॥ श्री त्रिपुरसुरा सुंदरी माता आरती: मां राजराजेश्वरी की संपूर्ण आरती और विधान ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता
दस महाविद्याओं में तृतीय और सर्वाधिक सौम्य, ऐश्वर्यशाली तथा परा-शक्ति स्वरूप मानी जाने वाली भगवती त्रिपुरसुंदरी को महात्रिपुरसुंदरी, षोडशी, ललिता, राजराजेश्वरी और कामाक्षी के नाम से भी पूजा जाता है। 'त्रिपुर' का अर्थ है तीन पुर—अर्थात् जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएं; सत्व, रज और तम गुण; अथवा मन, बुद्धि और अहंकार। इन तीनों से परे और तीनों का संचालन करने वाली परम चेतना को 'त्रिपुरसुंदरी' कहा गया है। ब्रह्मांड पुराण के अंतर्गत 'ललिता उपाख्यान' में भगवती के प्राकट्य का विशद वर्णन प्राप्त होता है। जब भंडासुर नामक असुर ने देवलोक और ब्रह्मांड को अपने आतंक से निस्तेज कर दिया था, तब देवताओं द्वारा किए गए महाचित्-अग्नि-कुंडीय अनुष्ठान से साक्षात् ललिता महात्रिपुरसुंदरी का उदय हुआ था।
श्रीविद्या और ललिता सहस्रनाम परंपरा में महर्षि अगस्त्य और हयग्रीव भगवान के संवाद द्वारा मां के रूप, लावण्य और आध्यात्मिक गरिमा का ज्ञान प्रकट हुआ। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने 'सौंदर्य लहरी' और 'आनंद लहरी' में देवी के जिस अमृतमयी स्वरूप का वर्णन किया है, वही भक्तिमय भाव प्रस्तुत आरती में प्रस्फुटित होता है। यह आरती मध्यकालीन श्रीविद्या उपासक संतों द्वारा जनमानस के कल्याणार्थ रची गई थी, ताकि जो साधक जटिल तंत्र साधना, न्यास अथवा ललिता सहस्रनाम के त्रिपुटी पाठ में असमर्थ हों, वे भी सहज आरती के माध्यम से मां राजराजेश्वरी के श्रीचरणों का वात्सल्य और अनुग्रह प्राप्त कर सकें। इस आरती का गायन साधक को लौकिक समृद्धि के साथ-साथ परम कैवल्य की अनुभूति कराता है।
सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल
जय त्रिपुर सुन्दरी माता, मैया जय षोडशी माता।
सकल मनोरथ पूरणि, सुख सम्पति दाता॥
ॐ जय त्रिपुर सुन्दरी माता...॥रत्नजटित सिंहासन, मणियमंडल साजे।
कामेश्वर अंक बिराजे, कोटि भानु लाजे॥
ॐ जय त्रिपुर सुन्दरी माता...॥पाशांकुश धनु बाण, कर कमलों में सोहे।
मंद मधुर मुसकानि, सुर मुनि मन मोहे॥
ॐ जय त्रिपुर सुन्दरी माता...॥चिन्मय रूप अनूपा, श्रीचक्र निवासिनी।
कामाक्षी कल्याणी, भव भय विदारिणी॥
ॐ जय त्रिपुर सुन्दरी माता...॥ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, चरण कमल सेवे।
इन्द्रादिक सब देव, नितहि ध्यान धरे॥
ॐ जय त्रिपुर सुन्दरी माता...॥षोडश कला प्रवीणा, अमृत रस बरसावे।
जो जन शरण तुम्हारी, सो भव पार पावे॥
ॐ जय त्रिपुर सुन्दरी माता...॥कर्पूर गौर वदना, करुणामयी अम्बा।
त्रिभुवन वन्द्य चरित्रा, जग आधार स्तम्भा॥
ॐ जय त्रिपुर सुन्दरी माता...॥श्री ललिता त्रिपुरसुन्दरी की, जो आरती गावे।
भक्ति मुक्ति पद पाकर, परम धाम पावे॥
ॐ जय त्रिपुर सुन्दरी माता...॥
पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ
मंगलाचरण एवं सर्वफल प्रदाता स्वरूप
पद्य: जय त्रिपुर सुन्दरी माता, मैया जय षोडशी माता। सकल मनोरथ पूरणि, सुख सम्पति दाता॥
भावार्थ: हे तीनों लोकों की अधिष्ठात्री, सोलह कलाओं से परिपूर्ण भगवती षोडशी, आपकी जय हो! आप शरणागत भक्तों के समस्त धर्मसम्मत मनोरथों को सिद्ध करने वाली हैं। लौकिक जीवन में सुख, शांति, संतान और भौतिक समृद्धि प्रदान करने के साथ-साथ आप पारलौकिक ज्ञान संपदा भी सहज प्रदान करती हैं। साधक अपनी समस्त चिंताओं को विसर्जित कर मां के वात्सल्यमय आंचल में आश्रय ग्रहण करता है।
कामेश्वर संयोग और अलौकिक तेजोमय विग्रह
पद्य: रत्नजटित सिंहासन, मणियमंडल साजे। कामेश्वर अंक बिराजे, कोटि भानु लाजे॥
भावार्थ: मां राजराजेश्वरी चिंतामणि गृह में नवरत्नों से अलंकृत दिव्य सिंहासन पर विराजमान हैं। चारों ओर मणिद्वीप का स्वर्णिम प्रकाश आलोकित हो रहा है। वे परब्रह्म शिवस्वरूप कामेश्वर की गोद (अंक) में वाम भाग में आसीन हैं, जो शिव और शक्ति के अभिन्न अद्वैत तत्त्व का सूचक है। भगवती का देदीप्यमान वर्ण और कांति करोड़ों सूर्यों के सामूहिक तेज को भी लज्जित करती है; यह तेज संहारक नहीं, अपितु कोटि-कोटि चंद्रमाओं जैसी शीतल करुणा से आप्लावित है।
दिव्य आयुध एवं सम्मोहन लीला
पद्य: पाशांकुश धनु बाण, कर कमलों में सोहे। मंद मधुर मुसकानि, सुर मुनि मन मोहे॥
भावार्थ: भगवती अपने चार कर-कमलों में पाश, अंकुश, इक्षु-धनुष (गन्ने का धनुष) और पुष्प-बाण धारण करती हैं। तांत्रिक और आध्यात्मिक दृष्टि से 'पाश' राग अथवा प्रेम का प्रतीक है, 'अंकुश' क्रोध एवं वासनाओं पर नियंत्रण का द्योतक है, 'इक्षु धनुष' एकाग्र मन का प्रतिनिधित्व करता है तथा 'पंच पुष्पबाण' शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध—इन पांच तन्मात्राओं के परिष्कार के प्रतीक हैं। मां की मुखमुद्रा पर विहंसती मंद-मधुर मुस्कान समस्त देवों, गंधर्वों और कठोर तपस्वी मुनियों के अंतःकरण को भी अलौकिक आनंद से मोहित कर लेती है।
श्रीचक्र वास और भवभय नाशिनी शक्ति
पद्य: चिन्मय रूप अनूपा, श्रीचक्र निवासिनी। कामाक्षी कल्याणी, भव भय विदारिणी॥
भावार्थ: मां का स्वरूप जड़ प्रकृति नहीं, अपितु शुद्ध चैतन्य (चिन्मय) है। वे ब्रह्मांड के सर्वोत्कृष्ट ज्यामितीय यंत्र 'श्रीचक्र' के केंद्र बिंदु में स्थित बैंदव चक्र (महाबिंदु) पर निवास करती हैं। वे कामाक्षी हैं—अर्थात् जिनके नेत्रों में ही भक्तों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने और प्रेम रस बरसाने की अलौकिक क्षमता है। वे कल्याणी होकर साधक के जन्म-मरण, व्याधि और सांसारिक क्लेशों रूपी 'भव भय' का समूल उच्छेद करती हैं।
त्रिदेवों की सेविका और देववंदना
पद्य: ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, चरण कमल सेवे। इन्द्रादिक सब देव, नितहि ध्यान धरे॥
भावार्थ: सृष्टि के नियामक ब्रह्मा, पालनकर्ता विष्णु, संहारक रुद्र, तिरोभावकारी ईश्वर और अनुग्रहकर्ता सदाशिव—ये पंच-ब्रह्म मां के सिंहासन के आधारभूत चरण हैं। समस्त देव शक्तियां उनके चरणों में नतमस्तक हैं। इंद्र आदि समस्त लोकपाल प्रतिदिन मां के विराट और कल्याणकारी स्वरूप का ध्यान करते हैं, क्योंकि उनकी सत्ता के बिना समस्त देवता भी चेतनाविहीन हो जाते हैं।
अमृत धारा और भवसिंधु तारण
पद्य: षोडश कला प्रवीणा, अमृत रस बरसावे। जो जन शरण तुम्हारी, सो भव पार पावे॥
भावार्थ: चंद्रमा की सोलह कलाओं की भांति भगवती षोडशी पूर्णता की प्रतीक हैं। उनके चक्र और श्रीविग्रह से निरंतर परमानंद का अमृत झरता है, जो साधक के मूलाधार से सहस्रार तक की चेतना को जाग्रत करता है। जो प्राणी अनन्य भाव से मां की शरण में समर्पित हो जाता है, वह मायावी संसार रूपी अगम्य सागर को बिना किसी भय के सहज ही पार कर लेता है।
कर्पूर कांति और ब्रह्मांड आधार
पद्य: कर्पूर गौर वदना, करुणामयी अम्बा। त्रिभुवन वन्द्य चरित्रा, जग आधार स्तम्भा॥
भावार्थ: मां का मुखमंडल शुद्ध श्वेत कर्पूर के समान निर्मल, निष्कलंक और प्रकाशमान है। वे वात्सल्य की सजीव मूर्ति करुणामयी जगदंबा हैं। तीनों लोकों में पूजनीय उनका चरित्र असीम दया का प्रतीक है और वे इस सम्पूर्ण चर-अचर चराचर जगत का मूल आधार-स्तंभ (महाशक्ति) हैं।
फलश्रुति और परम गति
पद्य: श्री ललिता त्रिपुरसुन्दरी की, जो आरती गावे। भक्ति मुक्ति पद पाकर, परम धाम पावे॥
भावार्थ: जो निष्कपट भक्त, साधक या उपासक मां ललिता त्रिपुरसुंदरी की इस पावन आरती का श्रद्धा और एकाग्रता से नित्य गायन करता है, उसे इहलोक में अनन्य भगवद्-भक्ति तथा अंतकाल में जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त होती है, और वह मां के परम दिव्य धाम (मणिद्वीप) को प्राप्त करता है।
गायन का राग, ताल एवं धुन
मां त्रिपुरसुंदरी की आरती का गायन शास्त्रीय परंपरा में अत्यंत शांत, गंभीर और माधुर्यपूर्ण वातावरण की रचना करता है। देवी के सौम्य एवं राजसी स्वरूप के अनुकूल इस आरती के गायन के शास्त्रीय मानदंड इस प्रकार हैं:
| शास्त्रीय घटक | अनुशंसित विधा / विवरण | आध्यात्मिक प्रभाव |
|---|---|---|
| राग | राग यमन (कल्याण थाट) अथवा राग कल्याणी | यह राग चित्त को शांत कर भक्ति, माधुर्य और समर्पण के भाव को पराकाष्ठा पर पहुंचाता है। |
| ताल | कहरवा ताल (८ मात्रा) अथवा दादरा (६ मात्रा) | लयबद्ध गति साधक के श्वास-प्रश्वास और हृदय चक्र (अनाहत) को सहज स्पंदन प्रदान करती है। |
| लय | मध्यम से विलंबित लय | आरती के प्रत्येक शब्द के तांत्रिक बीजाक्षरों का मानसिक अवगाहन संभव होता है। |
| स्वर प्रकृति | कोमल एवं शुद्ध स्वरों का सन्तुलित प्रयोग | यह स्वर संरचना वातावरण में सकारात्मक और दैवीय ऊर्जा का संचार करती है। |
आरती का गायन करते समय काष्ठ अथवा पीतल की घंटी (घंटा वादन), शंख और मृदंग का धीमा घोष होना चाहिए। स्वर न तो अत्यधिक तीव्र हों और न ही कर्कश; गायन में माँ के प्रति शिशुवत समर्पण और राजराजेश्वरी के प्रति राजसी आदर का समन्वय होना आवश्यक है।
दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि
भगवती त्रिपुरसुंदरी श्रीचक्र की अधिष्ठात्री हैं, अतः उनकी आरती का विधान सामान्य आरतियों से अधिक सूक्ष्म और ऊर्जावान माना गया है। शास्त्रों में आरती को 'नीराजन' कहा गया है, जिसका अर्थ है ईश्वर के प्रति अपने पांचों प्राणों का समर्पण करना।
आवश्यक पूजन सामग्री
- आरती पात्र: शुद्ध पीतल, अष्टधातु या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: पंचमुखी दीपक (पंचप्राण का प्रतीक) अथवा शुद्ध भीमसैनी कर्पूर।
- स्नेह द्रव्य: केवल गाय का शुद्ध देशी घी। रुई की बाती नई और सुवासित होनी चाहिए।
- अक्षत व पुष्प: कुंकुम से रंगे हुए लाल अक्षत और ताजे लाल गुड़हल अथवा गुलाब के पुष्प।
- आचमन पात्र: गंगाजल मिश्रित शुद्ध जल और आचमनी।
- सुगंध द्रव्य: अष्टगंध, चंदन, इत्र (गुलाब या मोगरा) और धूपबत्ती।
आरती थाली घुमाने का शास्त्रीय क्रम
तंत्र शास्त्र और आगम ग्रंथों के अनुसार, मां राजराजेश्वरी की आरती करते समय थाली को ॐ की आकृति अथवा दक्षिणावर्त (Clockwise) चक्राकार क्रम में घुमाया जाता है। इसका निश्चित नियम निम्नलिखित है:
- श्रीचरणों में चार बार (४ बार): सबसे पहले दीपक को मां के चरण कमलों के समक्ष चार बार घुमाएं। यह चार वेदों और चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के समर्पण का प्रतीक है।
- नाभि प्रदेश पर दो बार (२ बार): इसके उपरांत दो बार दीपक को देवी के नाभि मंडल के सामने घुमाएं। यह संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति स्थली और मणिपुर चक्र की शुद्धि का प्रतीक है।
- मुखारविंद पर एक बार (१ बार): तत्पश्चात एक बार मां के अलौकिक, मुसकाते हुए मुखमंडल के समक्ष दीपक घुमाएं, जो आज्ञा चक्र और सत्य के दर्शन का प्रतीक है।
- समस्त विग्रह पर सात बार (७ बार): अंत में मां के संपूर्ण श्रीविग्रह के चारों ओर सिर से पैर तक सात बार दीपक घुमाएं। यह सात लोकों, सात चक्रों और हमारे सप्त धातुओं के संतुलन का सूचक है।
आरती संपन्न होने पर थाली को भूमि पर न रखें, उसे किसी उच्च आसन पर स्थापित करें। तत्पश्चात आचमनी से जल लेकर थाली के चारों ओर तीन बार मंडल बनाकर जल छोड़ें, जिसे 'आरती की परिक्रमा' या 'शीतलीकरण' कहा जाता है। इसके बाद आरती की लौ पर दोनों हथेलियों को फेरकर अपनी आंखों, मस्तक और हृदय पर स्पर्श कराएं।
कर्पूर का महत्व व फलश्रुति
कर्पूर नीराजन का दार्शनिक रहस्य
त्रिपुरसुंदरी पूजा में कर्पूर आरती का स्थान सर्वोच्च है। शास्त्रों में कहा गया है—'कर्पूरगौरं करुणावतारं'। कर्पूर की यह विशेषता होती है कि जब वह अग्नि के संपर्क में जलता है, तो पूर्णतः प्रज्वलित होकर विलीन हो जाता है; वह अपने पीछे न तो कोई भस्म (राख) छोड़ता है और न ही कोई कालिख। आध्यात्मिक दृष्टि से यह साधक के 'अहंकार' का प्रतीक है।
कर्पूर दीपक की भांति साधक मां के चरणों में प्रार्थना करता है कि हे करुणामयी राजराजेश्वरी! मेरा स्थूल, सूक्ष्म और कारण अहंकार आपके ज्ञान रूपी अग्नि में इस प्रकार भस्म हो जाए कि संसार में मेरी स्वतंत्र सत्ता की कोई कालिख या वासना शेष न रहे, और मैं पूर्णतया आपके सच्चिदानंद स्वरूप में लीन हो जाऊं।
दैनिक आरती की फलश्रुति
श्री ललिता महात्रिपुरसुंदरी की नित्य आरती करने और श्रवण करने से निम्नलिखित अलौकिक फलों की प्राप्ति होती है:
- मानसिक शांति और भय निवारण: अवसाद, मानसिक भटकाव, अनिद्रा और अज्ञात भय का नाश होकर चित्त में दिव्य शांति और एकाग्रता का वास होता है।
- श्री और ऐश्वर्य की वृद्धि: श्रीविद्या का संबंध महालक्ष्मी के मूल स्रोत से है। घर में दरिद्रता, गृहक्लेश और ऋण संबंधी बाधाओं का अंत होता है तथा स्थायी समृद्धि आती है।
- कुंडलिनी जागरण में सहायक: जो साधक षट्चक्र भेदन या ध्यान साधना करते हैं, उनके अनाहत और आज्ञा चक्र की ग्रंथियों को खोलने में मां त्रिपुरसुंदरी की आरती अत्यंत प्रभावी मानी जाती है।
- वाक्-सिद्धि और सौम्यता: मां कामाक्षी के प्रभाव से साधक की वाणी में ओज, आकर्षण और सत्य का बल उत्पन्न होता है। समाज में यश और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
- अकाल मृत्यु एवं ग्रह बाधा से सुरक्षा: जन्मकुंडली के समस्त प्रतिकूल ग्रह, विशेषकर चंद्र और शुक्र दोष, मां ललिता की कृपा से स्वतः शांत हो जाते हैं।