॥ श्री सौभाग्यासुंदर माता की आरती - जय सौभाग्यासुंदर माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन संस्कृति में आदिशक्ति माँ जगदम्बा और माता पार्वती कात्यायनी का हर स्वरूप अपने भक्तों को लोक-परलोक के सभी सुख प्रदान करने वाला है। विशेष रूप से विवाहित स्त्रियों और सुहागिनों के लिए माता पार्वती का 'सौभाग्यासुंदर' स्वरूप अत्यंत पूजनीय एवं कल्याणकारी माना गया है। सौभाग्यासुंदर व्रत और इस पावन आरती के माध्यम से माता अपने भक्तों को अखण्ड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन, पारिवारिक समृद्धि और आरोग्य का वरदान देती हैं। Bhaktilok.in के इस विस्तृत आरती गाइड में आइए जानते हैं श्री सौभाग्यासुंदर माता की आरती के संपूर्ण बोल, उनका गूढ़ भावार्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि और इसके अनन्त आध्यात्मिक लाभ।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
जय सौभाग्यासुंदर माता, जय जय जगमाता।
अखिला ब्रह्माण्ड की स्वामिनी, सुख की दाता॥
जय सौभाग्यासुंदर माता...
गौरी शङ्कर की प्रियतमा, अर्धनारीश्वर रूपा।
तुम बिन सूना लागे जग में, मंगलमय सूपा॥
कुंकुम सिंदूर विराजत, भाल चन्द्र सोहे।
देख रूप तुम्हारा माता, त्रिभुवन मन मोहे॥
जय सौभाग्यासुंदर माता...
सुहागिनों की लाज बचाओ, मंगलगान करो।
पति दीर्घायु होय सदा, ऐसा वरदान धरो॥
सोलह शृंगार सजाए, जो जन तुमको ध्यावे।
मनवांछित फल पाकर वह, भवसागर तर जावे॥
जय सौभाग्यासुंदर माता...
लाल चुनरिया अंग विराजे, मोतियन हार गले।
भक्तजनों के संकट सारे, क्षण में दूर टले॥
दीनन की प्रतिपालक मैया, भव भय हारिणी हो।
सुख-समृद्धि की प्रदायिनी, संकट वारिणी हो॥
जय सौभाग्यासुंदर माता...
आरती जो नर नारी गावे, नितप्रति प्रेम धरे।
उसके घर में सदा विराजत, रिद्धि-सिद्धि खरे॥
प्रेम सहित जो दीप जलावे, थाल सजाई के।
चरण कमल में शीश झुकाए, मन हरसाई के॥
जय सौभाग्यासुंदर माता, जय जय जगमाता।
अखिला ब्रह्माण्ड की स्वामिनी, सुख की दाता॥
जय सौभाग्यासुंदर माता...
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
माता सौभाग्यासुंदर की यह आरती अत्यंत भावुक और अलौकिक ऊर्जा से परिपूर्ण है। इसके प्रत्येक शब्द में माँ के दिव्य स्वरूप और उनकी कृपा का बखान किया गया है:
- "जय सौभाग्यासुंदर माता, जय जय जगमाता...": इस प्रथम पंक्ति में भक्त माता को नमन करते हुए उनकी जयकार कर रहे हैं जो समस्त संसार की जननी (जगमाता) हैं और पूरे ब्रह्मांड को सुख प्रदान करती हैं।
- "गौरी शङ्कर की प्रियतमा, अर्धनारीश्वर रूपा...": यहाँ माँ को भगवान भोलेनाथ (शङ्कर) की अर्धांगिनी और प्रियतमा बताया गया है। भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप में माता ही उनका बायाँ भाग धारण करती हैं। उनके बिना संसार का मंगल असंभव है।
- "कुंकुम सिंदूर विराजत, भाल चन्द्र सोहे...": माता के माथे पर सुहाग का प्रतीक सिंदूर और कुंकुम शोभायमान है, तथा उनके ललाट पर चंद्रमा सुशोभित है। उनके इस अलौकिक सौंदर्य को देखकर तीनों लोक (त्रिभुवन) मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
- "सुहागिनों की लाज बचाओ, मंगलगान करो...": यह सुहागिन स्त्रियों के लिए विशेष प्रार्थना है कि माता उनके सुहाग की रक्षा करें, उनके जीवन में हमेशा मांगलिक कार्य होते रहें और उनके पतियों को लंबी आयु प्राप्त हो।
- "सोलह शृंगार सजाए, जो जन तुमको ध्यावे...": जो स्त्रियां सोलह शृंगार करके सच्चे मन से माता का ध्यान करती हैं, वे जीवन में सभी मनवांछित सुख भोगकर अंततः मोक्ष को प्राप्त करती हैं।
- "लाल चुनरिया अंग विराजे, मोतियन हार गले...": माँ ने लाल रंग की पावन चुनरी धारण की है और गले में मोतियों का सुंदर हार सुशोभित है। वे अपने भक्तों के सभी संकटों को पलभर में हर लेती हैं।
- "आरती जो नर नारी गावे, नितप्रति प्रेम धरे...": जो भी भक्त (स्त्री या पुरुष) प्रतिदिन प्रेम और निष्ठा के साथ इस आरती का गान करता है, उसके घर में रिद्धि-सिद्धि और सुख-शांति का स्थायी वास होता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन धर्म में सौभाग्यासुंदर व्रत और माता पार्वती के इस स्वरूप की पूजा का विशेष स्थान है। पुराणों के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनका यह स्वरूप अखंड सौभाग्य, वैवाहिक सामंजस्य और प्रेम का प्रतीक है। सौभाग्यासुंदर माता की आरती करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम व विश्वास प्रगाढ़ होता है। जिन कन्याओं के विवाह में बाधा आ रही हो, वे यदि इस आरती का नियमित पाठ करें, तो माता की कृपा से शीघ्र ही योग्य वर की प्राप्ति होती है। यह आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पारिवारिक सुख और स्त्री शक्ति के सम्मान का उत्सव है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
किसी भी देवी की आरती का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए उसे शास्त्रीय नियमों के अनुसार ही करना चाहिए:
- शुद्धता एवं प्रातकाल/संध्याकाल: स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर लाल या पीले रंग के) धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
- वेदी या चौकी की स्थापना: एक साफ लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर माता पार्वती और भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- षोडशोपचार पूजा: माता को रोली, अक्षत, लाल पुष्प, धूप, दीप, और सुहाग सामग्री (चूड़ियां, सिंदूर, महावर, चुनरी) अर्पित करें।
- नैवेद्य भोग: माता को खीर, हलवा या मौसमी फलों का भोग लगाएं।
- आरती का प्रज्वलन: शुद्ध घी का दीपक और कपूर जलाकर पूरे परिवार के साथ पूरी श्रद्धा और स्वर लय के साथ श्री सौभाग्यासुंदर माता की आरती गाएं।
- परिक्रमा एवं क्षमा प्रार्थना: आरती के पश्चात थाल को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) तीन बार घुमाएं, स्वयं की भी तीन परिक्रमा करें और अंत में भूलचूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
आरती की थाली को सजाते समय निम्नलिखित पवित्र सामग्रियों का होना अनिवार्य है:
- आरती की थाल: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: शुद्ध गाय के घी का दीपक (मिट्टी या धातु का)।
- कपूर: आरती के अंत में प्रज्वलित करने के लिए शुद्ध कपूर।
- धूप और अगरबत्ती: वातावरण को सुगंधित करने के लिए प्राकृतिक धूप।
- घंटी और शंख: नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मक स्पंदन के लिए घंटी और शंख।
- सुहाग सामग्री: सिंदूर, कुमकुम, अक्षत (सासाबुत चावल), और लाल पुष्प।
राग, ताल एवं गायन समय
माता सौभाग्यासुंदर की आरती को संगीत की दृष्टि से अत्यंत मधुर और लयबद्ध माना गया है।
- निश्चित राग: इस आरती को 'राग कल्याण' या 'राग यमन' में गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है, जो मन को शांति और दिव्यता प्रदान करता है।
- ताल: इसे कहवा (8 मात्रा) या दादरा (6 मात्रा) ताल में आसानी से गाया जा सकता है।
- गायन समय: इस आरती को प्रतिदिन प्रातःकाल पूजा के अंत में या विशेषकर प्रदोष काल (संध्या समय) में करना सर्वोत्तम माना गया है। मंगलवार और शुक्रवार के दिन इसका विशेष महत्व है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
श्री सौभाग्यासुंदर माता की आरती नियमित रूप से करने से जीवन में निम्नलिखित चमत्कारिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- अखंड सौभाग्य की प्राप्ति: सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु का वरदान मिलता है।
- वैवाहिक जीवन में मधुरता: पति-पत्नी के आपसी मतभेद समाप्त होते हैं और प्रेम व सामंजस्य बढ़ता है।
- गृह शांति एवं समृद्धि: घर में माता लक्ष्मी और माता पार्वती की संयुक्त कृपा से कभी भी अन्न-धन की कमी नहीं होती।
- मनोकामना पूर्ति: भक्तों के सभी प्रकार के मानसिक और शारीरिक संताप दूर होते हैं।