पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री श्री शालिग्राम भगवान आरती
4 पाठ

श्री शालिग्राम भगवान की पावन आरती - ॐ जय शालिग्राम देवा, स्वामी जय शालिग्राम देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री शालिग्राम भगवान की पावन आरती - ॐ जय शालिग्राम देवा, स्वामी जय शालिग्राम देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म और वैष्णव परंपरा में भगवान श्री शालिग्राम जी की पूजा का अत्यधिक महत्व है। शालिग्राम शिला को साक्षात श्री हरि विष्णु का प्रतीक और उनका विग्रह माना गया है। नेपाल की पवित्र गंडकी नदी के तट पर मिलने वाली यह काले रंग की गोल या अंडाकार शिलाएं किसी साधारण पत्थर से भिन्न होती हैं, जिन पर चक्र, गदा, पद्म और शंख के प्राकृतिक चिह्न अंकित होते हैं। स्कंद पुराण, पद्म पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में शालिग्राम शिला की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि तुलसी विवाह के समय शालिग्राम जी और माता तुलसी का विवाह कराने से कन्यादान के समान महान पुण्य की प्राप्ति होती है। जिस घर में नित्य नियम से शालिग्राम भगवान की पूजा-अर्चना और पावन आरती की जाती है, उस घर पर माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा सदैव बनी रहती है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत आलेख में हम शालिग्राम भगवान की सम्पूर्ण आरती, उसका गूढ़ भावार्थ, पूजा की सही विधि, आवश्यक सामग्री, धार्मिक महत्व और जीवन पर पड़ने वाले उसके आध्यात्मिक प्रभावों का संपूर्ण विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय शालिग्राम देवा, स्वामी जय शालिग्राम देवा।
सुन्दर सिंहासन राजत, तुलसी दल सेवा॥ ॐ जय...॥

काली पीली पावन मूरति, चक्र सुदर्शनधारी।
भक्तन के दुख हरता, भव भय भयहारी॥ ॐ जय...॥

गंडकी शिला प्रगटे, अति पावन रूपा।
तेज पुंज छबि छावत, लखि मुनि मन सूपा॥ ॐ जय...॥

भोग लग्यो तुलसी का, मेवा और मिश्री।
चरणामृत जो पीवे, भव बंधन बिसरी॥ ॐ जय...॥

जो जन आरती गावै, ध्यावै मन लावै।
वांछित फल पावै, सब संकट टरै॥ ॐ जय...॥

विष्णु रूप तुम स्वामी, पालन जग सारे।
शरणागत प्रतिपालक, भव से तट तारे॥ ॐ जय...॥

आरती शालिग्राम की, जो कोई नर गावै।
कह दास अनन्त तब, बैकुंठ धाम पावै॥ ॐ जय...॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

भगवान श्री शालिग्राम की यह दिव्य आरती केवल कुछ पंक्तियों का एक भजन मात्र नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड के पालनहार भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप की महिमा का अगाध सागर है। आइए इस पावन आरती के प्रत्येक चरण के भावार्थ को विस्तार से समझें:

प्रथम चरण: 'ॐ जय शालिग्राम देवा, स्वामी जय शालिग्राम देवा। सुन्दर सिंहासन राजत, तुलसी दल सेवा॥'
भावार्थ: हे प्रभु! शालिग्राम देवा, आपकी जय हो, स्वामी आपकी जय हो। आप सुंदर सिंहासन पर विराजमान हैं और आपकी पूजा-अर्चना में तुलसी के पत्तों (तुलसी दल) का विशेष महत्व है, क्योंकि आपको तुलसी अत्यंत प्रिय हैं।

द्वितीय चरण: 'काली पीली पावन मूरति, चक्र सुदर्शनधारी। भक्तन के दुख हरता, भव भय भयहारी॥'
भावार्थ: आपकी यह पावन मूर्ति श्यामल या कहीं-कहीं श्वेत-पीत आभा लिए होती है, जिस पर भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र के प्राकृतिक चिह्न अंकित रहते हैं। आप अपने भक्तों के सभी दुखों को हरने वाले और इस भवसागर के सभी प्रकार के भयों को नष्ट करने वाले हैं।

तृतीय चरण: 'गंडकी शिला प्रगटे, अति पावन रूपा। तेज पुंज छबि छावत, लखि मुनि मन सूपा॥'
भावार्थ: आप नेपाल की पवित्र गंडकी नदी से प्रकट हुए अति पावन विग्रह हैं। आपके रूप से ऐसा अलौकिक तेज पुंज झलकता है कि जिसे देखकर बड़े-बड़े मुनियों और संतों का मन भी आनंदित और शांत हो जाता है।

चतुर्थ चरण: 'भोग लग्यो तुलसी का, मेवा और मिश्री। चरणामृत जो पीवे, भव बंधन बिसरी॥'
भावार्थ: आपको तुलसी दल के साथ-साथ मेवा, मिश्री और विभिन्न प्रकार के नैवेद्य का भोग लगाया जाता है। आपके चरणों का पावन जल यानी चरणामृत जो भी भक्त श्रद्धापूर्वक ग्रहण करता है, उसके जन्म-जन्म के भव बंधन और पाप कट जाते हैं।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

हिंदू सनातन धर्म में शालिग्राम शिला की पूजा का इतिहास पुराण काल से चला आ रहा है। तुलसी विवाह उत्सव में शालिग्राम भगवान को ही भगवान विष्णु मानकर उनका विवाह माता तुलसी के साथ कराया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, तुलसी जी ने वृंदा के रूप में भगवान विष्णु को पत्थर बनने का श्राप दिया था, जिसके उत्तर में भगवान ने कहा कि वे गंडकी नदी के तट पर शालिग्राम शिला के रूप में प्रकट होंगे और तुलसी के बिना उनका भोग स्वीकार नहीं किया जाएगा। शालिग्राम शिला पर चक्र के होने से इसे 'चक्रवर्ती' रूप माना जाता है। शालिग्राम भगवान की पूजा करने वाले व्यक्ति को कभी भी अकाल मृत्यु, दरिद्रता या प्रेत बाधा का भय नहीं सताता। घर में शालिग्राम जी होने मात्र से ही वह स्थान तीर्थ के समान पवित्र हो जाता है.

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  1. प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मंदिर या पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
  2. शालिग्राम भगवान को एक साफ चौकी पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाकर स्थापित करें।
  3. पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शर्करा) से शालिग्राम शिला का अभिषेक करें और पुनः शुद्ध जल से स्नान कराएं।
  4. चंदन का तिलक लगाएं, अक्षत (अतूट चावल) अर्पित करें और ताजे पुष्प तथा तुलसी दल अर्पित करें।
  5. धूप, दीप और अगरबत्ती जलाएं। इसके पश्चात दोनों हाथों से घंटी बजाते हुए 'श्री शालिग्राम भगवान की आरती' गाएं।
  6. आरती संपन्न होने के बाद भगवान की परिक्रमा करें और कपूर की आरती उतारकर सभी उपस्थित भक्तों को आरती लें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

  • थाल: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
  • दीपक: घी या तिल के तेल का दीपक (रुई की बाती के साथ)।
  • कपूर: आरती को पूर्णाहुति देने के लिए शुद्ध कपूर।
  • घंटी: पूजा स्थल पर सकारात्मक ऊर्जा के संचार के लिए पीतल की घंटी।
  • शंख: भगवान के अभिषेक और आरती के आरंभ व अंत में ध्वनि के लिए पांचजन्य शंख।
  • नैवेद्य: तुलसी दल सहित मेवा, मिश्री, फल और पंचामृत।

राग, ताल एवं गायन समय

श्री शालिग्राम भगवान की यह आरती पारंपरिक रूप से 'राग कल्याण' या 'राग यमन' में गाई जाती है, जो मन को असीम शांति और भक्ति रस से सराबोर कर देती है। इस आरती को गाने का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल की पूजा के समय (ब्रह्म मुहूर्त से सूर्योदय के पश्चात) तथा संध्याकालीन बेला में (संध्या आरती के समय) होता है। इस आरती को सामूहिक रूप से गाने पर घर का वातावरण दिव्य और ऊर्जावान बन जाता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नित्य नियम से शालिग्राम भगवान की पूजा और आरती करने वाले साधक को जीवन में निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • घर में सुख, शांति, समृद्धि और ऐश्वर्य का वास होता है।
  • वास्तु दोष और नकारात्मक ऊर्जा स्वतः समाप्त हो जाती है।
  • परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ता है।
  • मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है और पापों का शमन होता है।
  • कुंडली में यदि कोई विष्णु दोष या गुरु दोष हो, तो वह शांत होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री शालिग्राम भगवान की पावन आरती - ॐ जय शालिग्राम देवा, स्वामी जय शालिग्राम देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री शालिग्राम भगवान के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री श्री शालिग्राम भगवान जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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