पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री श्री शीतला माता आरती
14 पाठ

श्री शीतला माता आरती: संपूर्ण बोल, विधि और आरोग्य प्राप्ति के मंत्र

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग भैरवी / बिलावल शास्त्रीय राग / ताल
6 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj Kumar Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री शीतला माता आरती: संपूर्ण बोल, विधि और आरोग्य प्राप्ति के मंत्र ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता

सनातन हिंदू धर्म में मां शीतला को भगवती दुर्गा का ही साक्षात स्वरूप माना गया है। स्कन्द पुराण में शीतला माता का स्वतंत्र रूप से विस्तृत वर्णन मिलता है, जहाँ इन्हें 'शीतला देवी' के नाम से संबोधित किया गया है जो चेचक, खसरा, फोड़े-फुंसी, नेत्र विकार और अन्य सभी प्रकार के उष्ण तथा संक्रामक रोगों की अधिष्ठात्री देवी हैं। 'शीतल' शब्द का अर्थ है 'ठंडा करने वाली'। जब शरीर में गर्मी या पित्त का प्रकोप बढ़ता है, तो माता शीतला अपने शीतल जल और नीम के पत्तों के स्पर्श से जीव को आरोग्य प्रदान करती हैं।

प्राचीन परंपरा के अनुसार, माता शीतला की यह दिव्य आरती लोक-संस्कृति और वैदिक परंपरा के संगम से उपजी है। इसके रचयिता कोई एक संत न होकर परंपरा से चले आ रहे सिद्ध भक्त और आचार्य रहे हैं जिन्होंने जन-कल्याण के लिए माता की करुणा को शब्दों में पिरोया। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी जिसे 'शीतला अष्टमी' या 'बसौड़ा' कहा जाता है, इस दिन माता शीतला की विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता है और माता को ठंडे बासी व्यंजनों (जैसे राबड़ी, पुआ, पूरी, और चावल) का भोग लगाया जाता है। यह आरती केवल स्तुति मात्र नहीं है, बल्कि यह भौतिक संतापों से मुक्ति पाने का एक अचूक आध्यात्मिक मार्ग है।

सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल

जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता। सुर नर मुनि जन सेवक, करत लगातार आरती॥ (जय शीतला माता...)

विरल विरंची विराजे, तात वाहन खर विराजै। अलौकिक रूप तुम्हारा, तीनों जग गावै॥ (जय शीतला माता...)

घंटा शंख डमरू, बाजत मन भावे। सूरज चंदा सूरज, आरती नित गावै॥ (जय शीतला माता...)

निरधन को धन देवत, कोढ़ीय को काया। बाँझन को पुत्र देवत, निर्बल को माया॥ (जय शीतला माता...)

चौसठ योगिन मंगल गावैं, नृत्य करत भैरू। बाजत ताल मृदंगा, बाजे डमरू डमरू॥ (जय शीतला माता...)

आधार तुम्हारा जग को, तुम ही हो माता। भक्तन की रक्षक तू, त्रिभुवन की त्राता॥ (जय शीतला माता...)

जो जन ध्यान लगावै, वांछित फल पावै। श्रद्धा भक्ति सहित जो, आरती गावै॥ (जय शीतला माता...)

शीतला मैया की आरती, जो कोई नर गावै। कहें दयानंद स्वामी, सुख संपति पावै॥ (जय शीतला माता...)

पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ

प्रथम पद:
जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता। सुर नर मुनि जन सेवक, करत लगातार आरती॥
भावार्थ: हे माता शीतला! आपकी जय हो, बार-बार जय हो। देवता, मनुष्य और मुनिगण सभी आपके सेवक बनकर निरंतर आपकी आरती करते हैं और आपके चरणों में अपनी निष्ठा अर्पित करते हैं।

द्वितीय पद:
विरल विरंची विराजे, तात वाहन खर विराजै। अलौकिक रूप तुम्हारा, तीनों जग गावै॥
भावार्थ: हे माता! सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी भी आपके समक्ष नतमस्तक हैं। आपका वाहन गदहा (खर) है, जो सादगी और सहनशीलता का प्रतीक है। आपका यह अलौकिक और दिव्य रूप तीनों लोकों में गुणगान किया जाता है।

तृतीय पद:
घंटा शंख डमरू, बाजत मन भावे। सूरज चंदा सूरज, आरती नित गावै॥
भावार्थ: आपकी आराधना में बजने वाले शंख, घंटा और डमरू की ध्वनि मन को अत्यधिक प्रिय लगती है। सूर्य और चंद्रमा जैसे ब्रह्मांडीय देवता भी आपकी महिमा का गान करते हैं।

चतुर्थ पद:
निरधन को धन देवत, कोढ़ीय को काया। बाँझन को पुत्र देवत, निर्बल को माया॥
भावार्थ: आप इतनी दयालु हैं कि दरिद्र को धन, चर्म रोग से पीड़ित को स्वस्थ काया (शरीर), निःसंतान को संतान और कमजोर व असहाय को बल और वैभव प्रदान करती हैं।

पंचम पद:
चौसठ योगिन मंगल गावैं, नृत्य करत भैरू। बाजत ताल मृदंगा, बाजे डमरू डमरू॥
भावार्थ: चौसठ योगिनियाँ आपके दरबार में मंगल गीत गाती हैं, भगवान भैरव आपके साथ नृत्य करते हैं। ताल, मृदंगा और डमरू की मधुर गूँज से सारा वातावरण पवित्र हो जाता है।

षष्ठ पद:
आधार तुम्हारा जग को, तुम ही हो माता। भक्तन की रक्षक तू, त्रिभुवन की त्राता॥
भावार्थ: यह संपूर्ण संसार आपके ही सहारे टिका है और आप ही सबकी माता हैं। आप अपने भक्तों की रक्षा करने वाली और तीनों लोकों (त्रिभुवन) के जीवों की त्राता (संकट से उबारने वाली) हैं।

सप्तम पद:
जो जन ध्यान लगावै, वांछित फल पावै। श्रद्धा भक्ति सहित जो, आरती गावै॥
भावार्थ: जो भी मनुष्य सच्चे मन से आपका ध्यान करता है, वह अपनी सभी इच्छाओं (वांछित फल) को प्राप्त करता है। जो भक्त श्रद्धा और भक्ति भाव से आपकी आरती गाता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है।

अष्टम पद:
शीतला मैया की आरती, जो कोई नर गावै। कहें दयानंद स्वामी, सुख संपति पावै॥
भावार्थ: स्वामी दयानंद जी कहते हैं कि जो भी मनुष्य माता शीतला की इस पवित्र आरती का गायन करता है, वह समस्त सुखों और अष्टसिद्धियों को प्राप्त करता है।

गायन का राग, ताल एवं धुन

श्री शीतला माता की आरती का गायन मुख्य रूप से राग भैरवी अथवा राग बिलावल में किया जाता है। राग भैरवी का संबंध प्रातःकालीन वेला और भक्ति रस से है, जो मन को शांति और शीतलता प्रदान करता है। इसे कहवा ताल (8 मात्रा) या दादरा ताल (6 मात्रा) में बड़ी आसानी से गाया जा सकता है। आरती की धुन में करुणा, समर्पण और मांगलिक उल्लास का अद्भुत समन्वय होता है। जब इसे हारमोनियम और ढोलक या मंजीरे के साथ गाया जाता है, तो पूरा परिवेश भक्तिमय हो जाता है।

दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि

माता शीतला की आरती करते समय निम्नलिखित धार्मिक नियमों और अनुष्ठानिक विधि का पालन करना चाहिए:

    आरती की थाली की सजावट: थाली में शुद्ध घी का दीपक (कम से कम पाँच बत्तियों वाला या अखंड दीपक), रोली, अक्षत, जल से भरा कलश, ताजे फूल, और नीम के ताजे पत्ते अवश्य रखें। प्रज्वलन क्रम: सबसे पहले भगवान गणेश और माता दुर्गा का स्मरण करते हुए घी का दीपक प्रज्वलित करें। आरती घुमाने की विधि: थाली को घड़ी की सुई की दिशा में (Clockwise) कुल सात बार घुमाना चाहिए।
    • प्रथम बार माता के चरणों में चार बार आरती घुमाएं।
    • द्वितीय बार माता की नाभि या उदर क्षेत्र में दो बार घुमाएं।
    • तृतीय बार माता के मुखमंडल व संपूर्ण विग्रह पर सात बार पूर्ण रूप से घुमाएं।
    आचमन और समापन: आरती संपन्न होने के बाद, कपूर या दीपक पर हाथ फेरकर अपनी आँखों और मस्तक पर लगाएं। इसके बाद उपस्थित सभी भक्तों में आरती का प्रसार करें और माता के चरणों में जल अर्पित करके क्षमायाचना करें।

कर्पूर का महत्व व फलश्रुति

आरती के अंत में प्रज्वलित किया जाने वाला कर्पूर (Camphor) इस बात का प्रतीक है कि जिस प्रकार कर्पूर बिना कोई अवशेष छोड़े पूरी तरह जलकर कपूर की महक फैला देता है, उसी प्रकार साधक का अहंकार भी माता की भक्ति में विलीन होकर परमात्मा में समाहित हो जाना चाहिए। शीतला माता की आरती पढ़ने और सुनने से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:

    शारीरिक आरोग्य: चेचक, खसरा, फोड़े-फुंसी और उष्णता जनित रोगों से मुक्ति मिलती है। मानसिक शांति: शीतलता माता के स्मरण से क्रोधाग्नि शांत होती है और मन में शीतलता व धैर्य का संचार होता है। पारिवारिक सुख-शांति: घर-परिवार में माता की कृपा से आरोग्यता, सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। नकारात्मक ऊर्जा का नाश: समस्त बुरी दृष्टियों और संक्रामक प्रकोपों से परिवार की रक्षा होती है।

Frequently Asked Questions (FAQs)

प्रश्न 1: शीतला माता की आरती कब और किस दिन करनी चाहिए?
उत्तर: शीतला माता की आरती विशेष रूप से शीतला अष्टमी (बसौड़ा), सोमवार या शुक्रवार के दिन प्रातःकाल या संध्याकाल में करनी चाहिए। इसके अलावा चेचक या उष्ण विकारों के प्रकोप के समय नियमित रूप से यह आरती करने से विशेष लाभ मिलता है।

प्रश्न 2: शीतला माता को किस प्रकार का भोग लगाया जाता है?
उत्तर: माता शीतला को मुख्य रूप से बासी और ठंडे व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। इसमें राबड़ी, मीठे चावल, पुआ, पूरी, और हलवा शामिल हैं जो एक दिन पहले संध्या को बनाए जाते हैं।

प्रश्न 3: क्या शीतला माता की पूजा केवल महिलाएं ही कर सकती हैं?
उत्तर: नहीं, शीतला माता की पूजा परिवार के सभी सदस्य (पुरुष, महिलाएं और बच्चे) कर सकते हैं। यह माता संपूर्ण जगत की स्वास्थ्य रक्षिणी हैं।

प्रश्न 4: शीतला माता का वाहन क्या है और इसका क्या आध्यात्मिक अर्थ है?
उत्तर: शीतला माता का वाहन गदहा (खर) है। गदहा सहनशीलता, परिश्रम और बोझा ढोने की क्षमता का प्रतीक है। यह सिखाता है कि हमें जीवन की कठिनाइयों को सहन करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

१. श्री शीतला माता आरती: संपूर्ण बोल, विधि और आरोग्य प्राप्ति के मंत्र का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री शीतला माता के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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