने के लिए निम्नलिखित पूजन सामग्री का होना अनिवार्य है:

  • पूजा की थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
  • दीपक: शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक (रुई की बाती के साथ)।
  • कपूर: आरती को अंतिम रूप से प्रज्वलित करने और सुगंधित करने हेतु शुद्ध कपूर।
  • घंटी और शंख: नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मक स्पंदन के लिए पीतल की घंटी और दक्षिणावर्ती शंख।
  • पुष्प और अक्षत: भगवान के चरणों में अर्पित करने के लिए ताजे फूल और साबुत चावल।
  • नैवेद्य: गुड़, फल या मिश्री का भोग।

राग, ताल एवं गायन समय

संगीत और भक्ति का गहरा नाता है। भगवान वराह की यह आरती 'राग कल्याण' या 'राग यमन' की स्वर लहरियों में गाने पर अत्यंत कर्णप्रिय और मन को शांति देने वाली प्रतीत होती है। इसे কাহারवा या तीन ताल की लय में गाया जा सकता है। आरती का सर्वोत्तम समय प्रदोष काल (संध्या का समय) अथवा विष्णु मंदिरों में होने वाले अनुष्ठानों के दौरान होता है। इस आरती को सामूहिक रूप से गाने से संपूर्ण वातावरण ऊर्जावान और पवित्र हो जाता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

भगवान वराह की आरती का नियमित पाठ करने से साधक को अनंत आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • भूमि और संपत्ति लाभ: जिन जातकों की कुंडली में भूमि विवाद या वास्तु दोष होता है, उनके लिए यह आरती अचूक उपाय है।
  • निर्भयता की प्राप्ति: यह आरती मनुष्य के भीतर से सभी प्रकार के अज्ञात भय, चिंता और हीन भावना को समाप्त करती है।
  • पाप नाश: जाने-अनजाने में हुए पापों का प्रायश्चित होता है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • पर्यावरण चेतना: यह हमें प्रकृति और पृथ्वी माता का सम्मान करने की प्रेरणा देती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न: भगवान वराह की आरती कब करनी चाहिए?
उत्तर: भगवान वराह की आरती मुख्य रूप से विष्णु अवतरण दिवस, भूमि पूजन, वराह जयंती या दैनिक संध्या वंदन के समय की जा सकती है।

प्रश्न: क्या घर पर वराह भगवान की मूर्ति रखकर आरती की जा सकती है?
उत्तर: हाँ, आप भगवान विष्णु के वराह रूप के चित्र या विग्रह की स्थापना कर विधि-विधान से आरती कर सकते हैं।

प्रश्न: वराह आरती के समय कौन सा शंख बजाना श्रेष्ठ है?
उत्तर: दक्षिणावर्ती शंख का प्रयोग पूजा और आरती के समय करना सबसे अधिक शुभ और फलदायी माना गया है।

प्रश्न: इस आरती को करने से किस दोष का निवारण होता है?
उत्तर: इस पावन आरती के नियमित पाठ से भूमि दोष, वास्तु दोष तथा राहु-केतु से संबंधित कष्टों में शांति मिलती है।

१. श्री वराह भगवान की पावन आरती - ॐ जय वराह देवा, स्वामी जय वराह देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान विष्णु (वराह अवतार) के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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