॥ श्री शाकंभरी माता की आरती - जय माता शाकंभरी: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★माँ शाकंभरी आदि शक्ति माँ दुर्गा का ही एक अत्यंत पवित्र, कल्याणकारी एवं सात्विक स्वरूप हैं, जो प्रकृति, वनस्पति, शाक-सब्जियों और अन्न-जल की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। जब-जब पृथ्वी पर अकाल, सूखा और घोर संकट की स्थिति उत्पन्न हुई है, तब-तब माँ जगदंबा ने शाकंभरी रूप में अवतरित होकर इस सृष्टि का पोषण किया है। राजस्थान के सीकर जिले की शाकंभरी पीठ, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर स्थित शाकंभरी देवी शक्तिपीठ तथा कर्नाटक के बनशंकरी मंदिर में माँ के इस स्वरूप की महिमा अपरंपार है। श्री शाकंभरी माता की आरती का गान करने से न केवल घर में अन्न-धन के भंडार भरते हैं, बल्कि दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से भी मुक्ति मिलती है। Bhaktilok.in के इस विशेष भक्ति ग्रंथ में हम माँ शाकंभरी की संपूर्ण आरती, उसके गूढ़ भावार्थ, शास्त्रीय पूजा विधि, महत्व और उससे जुड़े सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
जय शाकंभरी माता, मैया जय शाकंभरी माता।
निशदिन ध्यावहिं नर मुनि, सुरेस गण ज्ञाता॥ टेक॥
शतमूर्ती विख्याता, शतनेत्रयुता माता।
घोर अंध तम नाशिनी, जगमग ज्योति भाता॥ जय शाकंभरी...॥
अकाल दुष्ट संहारिणी, वनस्पति जननी।
साक फल मूल प्रदायिनी, सुख संपत्ति करनी॥ जय शाकंभरी...॥
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सेवत पद तेरे।
संकट मोचन माता, हरहु अघ मेरे॥ जय शाकंभरी...॥
रक्तदंतिका भवानी, शाकंभरी नाम धरा।
शतक्षीर नेत्र प्रसवति, पावन जग सारा॥ जय शाकंभरी...॥
जो जन आरती गावै, नित्त प्रति मन लावै।
वांछित फल सो पावै, दुःख निकट न आवै॥ जय शाकंभरी...॥
चरण कमल का ध्यान धर, भवसागर तर जाई।
दास तुम्हारा शरण में, लो लाज बचाई॥ जय शाकंभरी...॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
माँ शाकंभरी की यह दिव्य आरती केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह साक्षात शक्ति स्वरूपा के प्रति शरणागति का भाव है। आइए इस आरती की प्रत्येक पंक्ति के गहरे आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ को समझें:
प्रथम पद का भाव: "जय शाकंभरी माता, मैया जय शाकंभरी माता। निशदिन ध्यावहिं नर मुनि, सुरेस गण ज्ञाता॥"
इस प्रारंभिक पंक्ति में भक्त माता की जयकार करते हुए कहते हैं कि हे माता शाकंभरी! आपकी जय हो। दिन-रात ऋषि-मुनि, साधक, देवता और ज्ञानियों द्वारा आपका ही ध्यान किया जाता है। आपकी कृपा के बिना किसी को भी आध्यात्मिक और भौतिक ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है।
द्वितीय पद का भाव: "शतमूर्ती विख्याता, शतनेत्रयुता माता। घोर अंध तम नाशिनी, जगमग ज्योति भाता॥"
माता के विराट स्वरूप का वर्णन करते हुए भक्त कहते हैं कि हे माता! आप संपूर्ण ब्रह्मांड में 'शतमूर्ती' (अनेक रूपों वाली) और 'शतनेत्रयुता' (अनंतरूपों और नेत्रों वाली) के रूप में विख्यात हैं। आप अज्ञान रूपी घोर अंधकार का नाश करने वाली और अलौकिक प्रकाश फैलाने वाली जगमग ज्योति हैं।
तृतीय पद का भाव: "अकाल दुष्ट संहारिणी, वनस्पति जननी। साक फल मूल प्रदायिनी, सुख संपत्ति करनी॥"
यह पद विशेष रूप से माँ के 'शाकंभरी' नाम के औचित्य को सिद्ध करता है। जब पृथ्वी पर सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई और अकाल पड़ा, तब माँ ने अपने शरीर से उत्पन्न शाक, फल और मूल से समस्त जीव-जंतुओं की क्षुधा शांत की। आप ही समस्त वनस्पतियों की जननी और सुख-समृद्धि प्रदायिनी हैं।
चतुर्थ पद का भाव: "ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सेवत पद तेरे। संकट मोचन माता, हरहु अघ मेरे॥"
सृष्टि के संचालनकर्ता ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी जिनके चरणों की सेवा करते हैं, ऐसी हे संकटमोचन माता! हमारे सभी पापों (अघ) और कष्टों का हरण कर लीजिए।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
श्रीमद्देवीभागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण में माँ शाकंभरी की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। 'शतक्षी' और 'शाकंभरी' नाम से प्रसिद्ध यह देवी दुर्गा का वह रूप हैं जिन्होंने दुर्गम नामक राक्षस का वध करने के बाद पृथ्वी पर उत्पन्न महाअकाल के संकट को टाला था। पौराणिक कथा के अनुसार, जब पृथ्वी पर जल और अन्न का अभाव हो गया था, तब ऋषियों की पुकार पर माता ने शाकंभरी रूप में प्रकट होकर अपनी नेत्रों से अश्रु रूपी जलधारा बहाई और अपने शरीर से नाना प्रकार की शाक-सब्जियां उत्पन्न कर संसार का भरण-पोषण किया।
धार्मिक दृष्टि से पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा (शाकंभरी पूर्णिमा/छठ) तक का समय माँ शाकंभरी की साधना के लिए अत्यंत उत्तम माना जाता है। इस दौरान जो भक्त माता की आरती करता है, उसके घर में कभी भी अन्न-धन और औषधियों की कमी नहीं होती। विशेषकर कृषि कार्य से जुड़े लोगों, किसानों और प्रकृति प्रेमियों के लिए यह आरती अत्यंत फलदायी है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
किसी भी देवी-देवता की आरती का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसे शास्त्रीय एवं पारंपरिक विधि-विधान के साथ किया जाए। माँ शाकंभरी की आरती के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:
- शुद्धता एवं प्रातकाल/संध्याकाल: स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। आरती प्रातःकाल पूजन के अंत में या संध्याकाल (प्रदोष काल) में दीपक जलाने के समय करनी चाहिए।
- आसन एवं दिशा: पूजा के समय आपका मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। कुशा या ऊनी आसन पर बैठना श्रेष्ठ रहता है।
- दीपक प्रज्वलन: गाय के शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। दीपक का मुख माता की मूर्ति की ओर होना चाहिए।
- आरती का क्रम: धूप, दीप, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करने के बाद थाल में कपूर या घी का दीपक सजाकर पूरे विधि-विधान से आरती गाएं। आरती के अंत में आचमन कर शंख और घंटी बजाएं।
- परिक्रम व क्षमा प्रार्थना: आरती की थाल को अपने आराध्य की मूर्ति के चारों ओर घड़ी की सुई की दिशा में (Clockwise) सात बार घुमाएं। अंत में भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
माता शाकंभरी की आरती को विधिपूर्वक संपन्न करने के लिए निम्नलिखित पूजन सामग्री थाल में अवश्य होनी चाहिए:
- पूजन थाल: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: मिट्टी या पीतल का दीपक (घी या तेल और रुई की बत्ती सहित)।
- कपूर: शुद्ध कपूर (आरती को ऊर्जस्वित करने के लिए)।
- घंटी (Ghanti): नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मकता लाने के लिए पीतल या कांस्य की घंटी।
- शंख (Shankh): शंखनाद से ब्रह्मांडीय कंपन उत्पन्न होता है, जो देवी ऊर्जा को आकर्षित करता है।
- अक्षत (पीले चावल), पुष्प और रोली: माता को अर्पित करने के लिए।
- धूपबत्ती या अगरबत्ती: सुगंधित वातावरण के लिए।
- भोग सामग्री: फल, शाक, मूल या मिष्ठान का नैवेद्य।
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत और भक्ति का गहरा संबंध है। सही सुर और ताल से गाई गई आरती मन को तुरंत शांत कर एकाग्रता प्रदान करती है:
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| संभावित राग | राग कल्याण, राग यमन या राग भैरवी |
| ताल | कहरवा (८ मात्रा) या दादरा (६ मात्रा) |
| गायन का उत्तम समय | प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त या संध्याकाल (संध्या आरती के समय) |
| विशेष पर्व | शाकंभरी पूर्णिमा, पौष गुप्त नवरात्रि एवं प्रत्येक शुक्रवार |
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नित्य नियम से श्री शाकंभरी माता की आरती करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- अन्न-धान्य की कभी कमी नहीं होती: माँ शाकंभरी अन्नपूर्णा का भी रूप हैं, अतः इनके पूजन से घर में बरकत बनी रहती है।
- रोग मुक्ति एवं आरोग्य: वनस्पति और औषधियों की स्वामिनी होने के कारण माँ के स्मरण मात्र से शारीरिक कष्ट और बीमारियां दूर होती हैं।
- मन की शांति और सकारात्मकता: आरती के समय शंख और घंटी की ध्वनि से घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और मानसिक तनाव दूर होता है।
- कुटुंब में सुख-शांति: पारिवारिक कलह समाप्त होते हैं और आपसी प्रेम व सद्भाव बढ़ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: माँ शाकंभरी की आरती का मुख्य समय कौन सा है?
उत्तर: माँ शाकंभरी की आरती प्रातःकाल पूजा के समय और संध्याकाल में सूर्यास्त के पश्चात करना सबसे उत्तम माना जाता है।
प्रश्न 2: क्या घर पर शाकंभरी माता की आरती अकेले की जा सकती है?
उत्तर: हाँ, आप अपने घर के मंदिर में एकाग्रचित्त होकर श्रद्धापूर्वक माता की आरती अकेले या परिवार के साथ कर सकते हैं।
प्रश्न 3: शाकंभरी माता को किस प्रकार का भोग प्रिय है?
उत्तर: माता को ताजे फल, शाक-सब्जियां, सात्विक नैवेद्य और खीर का भोग अत्यंत प्रिय है।
प्रश्न 4: शाकंभरी पूर्णिमा का व्रत और आरती का क्या महत्व है?
उत्तर: पौष शुक्ल पूर्णिमा को शाकंभरी जयंती मनाई जाती है। इस दिन विशेष रूप से माता की आरती करने से जीवन में कभी भी भुखमरी, अकाल या आर्थिक संकट का सामना नहीं करना पड़ता।