॥ श्री वरदमयूर भगवान की पावन आरती - जय मयूरध्वज देवा, स्वामी जय मयूरध्वज देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन धर्म और पौराणिक कथाओं में श्री वरदमयूर भगवान यानी श्री मयूरध्वज देवा का चरित्र त्याग, परम सत्य, अटूट भक्ति और शरणागत वत्सलता का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। राजा मयूरध्वज की निष्ठा और भगवान श्रीकृष्ण की परीक्षा की कथा से जुड़ा यह पावन स्वरूप भक्तों को धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है। भगवान श्री वरदमयूर की आरती का गान करने से साधक के जीवन में आ रही समस्त बाधाएं दूर होती हैं, मानसिक शांति प्राप्त होती है और मोक्ष के द्वार खुलते हैं। Bhaktilok.in के इस विशेष और विस्तृत आरती गाइड में हम श्री मयूरध्वज देवा की संपूर्ण आरती, इसके गहरे दार्शनिक भावार्थ, सटीक पूजा विधि और इसके आध्यात्मिक लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
जय मयूरध्वज देवा, स्वामी जय मयूरध्वज देवा। चरण शरण जो आवे, उसका हो बेड़ा पार ॥ जय मयूरध्वज देवा...॥
नील मयूर विराजे, आसन अति सुंदर। भक्तन के हितकारी, काटत भव बंधन ॥ जय मयूरध्वज देवा...॥
शीश मुकुट धरे सोहे, मणियों की ज्योति। दर्शन पावत जिनके, मिट जाती कुमति ॥ जय मयूरध्वज देवा...॥
हाथ चक्र शंख सोहे, गदा पद्म धारी। दीनन के प्रतिपालक, संकट हारी भारी ॥ जय मयूरध्वज देवा...॥
धर्म ध्वजा फहराए, सत्य सनातन का। आरी चीर तन दीन्हा, प्रमाण वचन का ॥ जय मयूरध्वज देवा...॥
आरती जो कोई गावे, ध्यान धरे मन में। पाप कटे सब उसके, आवत न जनम में ॥ जय मयूरध्वज देवा...॥
बोलो श्री वरदमयूर भगवान की जय! जय मयूरध्वज देवा, स्वामी जय मयूरध्वज देवा ॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान श्री वरदमयूर की यह आरती केवल स्तुति नहीं है, बल्कि उनके महान चरित्र और भक्त-भगवान के बीच के पवित्र प्रेम का सजीव दस्तावेज है। आइए इस आरती की प्रत्येक पंक्ति के भावार्थ को गहराई से समझें:
प्रथम चरण: "जय मयूरध्वज देवा, स्वामी जय मयूरध्वज देवा। चरण शरण जो आवे, उसका हो बेड़ा पार ॥" — इस पंक्ति का अर्थ है कि हे मयूरध्वज भगवान! आपकी जय हो। जो भी भक्त सच्चे मन से आपकी शरण में आता है, आप उसके जीवन नैया को भवसागर से पार लगा देते हैं और उसे सभी दुखों से मुक्ति प्रदान करते हैं।
द्वितीय चरण: "नील मयूर विराजे, आसन अति सुंदर। भक्तन के हितकारी, काटत भव बंधन ॥" — भगवान का स्वरूप मयूर (मयूर वाहन या मयूर से जुड़े लांछन) के साथ अत्यंत मनमोहक है। वे अपने भक्तों के हमेशा हितैषी हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र रूपी भव बंधनों को काटकर उन्हें मुक्ति दिलाते हैं।
तृतीय चरण: "शीश मुकुट धरे सोहे, मणियों की ज्योति। दर्शन पावत जिनके, मिट जाती कुमति ॥" — उनके मस्तक पर सुशोभित मुकुट और उसमें लगी मणियों की अलौकिक ज्योति इतनी पावन है कि उनके दर्शन मात्र से मनुष्य की दुर्बुद्धि (कुमति) और अज्ञानता का नाश हो जाता है।
चतुर्थ चरण: "हाथ चक्र शंख सोहे, गदा पद्म धारी। दीनन के प्रतिपालक, संकट हारी भारी ॥" — भगवान विष्णु के अंशावतार या उनके रूप के समान ही मयूरध्वज देवा के हाथों में चक्र, शंख, गदा और पद्म सुशोभित हैं। वे गरीबों, असहायों और दीनों के पालनहार हैं तथा बड़े से बड़े संकट को क्षण भर में हर लेते हैं।
पंचम चरण: "धर्म ध्वजा फहराए, सत्य सनातन का। आरी चीर तन दीन्हा, प्रमाण वचन का ॥" — यह पंक्ति राजा मयूरध्वज की उस ऐतिहासिक परीक्षा की याद दिलाती है जब उन्होंने अपने वचनों को सत्य साबित करने के लिए अपने शरीर को आरी से चीरने तक की अनुमति दे दी थी। यह उनके सत्य और धर्म के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक है।
षष्ठ चरण: "आरती जो कोई गावे, ध्यान धरे मन में। पाप कटे सब उसके, आवत न जनम में ॥" — जो भी भक्त इस पावन आरती को श्रद्धापूर्वक गाता है और एकाग्रचित्त होकर उनका ध्यान करता है, उसके संचित पाप नष्ट हो जाते हैं और वह पुनः जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं फंसता, बल्कि परम धाम को प्राप्त होता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, राजा मयूरध्वज अपनी दानशीलता, सत्यवादिता और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति के लिए विश्व प्रसिद्ध थे। महाभारत काल से जुड़ी कथा के अनुसार, एक बार पांडवों के अश्वमेध घोड़े को मयूरध्वज के पुत्र ताम्रध्वज ने पकड़ लिया था, जिसके बाद स्वयं श्रीकृष्ण और अर्जुन ने मयूरध्वज की परीक्षा लेने का निर्णय किया। भगवान श्रीकृष्ण ने एक भूखे सिंह का रूप धारण किया और मयूरध्वज के सामने यह शर्त रखी कि वह अपने पुत्र के आधे शरीर को काटकर सिंह को भोजन कराएं। राजा और रानी ने बिना किसी संकोच और आंसू के अपने ही हाथों से अपने पुत्र को आरी से चीरकर सिंह को तृप्त किया। इस महान परीक्षा में मयूरध्वज खरे उतरे और भगवान ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर वरदान दिया। तब से उन्हें 'श्री वरदमयूर भगवान' के रूप में पूजा जाने लगा। उनकी आरती करने से मनुष्य के अंदर त्याग, समर्पण और सत्य के मार्ग पर चलने की शक्ति उत्पन्न होती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
भगवान श्री वरदमयूर की आरती को विधि-विधान के साथ करने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है:
- शुद्धता: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मंदिर या पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
- प्रतिमा स्थापना: चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर श्री वरदमयूर भगवान की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- पंचोपचार पूजन: भगवान को रोली, अक्षत, पीले पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य (भोग) अर्पित करें।
- आरती का क्रम: पूजा के उपरांत घी का दीपक और कपूर जलाकर श्रद्धा भाव से तांबे या पीतल की थाल में आरती सजाएं।
- प्रदक्षिणा: आरती गाते समय थाल को घड़ी की सुई की दिशा में (clockwise) कम से कम तीन बार घुमाएं।
- चरणामृत और पुर्णाहुति: आरती के पश्चात भगवान को प्रणाम करें, उपस्थित भक्तों में आरती लें और चरणामृत वितरित करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
एक आदर्श आरती संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना अनिवार्य है:
| सामग्री का नाम | विवरण एवं महत्व |
|---|---|
| पूजा की थाल | पीतल, तांबे या चांदी की स्वच्छ थाल। |
| दीपक | शुद्ध गाय के घी का दीपक (रुई की बाती के साथ)। |
| कपूर | शुद्ध भीमसेनी कपूर, जो वातावरण को सुगंधित और पवित्र करता है। |
| घंटी (Ghanti) | नकारात्मक ऊर्जा दूर करने और सकारात्मक स्पंदन हेतु। |
| शंख (Shankh) | आरती के प्रारंभ और अंत में नाद करने के लिए। |
| पुष्प और अक्षत | भगवान के चरणों में अर्पित करने और आरती के समय हाथ में रखने हेतु। |
राग, ताल एवं गायन समय
भक्ति संगीत में स्वर और लय का बहुत बड़ा प्रभाव होता है। श्री वरदमयूर भगवान की आरती को मधुरता से गाने के लिए निम्नलिखित शास्त्रीय पक्षों का ध्यान रखना चाहिए:
- उचित राग: इस आरती को 'राग कल्याण' या 'राग यमन' में गाना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह राग शांति, भक्ति और एकाग्रता का प्रतीक है।
- ताल: इसे कहरवा ताल (8 बीट) या तीन ताल में आसानी से गाया जा सकता है, जो आम भक्तों द्वारा ताल से ताल मिलाने में सुगम होता है।
- गायन समय: इस आरती को प्रतिदिन प्रातःकाल (सूर्योदय के समय) और संध्याकालीन वेला (प्रदोष काल) में गाना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से श्री वरदमयूर भगवान की आरती करने के अनेक चमत्कारिक आध्यात्मिक और मानसिक लाभ हैं:
- मानसिक शांति: मन का भटकाव दूर होता है और ध्यान केंद्रित करने की शक्ति बढ़ती है।
- संकट निवारण: जीवन में आने वाली अचानक आपदाएं, ऋण और शत्रुओं के भय से मुक्ति मिलती है।
- नैतिकता और सत्यनिष्ठा: राजा मयूरध्वज के आशीर्वाद से साधक के भीतर सत्य बोलने और धर्म का पालन करने की अटूट क्षमता विकसित होती है।
- पारिवारिक सुख-शांति: घर-परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आपसी प्रेम व सद्भाव बढ़ता है।