॥ श्री शीतला माता की आरती - ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★हिन्दू सनातन धर्म में माता शीतला को आरोग्यता, चेचक, खसरा और तमाम उष्णता जनित रोगों की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। स्कन्द पुराण में इनका स्पष्ट वर्णन 'शीतला माता' के रूप में मिलता है जो हाथों में कलश, सूप, मार्ज मार्जरी (झाड़ू) और नीम के पत्ते धारण करती हैं। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि यानी 'बस्योरा' या 'शीतला अष्टमी' के पावन अवसर पर माता शीतला की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता है और माता को ठंडे (बासी) व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। माता शीतला की यह दिव्य आरती (ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता) भक्तों के संताप, शारीरिक कष्टों और दुखों का शमन कर उन्हें आरोग्य व दीर्घायु का वरदान प्रदान करती है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत मार्गदर्शक में हम माता शीतला की संपूर्ण आरती, उसके गूढ़ भावार्थ, पूजा विधि और आध्यात्मिक लाभों का सविस्तार वर्णन कर रहे हैं।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
सबकल्याणकारी, नैय्या भव से तारा॥
(ॐ जय शीतला माता...)
विराजे राजवि राजवि, तू ही जग की माता।
उत्सवी भोग लगावें, सब सुख की दाता॥
(ॐ जय शीतला माता...)
ध्यातैं जो तुम ध्यावें, मनवांछित फल पावें।
सेवक शरण तुम्हारी, भवसागर तर जावें॥
(ॐ जय शीतला माता...)
चैत्र कृष्ण अष्टमी को, जो व्रत जन लावें।
बासी भोजन खावें, अरु मन हरषावें॥
(ॐ जय शीतला माता...)
खर पर सवार राजत, हाथों में सूप सोहै।
नीम के पात डारे, जग मन मोहै॥
(ॐ जय शीतला माता...)
शीतल करो शरीर को, हरौ ताप संताप।
जो जन ध्यान लगावे, कटैं सकल पाप॥
(ॐ जय शीतला माता...)
दाल चावल रोटी, राँधैं नित नेमी।
पूजा करैं भाव से, सब हों सुखसीमी॥
(ॐ जय शीतला माता...)
जो यह आरती गावै, नित्त नेम ध्यावै।
सूरजदास कहे सेवक, मनवांछित फल पावै॥
(ॐ जय शीतला माता...)
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
माता शीतला की यह आरती अत्यंत महिमामयी और भावपूर्ण है। इसके प्रत्येक चरण में माँ के स्वरूप और उनके आशीष का सुंदर वर्णन किया गया है:
- प्रथम पद: 'ॐ जय शीतला माता, मै...' - हे माता शीतला! आपकी जय हो। आप संसार का कल्याण करने वाली हैं और इस भवसागर से भक्तों की नैया पार लगाने वाली तारणहार हैं।
- द्वितीय पद: 'विराजे राजवि राजवि...' - आप इस संपूर्ण जगत की जननी हैं और सभी दिशाओं में सुशोभित होती हैं। आपके दरबार में जो भक्त विधि-विधान से भोग लगाते हैं, आप उन्हें सभी प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक सुख प्रदान करती हैं।
- तृतीय पद: 'ध्यातैं जो तुम ध्यावें...' - जो सच्चे मन से आपका ध्यान करते हैं, वे अपनी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण कर लेते हैं। जो सेवक आपकी शरण में आते हैं, वे इस कठिन भवसागर को आसानी से पार कर जाते हैं।
- चतुर्थ पद: 'चैत्र कृष्ण अष्टमी को...' - चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि (शीतला अष्टमी) को जो व्रत रखते हैं और माता को प्रसन्न करने के लिए बासी (ठंडा) भोजन ग्रहण करते हैं, उनके जीवन में शीतलता और शांति बनी रहती है।
- पंचम पद: 'खर पर सवार राजत...' - आपका वाहन गर्दभ (गधा) है। आपके एक हाथ में सूप (अनाज साफ़ करने का पात्र) और दूसरे हाथ में झाड़ू तथा नीम के पत्ते सुशोभित होते हैं, जो स्वच्छता और आरोग्यता के प्रतीक हैं।
- षष्ठ पद: 'शीतल करो शरीर को...' - हे माँ! हमारे शरीर को शीतलता प्रदान करें और हमारे सभी प्रकार के ज्वर, ताप तथा शारीरिक-मानसिक संतापों का नाश करें। आपका ध्यान करने से मनुष्य के समस्त पाप कट जाते हैं।
- सप्तम पद: 'दाल चावल रोटी...' - जो भक्त नियमपूर्वक दाल, चावल, और सात्विक व्यंजनों का भोग बनाकर प्रेम भाव से आपकी पूजा करते हैं, उनके घर-परिवार में सुख-समृद्धि की सीमा नहीं रहती।
- अष्टम पद: 'जो यह आरती गावै...' - कवि और सेवक यह संदेश देते हैं कि जो भी भक्त इस आरती को नित्य नियम से गाता और सुनता है, माता उसकी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन संस्कृति में शीतला माता को भगवती दुर्गा का ही एक स्वरूप माना गया है। स्कन्द पुराण में शीतला माता के स्तोत्र 'शीतलाष्टक' का विस्तृत उल्लेख मिलता है। माता शीतला केवल चेचक या चर्म रोगों की ही देवी नहीं हैं, बल्कि वे आंतरिक शुद्धि, संयम, पर्यावरण संतुलन और स्वच्छता की भी अधिष्ठात्री देवी हैं। उनके हाथों में सुशोभित 'सूप' और 'झाड़ू' हमें यह संदेश देते हैं कि जीवन में शुद्धता और स्वच्छता बनाए रखना कितना आवश्यक है।
शीतला अष्टमी (बस्योरा) के दिन माता को ताजे भोजन का भोग न लगाकर एक दिन पहले बना हुआ बासी भोजन (जैसे राबड़ी, पुआ, पूरी, दाल-चावल) अर्पित किया जाता है। इसके पीछे वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक कारण यह है कि इस दिन से ऋतु परिवर्तन शुरू होता है और गर्मी का मौसम आरंभ होता है। आयुर्वेद के अनुसार इस समय शरीर में पित्त और उष्णता बढ़ जाती है, जिसे संतुलित करने के लिए ठंडी चीजों का सेवन और माता शीतला की आराधना उत्तम मानी गई है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
- प्रातःकाल स्नान एवं शुद्धि: शीतला अष्टमी या किसी भी मंगलवार/अष्टमी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें और माता शीतला की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- नैवेद्य एवं भोग अर्पण: माता को एक दिन पूर्व बने हुए ठंडे पकवानों, हलवा, पूरी, गुलगुले, और बासी चावल का भोग लगाएं। साथ ही ताजे नीम के पत्ते अवश्य अर्पित करें।
- दीपक प्रज्वलन: शुद्ध घी का दीपक और धूपबत्ती जलाकर माता के सम्मुख रखें।
- आरती गायन: घंटी, शंख और ताली बजाते हुए पूरी श्रद्धा और तल्लीनता के साथ 'ॐ जय शीतला माता' आरती का गान करें।
- क्षमा प्रार्थना: आरती के पश्चात माता से अपने परिवार के अच्छे स्वास्थ्य और निरोगी काया के लिए प्रार्थना करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
माता शीतला की आरती करते समय निम्नलिखित पूजन सामग्री का होना अनिवार्य है:
- चांदी, तांबे या पीतल की स्वच्छ पूजा की थाली
- शुद्ध गाय के घी का दीपक (या चमेली के तेल का दीपक)
- कपूर आरती के लिए
- रोली, अक्षत (चावल), और कुमकुम तिलक के लिए
- ताजे नीम के कोमल पत्ते और पुष्प माला
- बासी ठंडे व्यंजनों का भोग (नैवेद्य)
- घंटी और शंख (ध्वनि ऊर्जा के संचरण हेतु)
- जल से भरा हुआ कलश
राग, ताल एवं गायन समय
माता शीतला की आरती का गान मुख्य रूप से राग कल्याण या राग यमन की कोमल धुनों में किया जाता है, जो मन को शीतलता और शांति प्रदान करता है। इसे कहवा या दादरा ताल (चौताल) में गाया जा सकता है। आरती का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल सूर्योदय के पश्चात या संध्या बेला में माना जाता है। शीतला अष्टमी के दिन विशेष उत्सव के समय ढोलक और मंजीरे के साथ स्त्रियां मिलकर इस आरती का सामूहिक गान करती हैं, जिससे वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नित्य या पर्व विशेष पर शीतला माता की आरती करने और उनके मंत्रों का जाप करने से निम्नलिखित चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:
- निरोगी काया: माता की कृपा से चर्म रोग, चेचक, खसरा, और उष्णता जनित समस्त बीमारियां दूर होती हैं।
- मानसिक शांति: आरती के नियमित गान से मन के संताप, भय और चिंताएं समाप्त होती हैं और आंतरिक शीतलता का अनुभव होता है।
- नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मकता, सुख-शांति एवं आरोग्यता का वास होता है।
- पारिवारिक कल्याण: घर के सभी सदस्यों की दीर्घायु और सुरक्षा की कामना पूर्ण होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
शीतला माता की आरती कब की जाती है?
शीतला माता की आरती मुख्य रूप से चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी (शीतला अष्टमी / बस्योरा) के दिन विशेष रूप से की जाती है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मंगलवार और अष्टमी तिथि को भी इनकी आरती करना अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है।
शीतला माता को बासी भोजन क्यों चढ़ाया जाता है?
शीतला अष्टमी के दिन माता को बासी (ठंडा) भोजन अर्पित करने की परंपरा है क्योंकि इस दिन के बाद से ग्रीष्म ऋतु का आरंभ होता है। यह ऋतु परिवर्तन के समय शरीर को शीतलता प्रदान करने और उष्णता जनित रोगों से बचने का पारंपरिक और आयुर्वेदिक प्रतीक है।
शीतला माता की सवारी क्या है?
शास्त्रों और पौराणिक कथाओं के अनुसार माता शीतला का वाहन गर्दभ (गधा) है। उनके हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते सुशोभित होते हैं।
शीतला माता की पूजा से कौन से रोग दूर होते हैं?
माता शीतला को चेचक, खसरा, फोड़े-फुंसी, नेत्र विकार और अन्य सभी प्रकार के उष्णता (गर्मी) जनित चर्म रोगों की निवारक देवी माना जाता है। उनकी पूजा से आरोग्यता प्राप्त होती है।