पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री श्री सुरभि माता (कामधेनु गोमाता) आरती
10 पाठ

श्री सुरभि माता की पावन आरती - ॐ जय सुरभि माता, मैया जय सुरभि माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री सुरभि माता की पावन आरती - ॐ जय सुरभि माता, मैया जय सुरभि माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म और वेदों में श्री सुरभि माता (कामधेनु गोमाता) को साक्षात् ब्रह्मांड की ऊर्जा, पवित्रता और वात्सल्य की मूरत माना गया है। समुद्र मंथन के दौरान प्रकट हुई कामधेनु गोमाता के रोम-रोम में तेरह करोड़ देवी-देवताओं काि वास माना जाता है। इनकी पावन आरती का गान करने से मनुष्य के जीवन के समस्त कष्ट, पाप और दरिद्रता का नाश होता है तथा सुख, शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। भ_क्तलोक (Bhaktilok.in) के इस पावन मंच पर प्रस्तुत है सुरभि माता की अद्भूत एवं संपूर्ण आरती, जो आपके जीवन में आध्यात्मिक प्रकाश का संचार करेगी।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय सुरभि माता, मैया जय सुरभि माता।
अखिल विश्व की जननी, पावन सुखदाता॥ ॐ जय सुरभि माता॥

क्षीर समुद्र से प्रगटी, तुम हो सुख की खान।
सेवा करने से मिलता, भव से मुक्ति दान॥ ॐ जय सुरभि माता॥

चतुर्थ वेद की माता, यज्ञों की आधार।
तुम्हरे चरण कमलों में, सुर-मुनि बारम्बार॥ ॐ जय सुरभि माता॥

अमृत से भी पावन, तुम्हारा दुग्ध महान।
रोग-दोष सब मिटाए, पावन जल समान॥ ॐ जय सुरभि माता॥

रूद्र रूप तुम धारा, विष्णू का आवास।
ब्रह्माजी के संग में, करती हो निवास॥ ॐ जय सुरभि माता॥

जो जन तुमको ध्यावे, मनवांछित फल पावे।
दुख-दरिद्र भागे सब, सुख घर में आवे॥ ॐ जय सुरभि माता॥

गौशाला की शोभा, भक्तों का कल्याण।
चरणों की धूलि से, तर जाए जहान॥ ॐ जय सुरभि माता॥

आरती जो कोई गावे, प्रेम सहित मन लाय।
भक्ति दान पावे वो, भवसागर तर जाइ॥ ॐ जय सुरभि माता॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री सुरभि माता की यह आरती अत्यंत भावपूर्ण और वेदों के सार पर आधारित है। आइए इसके प्रत्येक पद के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को समझते हैं:

प्रथम पद: 'ॐ जय सुरभि माता, मैया जय सुरभि माता। अखिल विश्व की जननी, पावन सुखदाता॥' - इस प्रथम पंक्ति में हम माता सुरभि की वंदना करते हुए उन्हें संपूर्ण ब्रह्मांड की माता और समस्त जीवों को सुख प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में स्वीकार करते हैं।

द्वितीय पद: 'क्षीर समुद्र से प्रगटी, तुम हो सुख की खान। सेवा करने से मिलता, भव से मुक्ति दान॥' - पौराणिक कथाओं के अनुसार, सुरभि माता क्षीर सागर (दूध के समुद्र) के मंथन से उत्पन्न अमूल्य रत्नों में से एक हैं। उनकी सेवा करने मात्र से मनुष्य भवसागर (जन्म-मृत्यु के चक्र) से मुक्त हो जाता है।

तृतीय पद: 'चतुर्थ वेद की माता, यज्ञों की आधार। तुम्हरे चरण कमलों में, सुर-मुनि बारम्बार॥' - गौ माता के पंचगव्य (दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर) का उपयोग सभी प्रकार के वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों में अनिवार्य रूप से होता है। इसलिए वेदों और यज्ञों की आधारशिला गोमाता ही हैं, जिनके चरणों में देवता और मुनिश्रेष्ठ भी शीश झुकाते हैं।

चतुर्थ पद: 'अमृत से भी पावन, तुम्हारा दुग्ध महान। रोग-दोष सब मिटाए, पावन जल समान॥' - गोमाता का दूध अमृततुल्य है, जो शरीर के तमाम रोगों, मानसिक विकारों और दोषों को दूर कर जीवन में आरोग्यता प्रदान करता है।

पंचम पद: 'रूद्र रूप तुम धारा, विष्णू का आवास। ब्रह्माजी के संग में, करती हो निवास॥' - हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, गोमाता के शरीर में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है, जिससे यह साक्षात् चलता-फिरता तीर्थ बन जाती है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

सनातन परंपरा में गोमाता को केवल एक पशु नहीं, बल्कि जगत जननी 'माता' का दर्जा दिया गया है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि महर्षि कश्यप की पत्नी सुरभि ने कठिन तपस्या करके ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया था कि वे समस्त लोकों में पूजनीय होंगी और उनकी कृपा से जीवों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।

कामधेनु गोमाता के दर्शन मात्र से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। गोमाता के शरीर की परिक्रमा करने से पृथ्वी की परिक्रमा करने का फल मिल जाता है। प्रतिदिन संध्याकाल में या गोधूलि बेला में सुरभि माता की आरती करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और सकारात्मक ऊर्जा, सुख, समृद्धि तथा धन-धान्य का आगमन होता है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  1. प्रातःकाल एवं गोधूलि बेला: सुरभि माता की आरती मुख्य रूप से प्रातःकाल स्नान के पश्चात या संध्याकाल (गोधूलि बेला) में करनी चाहिए।
  2. शुद्धता एवं पवित्रता: पूजा स्थल या गौशाला को स्वच्छ करके गंगाजल का छिड़काव करें। आसन पर बैठकर मन को शांत रखें।
  3. गौ पूजन: सबसे पहले गोमाता को कुमकुम, अक्षत, पुष्प अर्पित करें। उन्हें गुड़ और ताजी हरी घास (ग्रास) खिलाएं।
  4. दीप प्रज्वलन: शुद्ध घी का दीपक और धूपबत्ती जलाकर श्रद्धाभाव से 'ॐ सुरभ्यै नमः' मंत्र का उच्चारण करते हुए आरती थाल घुमाएं।
  5. परिक्रमा एवं क्षमा प्रार्थना: आरती के पश्चात माता की परिक्रमा करें और जाने-अनजाने हुई भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

एक सुव्यवस्थित और फलदायी आरती के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना आवश्यक है:

  • चांदी, तांबे या पीतल की स्वच्छ आरती की थाली।
  • शुद्ध गाय के घी का दीपक (कम से कम एक या पांच बत्तियों वाला)।
  • कपूर की टिकिया और धूप या अगरबत्ती।
  • ताजे फूल, अक्षत (सासाबित चावल) और कुमकुम।
  • पूजा की घंटी और शंख (आरती के दौरान ध्वनि के लिए)।
  • गोमाता को अर्पित करने के लिए गुड़, रोटी और हरी घास।

राग, ताल एवं गायन समय

श्री सुरभि माता की आरती का गान मुख्य रूप से राग कल्याण या राग यमन में किया जाता है, जो मन को असीम शांति और भक्ति रस से भर देता है। इसे कहवा या दादरा ताल (मध्यलय) में गाया जाता है। आरती का आदर्श समय संध्याकाल (गोधूलि बेला, सूर्यास्त के समय) माना गया है, हालांकि प्रातःकाल भी इसका गान अत्यंत कल्याणकारी है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

  • मानसिक शांति: नियमित रूप से सुरभि माता की आरती करने से मानसिक तनाव दूर होता है और चित्त में शांति स्थापित होती है।
  • पितृ दोष मुक्ति: गोसेवा और गोआरती करने से कुंडली के पितृ दोष एवं कालसर्प दोष का शमन होता है।
  • अक्षय पुण्य: घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और लक्ष्मी जी की कृपा हमेशा बनी रहती है।
  • मोक्ष प्राप्ति: अंत समय में भगवत धाम की प्राप्ति होती है और यमराज के भय से मुक्ति मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री सुरभि माता की पावन आरती - ॐ जय सुरभि माता, मैया जय सुरभि माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री सुरभि माता (कामधेनु गोमाता) के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री श्री सुरभि माता (कामधेनु गोमाता) जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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