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श्री श्री शालिग्राम भगवान / भगवान विष्णु आरती
12 पाठ

श्री शालिग्राम भगवान की आरती - ॐ जय शालिग्राम देवा, स्वामी जय शालिग्राम देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री शालिग्राम भगवान की आरती - ॐ जय शालिग्राम देवा, स्वामी जय शालिग्राम देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म में श्री शालिग्राम शिला को प्रत्यक्ष भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है। गंडकी नदी के तट पर मिलने वाले इन पावन पत्थरों की पूजा सीधे तौर पर महाविष्णु और माता महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। 'श्री शालिग्राम भगवान की आरती' का गान करने से घर में सुख-समृद्धि, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक शांति का वास होता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम शालिग्राम जी की संपूर्ण आरती, उसके भावार्थ, नियम, सामग्री और पूजा पद्धति का सविस्तार वर्णन कर रहे हैं।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

ॐ जय शालिग्राम देवा, स्वामी जय शालिग्राम देवा।
सुन्दर श्यामल मूरत, अति पावन देवा॥ ॐ जय...॥

गंडकी शिला में विराजे, त्रिभुवन के स्वामी।
भक्तन के प्रतिपालक, अंतरजामी नामी॥ ॐ जय...॥

चक्र सुदर्शन धारी, तुलसी मन भाई।
जो कोई तुमको ध्यावे, मुक्ती फल पाई॥ ॐ जय...॥

पीतांबर शुक शोभे, मुकुट सिर साजे।
वैकुण्ठ धाम विराजे, डमरू मृदंग बाजे॥ ॐ जय...॥

प्रतिदिन भोग लगे जो, तुलसी दल साजा।
कोटि यज्ञ फल पावे, जो भजे महाराजा॥ ॐ जय...॥

पाप विनाशन हारे, भव भय की भंजन।
शरण गहे की लज्जा, राखो प्रभु रंजन॥ ॐ जय...॥

जो जन आरती गावे, नित उठ कर गाता।
पार ब्रह्म सुख पावे, मेटे भव ताता॥ ॐ जय...॥

शालिग्राम जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत 'दास' मनवांछित, उत्तम फल पावे॥ ॐ जय...॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

ॐ जय शालिग्राम देवा, स्वामी जय शालिग्राम देवा। सुन्दर श्यामल मूरत, अति पावन देवा॥
हे संपूर्ण संसार के स्वामी शालिग्राम भगवान! आपकी जय हो। आपकी यह श्यामल (श्याम वर्ण) मूर्ति अत्यंत मनमोहक, पवित्र और जीवों को पावन करने वाली है। शालिग्राम शिला का शाश्वत रूप भगवान विष्णु के उस विराट स्वरूप का स्मरण कराता है जो समस्त ब्रह्मांड का आधार है।

गंडकी शिला में विराजे, त्रिभुवन के स्वामी। भक्तन के प्रतिपालक, अंतरजामी नामी॥
आप नेपाल की पवित्र गंडकी नदी के गर्भ में प्रकट होने वाली शिला के रूप में विराजित हैं। आप तीनों लोकों (स्वर्ग, म्रत्यु और पाताल) के स्वामी हैं। आप अपने भक्तों की हमेशा रक्षा करने वाले और सभी के मन की बात जानने वाले (अंतर्यामी) रूप में सर्वविदित हैं।

चक्र सुदर्शन धारी, तुलसी मन भाई। जो कोई तुमको ध्यावे, मुक्ती फल पाई॥
आपके भीतर साक्षात भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र और पवित्र रेखाएं विद्यमान हैं। आपको तुलसी का पौधा और तुलसी पत्र अत्यंत प्रिय हैं। जो भी मनुष्य श्रद्धा और सच्चे मन से आपका ध्यान करता है, वह इस भवसागर के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है।

पीतांबर शुक शोभे, मुकुट सिर साजे। वैकुण्ठ धाम विराजे, डमरू मृदंग बाजे॥
आपके इस पावन स्वरूप पर पीले रंग के वस्त्र (पीतांबर) अत्यंत शोभित होते हैं और मस्तक पर दिव्य मुकुट सुसज्जित है। आप साक्षात वैकुंठ धाम में विराजते हैं और आपके दरबार में देवताओं द्वारा जयकारे व संगीत गूंजता रहता है।

प्रतिदिन भोग लगे जो, तुलसी दल साजा। कोटि यज्ञ फल पावे, जो भजे महाराजा॥
जो भक्त प्रतिदिन शालिग्राम भगवान को तुलसी दल (पत्ती) से सजाकर भोग अर्पित करता है, उसे अनगिनत (कोटि) यज्ञों को करने के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। शालिग्राम जी का स्मरणमात्र जीवन के समस्त कष्टों को हर लेता है।

पाप विनाशन हारे, भव भय की भंजन। शरण गहे की लज्जा, राखो प्रभु रंजन॥
आप सभी प्रकार के पापों का नाश करने वाले और संसार के जन्म-मरण के भय को दूर करने वाले हैं। जो भी आपकी शरण में आता है, उसकी लाज रखना और उसकी रक्षा करना आपका स्वभाव है, हे प्रभु!

जो जन आरती गावे, नित उठ कर गाता। पार ब्रह्म सुख पावे, मेटे भव ताता॥
जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर इस दिव्य आरती का गान करता है, वह साक्षात परब्रह्म के परम सुख को प्राप्त करता है तथा उसके संसार के सभी ताप और दुख नष्ट हो जाते हैं।

शालिग्राम जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत 'दास' मनवांछित, उत्तम फल पावे॥
इस आरती के रचयिता कहते हैं कि जो भी नर-नारी शालिग्राम जी की इस आरती को गाता है, भगवान उसकी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं और उसे उत्तम फल प्रदान करते हैं।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

सनातन परंपरा में शालिग्राम शिला की पूजा का विशेष स्थान है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, शालिग्राम शिला की पूजा करने वाले व्यक्ति को समस्त तीर्थों के दर्शन और यज्ञों के अनुष्ठान के बराबर पुण्य मिलता है। शालिग्राम शिला को तुलसी जी के साथ शाग्राम-तुलसी विवाह के रूप में भी पूजा जाता है। मान्यता है कि तुलसी जी के श्राप के कारण भगवान विष्णु को शिला रूप में रहना स्वीकार करना पड़ा था, और गंडकी नदी के तट पर वज्रकीट नामक कीड़े द्वारा इस शिला पर चक्र के निशान बनाए जाते हैं। शालिग्राम जी की आरती करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, पितृ दोष शांत होते हैं और वास्तु दोषों का भी शमन होता है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  • स्थान शुद्धि: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा घर को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
  • आसन: शालिग्राम भगवान को एक साफ चौकी पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाकर स्थापित करें।
  • पंचामृत स्नान: शालिग्राम शिला को गाय के दूध, दही, घी, शक्कर और शहद (पंचामृत) से स्नान कराएं, तत्पश्चात शुद्ध जल से आचमन कराएं।
  • गंध और तिलक: भगवान को चंदन, रोली और अक्षत (चांदी या साबुत चावल) अर्पित करें।
  • तुलसी अर्पण: शालिग्राम जी की पूजा में तुलसी दल का होना अनिवार्य है। बिना तुलसी के शालिग्राम पूजन अधूरा माना जाता है।
  • आरती गान: घी का दीपक और कपूर जलाकर हाथ में थाल लेकर श्रद्धापूर्वक 'ॐ जय शालिग्राम देवा' आरती का गान करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

  • शुद्ध घी का दीपक
  • कपूर और प्रज्वलन पात्र
  • धूपबत्ती या अगरबत्ती
  • तांबे या पीतल की आरती की थाली
  • ताजे पुष्प एवं माला
  • पवित्र तुलसी दल
  • चरणामृत और भोग सामग्री (मिश्री-मेवा या फल)
  • घंटी (Ghanti) और शंख (Shankh)

राग, ताल एवं गायन समय

श्री शालिग्राम भगवान की आरती को शास्त्रीय संगीत के राग कल्याण या राग यमन की सुमधुर धुनों में गाया जा सकता है। इस आरती को गाने का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त या पूजा के तुरंत बाद) और संध्याकाल (संध्या आरती के समय) है। इसे धीमी ताल (कहवा या तीनताल) के साथ समूह में या एकल रूप से भक्तिभाव से गाया जा सकता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

  1. शालिग्राम आरती करने से घर में माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की संयुक्त कृपा बनी रहती है।
  2. घर में अकाल मृत्यु, दुर्घटना या भारी संकटों का भय समाप्त होता है।
  3. पारिवारिक कलह दूर होती है और पति-पत्नी या परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम एवं सामंजस्य बढ़ता है।
  4. आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले साधकों के लिए यह आरती मन को एकाग्र करने और ध्यान में उतरने में मदद करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

शालिग्राम भगवान की पूजा घर में कौन कर सकता है?

शालिग्राम भगवान की पूजा कोई भी गृहस्थ या साधक पूरी पवित्रता, शाकाहार और नियमों का पालन करते हुए अपने घर के मंदिर में कर सकता है। इनकी पूजा अत्यंत शांत और सात्विक रूप से की जाती है।

क्या शालिग्राम जी को सिंदूर या हल्दी लगाई जा सकती है?

नहीं, शालिग्राम शिला को सिंदूर नहीं लगाया जाता है। उन्हें केवल पीला चंदन, अष्टगंध या गोपीचंदन का तिलक लगाया जाता है।

शालिग्राम जी की पूजा में तुलसी का क्या महत्व है?

शालिग्राम भगवान को तुलसी के बिना भोग या पूजा समर्पित नहीं की जा सकती। तुलसी दल भगवान विष्णु को अति प्रिय है, इसलिए प्रत्येक भोग में तुलसी रखना अनिवार्य माना गया है।

क्या घर में एक से अधिक शालिग्राम रखे जा सकते हैं?

शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार घर के मंदिर में सामान्यतः एक ही शालिग्राम शिला की पूजा करना श्रेष्ठ माना गया है। यदि एक से अधिक हों, तो उनके विशेष नियमों का पालन करना चाहिए।

१. श्री शालिग्राम भगवान की आरती - ॐ जय शालिग्राम देवा, स्वामी जय शालिग्राम देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री शालिग्राम भगवान / भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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