॥ श्री सत्यनारायण भगवान की आरती - जय लक्ष्मीनारायण देवा, स्वामी जय लक्ष्मीनारायण देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★भगवान श्री सत्यनारायण भगवान विष्णु का ही एक अत्यंत सात्विक, कल्याणकारी और करुणामय स्वरूप हैं। 'सत्य' ही ईश्वर है और 'नारायण' समस्त चराचर जगत के पालनहार हैं, इसलिए इस रूप की आराधना करने वाले भक्तों को जीवन के हर क्षेत्र में सत्य, धर्म, शांति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। स्कंद पुराण के रेवा खंड में वर्णित सत्यनारायण व्रत और कथा कलयुग में मनुष्य के समस्त पापों, दुखों और दरिद्रता को हरने वाली मानी गई है। इस संपूर्ण अनुष्ठान का समापन भगवान की दिव्य आरती 'जय लक्ष्मीनारायण देवा, स्वामी जय लक्ष्मीनारायण देवा' के बिना अधूरा माना जाता है। यह आरती न केवल भक्तों के मन को शांति प्रदान करती है, बल्कि घर की नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर माता लक्ष्मी और श्री हरि विष्णु की संयुक्त कृपा बरसाती है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
जय लक्ष्मीनारायण देवा, स्वामी जय लक्ष्मीनारायण देवा।
तुमको प्रेम से पूजत, तुमको प्रेम से ध्यावत, स्वामी जी को ध्यावत॥
जय लक्ष्मीनारायण देवा...
थार सुहावत चंपा, मुक्ताफल माला, स्वामी मुक्ताफल माला।
श्रवण कुण्डल मकराकृत, अंग विभूषा साजे, स्वामी अंग विभूषा साजे॥
जय लक्ष्मीनारायण देवा...
गैबी माल गले में, उपसे छवि छाजे, स्वामी छवि अति मन भावे।
पुष्प हार गले में, वैजयन्ती माला, स्वामी वैजयन्ती माला॥
जय लक्ष्मीनारायण देवा...
कौशेय पीतांबर धर, मुकुट शिर साजे, स्वामी मुकुट शिर साजे।
धूप दीप नैवेद्य, चरणन में राखे, स्वामी चरणन में राखे॥
जय लक्ष्मीनारायण देवा...
गोपीचंदन तिलक बिराजत, मृग मलय समाई, स्वामी मृग मलय समाई।
चतुरानन सनकादिक, नारद मुनि ध्यावत, स्वामी मुनि जन सब ध्यावत॥
जय लक्ष्मीनारायण देवा...
दीनन के दुःख हरता, तुम रक्षक मेरे, स्वामी तुम रक्षक मेरे।
भक्तन के प्रतिपालक, भव भय हर देवा, स्वामी भव भय हर देवा॥
जय लक्ष्मीनारायण देवा...
जो जन आरती गावे, घर मंगल होवे, स्वामी घर मंगल होवे।
रिद्धि सिद्धि घर आवे, सुख संपति पावे, स्वामी सुख संपति पावे॥
जय लक्ष्मीनारायण देवा...
सत्यनारायण स्वामी की आरती जो कोई गावे, स्वामी जो कोई गावे।
कहते 'नारायण' स्वामी, मनवांछित फल पावे, स्वामी मनवांछित फल पावे॥
जय लक्ष्मीनारायण देवा, स्वामी जय लक्ष्मीनारायण देवा॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान सत्यनारायण की यह आरती अत्यंत भावपूर्ण और गूढ़ आध्यात्मिक अर्थों से परिपूर्ण है। इसका प्रत्येक शब्द साधक को ईश्वर के साक्षात दर्शन का अनुभव कराता है:
- जय लक्ष्मीनारायण देवा...: हे माता लक्ष्मी सहित समस्त ब्रह्मांड के स्वामी श्री नारायण! आपकी जय हो। हम आपको अत्यंत श्रद्धा और प्रेम के साथ पूजते और आपका ध्यान करते हैं।
- थार सुहावत चंपा...: आपके श्री चरणों में चंपा के पुष्प और मोतियों की मालाएं अत्यंत शोभायमान हैं। आपके कानों में मकर (मछली) के आकार के सुंदर कुंडल और आपके अंगों पर दिव्य आभूषण सुशोभित हैं।
- गैबी माल गले में...: आपके गले में सुंदर वैजयन्ती माला और मोतियों के हार लटक रहे हैं, जिनकी अलौकिक छवि हमारे मन को मोह लेती है।
- कौशेय पीतांबर धर...: आपने रेशमी पीले वस्त्र (पीतांबर) धारण किए हैं और आपके मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट अत्यंत शोभा दे रहा है। हम आपके चरणों में धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करते हैं।
- गोपीचंदन तिलक...: आपके ललाट पर गोपीचंदन और सुगंधित मलयज (चंदन) का तिलक अत्यंत मनोरम लग रहा है। ब्रह्माजी (चतुरानन), सनकादिक ऋषि और देवर्षि नारद निरंतर आपका ध्यान करते हैं।
- दीनन के दुःख हरता...: हे प्रभु! आपही गरीबों और दीनों के दुखों को दूर करने वाले तथा इस भवसागर के भय से हमारी रक्षा करने वाले हैं।
- जो जन आरती गावे...: जो भी मनुष्य इस पवित्र आरती का गान करता है, उसके घर में मंगल कार्यों का आगमन होता है। उसके घर में रिद्धि-सिद्धि और अपार सुख-संपत्ति का वास होता है।
- कहते 'नारायण' स्वामी...: जो भी भक्त सत्यनारायण भगवान की इस आरती को गाता है, वह अपने जीवन में सभी मनवांछित फलों को प्राप्त करता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
हिन्दू धर्म ग्रंथों, विशेषकर स्कंद पुराण के अनुसार, भगवान सत्यनारायण का व्रत और पूजन कलयुग में अत्यंत फलदायी माना गया है। सत्यनारायण भगवान का अर्थ है- 'सत्य के मार्ग पर ले जाने वाले नारायण'। यह आरती केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध करने का माध्यम है।
ऐसी मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन, संक्रांति के अवसर पर या किसी भी शुभ कार्य के आरंभ पर सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने के बाद यह आरती करने से घर की दरिद्रता, गृह क्लेश, रोग और बाधाएं दूर होती हैं। माता लक्ष्मी के साथ नारायण की पूजा होने से घर में कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती और परिवार में प्रेम तथा सौहार्द बना रहता है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
भगवान सत्यनारायण की आरती करने के कुछ निश्चित शास्त्रीय नियम हैं जिनका पालन करने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है:
- स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें और वहां एक चौकी पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाएं।
- प्रतिमा स्थापना: चौकी पर भगवान सत्यनारायण (विष्णु जी का स्वरूप) और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। साथ ही कलश स्थापना करें।
- धूप-दीप प्रज्वलन: आरती शुरू करने से पहले घी का दीपक और धूपबत्ती जलाएं। दीपक को भगवान के दाहिने हाथ की ओर रखना चाहिए।
- आरती का क्रम: आरती गाते समय थाल को घड़ी की सुई की दिशा में (Clockwise) कम से कम तीन बार घुमाएं। सर्वप्रथम भगवान के चरणों में चार बार, नाभि पर दो बार, मुख मंडल पर एक बार और समस्त अंगों पर सात बार आरती घुमाई जाती है।
- पुष्पांजलि और आचमन: आरती के पश्चात हाथों में फूल लेकर 'मंत्रपुष्पांजलि' अर्पित करें और आरती की जोत पर हाथ फेरकर अपनी आंखों से लगाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
सत्यनारायण भगवान की आरती और पूजा को पूर्ण करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना अनिवार्य है:
- शुद्ध गाय का घी और रुई की बत्ती वाला दीपक
- धूपबत्ती और अगरबत्ती
- कपूर (आरती के अंत में कपूर प्रज्वलन के लिए)
- पीतल या चांदी की सजी हुई आरती की थाली
- घंटी (Ghanti) और शंख (Shankh)
- चरणामृत और पंजीरी / चूरमा (सत्यनारायण भगवान का विशेष प्रसाद)
- ताजे फल, पान का पत्ता, सुपारी, और इलायची
राग, ताल एवं गायन समय
भगवान सत्यनारायण की यह आरती राग कल्याण या राग यमन की शांत और मधुर धुनों में गाई जाती है। इसका गायन समय मुख्य रूप से संध्याकाल (प्रदोष काल) या सत्यनारायण कथा के तुरंत पश्चात निर्धारित है। आरती धीमी और भक्तिपूर्ण लय (ताल रूपक या तीन ताल) में गाई जानी चाहिए ताकि मन में एकाग्रता और शांति बनी रहे।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
जो व्यक्ति नियमित रूप से या प्रत्येक पूर्णिमा के दिन सत्यनारायण भगवान की कथा और आरती करता है, उसके जीवन में निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ देखने को मिलते हैं:
- मानसिक शांति: मन का भटकाव दूर होता है और ध्यान केंद्रित करने की शक्ति बढ़ती है।
- आर्थिक समृद्धि: व्यापार में घाटा, नौकरी में बाधाएं दूर होकर आय के नए स्रोत खुलते हैं।
- पारिवारिक सुख: घर के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम बढ़ता है और नकारात्मकता समाप्त होती है।
- पाप मुक्ति: अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।