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श्री श्री शनि देव आरती
7 पाठ

श्री शनि देव की आरती - जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनय विनय हमारी: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग भैरवी / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री शनि देव की आरती - जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनय विनय हमारी: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

हिन्दू सनातन धर्म में न्याय के देवता, कर्मफलदाता और सूर्यपुत्र भगवान श्री शनि देव की महिमा अपरंपार है। मनुष्य के अच्छे और बुरे कर्मों का लेखा-जोखा रखना और तदनुसार उसे फल प्रदान करना शनिदेव का ही कार्य है। जब किसी जातक की कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैया या महादशा आती है, तो लोग अक्सर भयभीत हो जाते हैं, किंतु यदि सच्चे मन से विधि-विधान पूर्वक भगवान शनि देव की पूजा की जाए और उनकी इस परम पावन आरती 'जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनय विनय हमारी' का गान किया जाए, तो शनि महाराज अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों के सभी कष्टों को हर लेते हैं। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम शनि देव की आरती के संपूर्ण बोल, प्रत्येक पंक्ति का गूढ़ भावार्थ, पूजा की सही विधि, आवश्यक सामग्री, और इसके अचूक आध्यात्मिक लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

यहाँ श्री शनि देव जी की संपूर्ण एवं प्रसिद्ध आरती प्रस्तुत है, जिसे प्रतिदिन या विशेष रूप से शनिवार के दिन संध्याकाल में श्रद्धापूर्वक गाना चाहिए:

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनय विनय हमारी।
धर्मामृत बरसाओ, काटो विपत्ति हमारी॥ जय...

सूरज के सुत तुम हो, जग के प्रतिपालक।
न्यायधीश जग के, शुभ-अशुभ के चालक॥
जो जन शरण तुम्हारी, आए तजि माया सारी,
उसकी पीर हरो प्रभु, हे दुखहारी॥ जय...

श्याम वर्ण तनु तुम्हारा, वाहन गृध्र विराजे।
धनुष बात्र त्रिशूल हाथ में अति सुंदर साजे॥
सूर्यपुत्र कहिए तुमको, छाया के हो लाला,
भक्त जनों के उर में चमकत ज्ञान उजाला॥ जय...

कौतुक करत जगत में, सबको तुम समझावत।
कर्महीन नर को तुम, पल में विकल बनावत॥
जो नर सतपथगामी, सेवा में चित्त लावै,
सो नर मनवांछित फल, निश्चय ही पावै॥ जय...

लोहे का आसन और सिंहासन अति भारी।
तेज तुम्हारा देखत, कांपे दुनिया सारी॥
पिपल तरु पूजा जो जन, शनिवार करै है,
उसके गृह में सुख-संपत्ति नित्य भरै है॥ जय...

देव, दानव, ऋषि, मुनि, सब तव गुण गावैं।
ब्रह्मा, विष्णु, शिव भी महिमा तव ध्यावैं॥
जो यह आरती गावे, प्रेम सहित मन लाई,
उसकी रक्षा करें प्रभु, सब विधि सुखदाई॥ जय...

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

सनातन परंपरा में किसी भी स्तोत्र या आरती को केवल गा देना ही पर्याप्त नहीं होता, अपितु उसके भाव को समझकर अंतःकरण में उतारना आवश्यक है। आइए शनिदेव की इस आरती के प्रत्येक छंद के भावार्थ को गहराई से समझें:

प्रथम छंद का अर्थ: भक्तगण शनिदेव की वंदना करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु श्री शनिदेव! आपकी जय हो, हमारी इस प्रार्थना (विनय) को सुनिए। हमारे जीवन में धर्म और कृपा का अमृत बरसाइए तथा हमारे सभी संकटों और विपत्तियों का नाश कीजिए।

द्वितीय छंद का अर्थ: आप भगवान सूर्य के पुत्र हैं और इस संपूर्ण संसार के प्रतिपालक (पालनकर्ता) हैं। आप इस ब्रह्मांड के सर्वोच्च न्यायाधीश हैं, जो जीवों के अच्छे और बुरे कर्मों का संचालन करते हैं। जो मनुष्य संसार की मोह-माया को त्यागकर आपकी शरण में आता है, हे प्रभु! आप उसके सभी दुखों का हरण कर लेते हैं।

तृतीय छंद का अर्थ: आपका शरीर श्यामल (गहरे नीले या काले रंग का) वर्ण का है और आपका वाहन 'गृध्र' (गिद्ध) सुशोभित है। आपके हाथों में धनुष-बाण और त्रिशूल अत्यंत शोभायमान हैं। आपको सूर्यपुत्र और माता छाया का लाडला कहा जाता है। आपके दर्शन मात्र से भक्तजनों के हृदय में ज्ञान का प्रकाश चमक उठता है.

चतुर्थ छंद का अर्थ: आप इस संसार में कर्मों की महत्ता को अद्भुत तरीकों से समझाते हैं। जो मनुष्य कर्महीन होकर गलत मार्ग पर चलता है, उसे आप अपने दण्ड के माध्यम से व्याकुल कर देते हैं। परंतु जो मनुष्य सत्य के मार्ग (सतपथगामी) पर चलकर आपकी सेवा और भक्ति में अपना मन लगाता है, वह निश्चित ही अपने मनवांछित फल को प्राप्त करता है.

पंचम छंद का अर्थ: आपका आसन लोहे का है और आपका प्रभाव अत्यंत व्यापक है। आपके तेज और अनुशासन को देखकर संपूर्ण संसार भययुक्त सम्मान से कांप उठता है। जो भी मनुष्य श्रद्धापूर्वक शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा करता है और दीप जलाता है, उसके घर में हमेशा सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है.

षष्ठम छंद का अर्थ: देवता, दानव, ऋषि और मुनि सभी आपके गुणों का गान करते हैं। यहां तक कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) भी आपकी महिमा का स्मरण करते हैं। जो भी भक्त प्रेम और निष्ठा के साथ इस आरती को गाता है, हे प्रभु! आप उसकी सभी प्रकार से रक्षा करते हैं और उसे सुख प्रदान करते हैं.

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

हिन्दू धर्म ग्रंथों और ज्योतिष शास्त्र में शनि देव को विशेष स्थान प्राप्त है। उन्हें 'कर्मफलदाता' कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि वे किसी के साथ अन्याय नहीं करते, बल्कि हर व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार ही फल देते हैं। शनि देव भगवान सूर्य और छाया के पुत्र हैं। उनके जन्म और महिमा से जुड़ी कई कथाएं स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में मिलती हैं। शनि देव की आरती करने का धार्मिक महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह मनुष्य को अहंकार से दूर रखती है और उसे सदाचार, अनुशासन तथा सत्य के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है।

जब जातक शनि की पीड़ा (साढ़ेसाती, ढैया या महादशा) से गुजर रहा होता है, तब शनि चालीसा और शनि आरती का पाठ उसके मानसिक संताप को दूर कर उसे धैर्य प्रदान करता है। शनि देव की दृष्टि को लेकर लोगों के मन में जो भय व्याप्त है, वह आरती के नियमित पाठ से दूर हो जाता है, क्योंकि भक्त यह समझ जाता है कि शनिदेव केवल दण्ड नहीं देते, बल्कि वे पापी प्रवृत्तियों को सुधारकर व्यक्ति को एक बेहतर इंसान बनाते हैं।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

शनिवार का दिन भगवान शनि देव की उपासना के लिए सर्वोपरि माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से पूजा और आरती करने से विशेष लाभ मिलता है:

  1. स्नान एवं शुद्धि: शनिवार के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ काले, नीले या साफ़ वस्त्र धारण करें।
  2. स्थान का चयन: पूजा घर में या किसी पीपल के वृक्ष के नीचे अथवा शनि मंदिर में शनि देव की मूर्ति या शिला के समक्ष पूजा का आयोजन करें।
  3. संकल्प: मन में शनि देव का ध्यान करते हुए अपने सभी पापों की क्षमा और सुख-शांति की कामना का संकल्प लें।
  4. तैलाभिषेक: शनि देव को सरसों का तेल या तिल का तेल अति प्रिय है। उनकी शिला पर प्रेमपूर्वक तेल अर्पित करें।
  5. पुष्प एवं प्रसाद: नीले या काले रंग के पुष्प, काले तिल, उड़द की दाल और गुड़ का भोग लगाएं।
  6. दीपक प्रज्वलन: सरसों के तेल का चौमुखी या सामान्य दीपक जलाएं।
  7. आरती गान: इसके पश्चात हाथ में कपूर या घी का दीपक लेकर श्रद्धा और उच्च स्वर में 'जय जय श्री शनिदेव प्रभु' आरती का गान करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

आरती को पूर्ण विधि-विधान से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना अनिवार्य है:

  • पूजा की थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
  • दीपक: मिट्टी या धातु का दीपक जिसमें सरसों का तेल और रुई की बत्ती हो।
  • कपूर: आरती के अंत में प्रज्वलित करने के लिए शुद्ध भीमसेनी कपूर।
  • घंटी: सकारात्मक ऊर्जा के संचार और नकारात्मकता को दूर भगाने के लिए पीतल की घंटी।
  • अभिषेक सामग्री: शुद्ध सरसों का तेल, काले तिल, कच्चा सूत या काला कपड़ा।
  • भोग सामग्री: गुड़ और चने की दाल या उड़द की खिचड़ी।

राग, ताल एवं गायन समय

भक्ति संगीत में भाव और स्वर की प्रधानता होती है। शनि देव की आरती को गंभीर, शांत और अनुशासित भाव से गाया जाना चाहिए।

  • उपयुक्त राग: इस आरती को 'राग भैरवी' या 'राग यमन' की धुनों में गाया जा सकता है, जो मन को एकाग्र करती हैं।
  • ताल: कहवा या दादरा ताल (8 मात्रा या 6 मात्रा) इसके लयबद्ध गायन के लिए उत्तम है।
  • गायन समय: शनिवार की संध्याकाल (प्रदोष काल) या सूर्यास्त के पश्चात का समय शनि देव की आराधना और आरती के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से श्री शनि देव की आरती का गान और पाठ करने से जीवन में अद्भुत आध्यात्मिक और भौतिक परिवर्तन आते हैं:

  • भय से मुक्ति: कुंडली में शनि दोष, साढ़ेसाती या ढैया का भय समाप्त होता है और मन में साहस का संचार होता है।
  • कर्म में शुद्धि: व्यक्ति का झुकाव न्याय, सत्य, और परोपकार की ओर होता है, जिससे उसके कर्म सुधरते हैं।
  • स्वास्थ्य लाभ: दीर्घकालिक रोगों और मानसिक अवसाद (Depression) से जूझ रहे व्यक्तियों को मानसिक शांति मिलती है।
  • समृद्धि एवं यश: व्यवसाय और नौकरी में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और आर्थिक स्थिरता प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री शनि देव की आरती - जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनय विनय हमारी: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री शनि देव के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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