॥ श्री संत तुकराम महाराज की पावन आरती - आरती तुकयाची केली हो साजरी: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★महाराष्ट्र की पावन भूमि पर अवतरित वारकरी संप्रदाय के शिखर पुरुष, महान संत और जगद्गुरु तुकोबा के नाम से विख्यात श्री संत तुकराम महाराज ने अपने अभंगों के माध्यम से जन-जन को भक्ति का मार्ग दिखाया। उनकी महिमा और उनके चरणों में अगाध श्रद्धा प्रकट करने के लिए गाई जाने वाली उनकी पावन आरती 'आरती तुकयाची केली हो साजरी' भक्तों के अंतःकरण को प्रदीप्त कर देती है। यह आरती केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि उस महान संत के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक दिव्य माध्यम है जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन भगवान विठ्ठल की भक्ति और लोक-कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। इस लेख में हम संत तुकराम महाराज की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गहन भावार्थ, पूजा विधि, आवश्यक सामग्री और इसके गायन से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
आरती तुकयाची केली हो साजरी ।
आनंदें नाचती वारकरी सत्वरी ॥
जय देव जय देव जय पांडुरंगा ।
भक्त तुकाराम चरणीं नमिले गंगा ॥ टेक ॥
देहू गांवीं जन्म घेतला सविस्तर ।
बोलिले अभंग जे वेदांचे सार ॥
पांडुरंगाची मूर्ती डोळ्यांनी देखिली ।
चरणसेवा करुनि धन्य माया झाली ॥
जय देव जय देव जय पांडुरंगा ॥१॥
औदुंबर छाया शोभे मनोमोहक ।
नाम घेता जाती दुःख आणि शोक ॥
अभंगांचे रत्नभांडार उघडिसे केले ।
भक्तांचे दु:खहर्ता संत सुखी केले ॥
जय देव जय देव जय पांडुरंगा ॥२॥
विठ्ठल विठ्ठल नामाचा गजर केला ।
अवघाची संसार देवमय केला ॥
सदेह वैकुंठासी गेले वरदान घेऊनी ।
धन्य झाले पाहुनि लोक तिन्ही भुवनी ॥
जय देव जय देव जय पांडुरंगा ॥३॥
तुकयाचा दास म्हणे चरणांसी लागून ।
तारिला संसार हा पार पाडून ॥
ओवाळू आरती भावे ओवाळू आरती ।
चरणकमळी तुज साष्टांग नमिते माती ॥
जय देव जय देव जय पांडुरंगा ॥४॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
संत तुकराम महाराज की यह आरती भक्ति रस से ओत-प्रोत है। इसके प्रत्येक शब्द में उनके महान व्यक्तित्व और कृतित्व की झलक मिलती है:
आरती तुकयाची केली हो साजरी, आनंदें नाचती वारकरी सत्वरी: इस प्रथम पंक्ति का भाव है कि हम सब मिलकर संत तुकराम (तुक्या) की यह भव्य और आनंदित आरती कर रहे हैं, जिसे देखकर सभी वारकरी भक्त प्रेम और उल्लास से सत्वर (शीघ्र) नृत्य करने लगे हैं।
देहू गांवीं जन्म घेतला सविस्तर, बोलिले अभंग जे वेदांचे सार: संत तुकराम महाराज ने महाराष्ट्र के देहू गांव में अवतार लिया और उनके मुख से निकले हुए अभंग मानो साक्षात वेदों का सार हैं, जो मानव मात्र के कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं।
औदुंबर छाया शोभे मनोमोहक, नाम घेता जाती दुःख और शोक: भगवान विठ्ठल के प्रति उनकी अनन्य भक्ति और उनके सान्निध्य में बैठकर जप करने से मानव जीवन के सभी प्रकार के दुःख और शोक नष्ट हो जाते हैं। उनके द्वारा रचे गए अभंगों का रत्नभांडार संसार के लिए अमूल्य निधि है।
विठ्ठल विठ्ठल नामाचा गजर केला, अवघाची संसार देवमय केला: तुकराम महाराज ने अपने जीवन में निरंतर 'विठ्ठल विठ्ठल' का नाम जप किया और अपनी भक्ति की पराकाष्ठा से इस संपूर्ण संसार को ही देवमय (भगवान श्री हरि विट्ठल से युक्त) बना दिया।
सदेह वैकुंठासी गेले वरदान घेऊनी, धन्य झाले पाहुनि लोक तिन्ही भुवनी: अंततः अपने इष्ट भगवान पांडुरंगा की कृपा से वे सदेह वैकुंठ धाम को पधारे, जिसे देखकर तीनों लोकों के जीव धन्य हो गए। उनका यह प्रस्थान भौतिक शरीर की नश्वरता से परे आध्यात्मिक अमरता का प्रतीक है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
वारकरी संप्रदाय में संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव, संत एकनाथ और संत तुकराम महाराज को स्तंभ माना जाता है। संत तुकराम ने 'अभंग गाथा' की रचना कर समाज को भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का मार्ग दिखाया। उनकी आरती गाना केवल एक परंपरा नहीं है, बल्कि यह उस युगदृष्टा संत के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अनुष्ठान है। ऐसा माना जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से संत तुकराम की आरती गाता है, उसके जीवन से अहंकार, अज्ञान और मोह का अंधकार समाप्त हो जाता है। भगवान विठ्ठल के अनन्य भक्त होने के कारण, तुकराम महाराज की पूजा और आरती करने से स्वयं भगवान विठ्ठल और रुक्मिणी अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
- प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और अपने पूजा घर को पवित्र करें।
- एक चौकी पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाकर भगवान श्री विठ्ठल-रुक्मिणी और संत तुकराम महाराज का चित्र या विग्रह स्थापित करें।
- गंगाजल छिड़ककर स्थान को शुद्ध करें और शुद्ध घी का दीपक तथा धूपबत्ती प्रज्वलित करें।
- संत तुकराम महाराज को चंदन का तिलक लगाएं, पुष्प, माला और तुलसी दल अर्पित करें।
- नैभोग (प्रसाद) के रूप में फल, मिश्री या गुड़-धनिया का भोग लगाएं।
- हाथ में कपूर की आरती या घी का दीपक लेकर श्रद्धापूर्वक 'आरती तुकयाची केली हो साजरी' का गान करें।
- आरती पूर्ण होने के बाद दोनों हाथों से दीपक की ज्योति को अपने माथे और नेत्रों से लगाएं और चरणामृत ग्रहण करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
एक आदर्श और फलदायी आरती संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना अनिवार्य है:
- पूजा की थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: शुद्ध गाय के घी का दीपक (मिट्टी या पीतल का)।
- कपूर: आरती के अंत में प्रज्वलित करने के लिए शुद्ध भीमसेनी कपूर।
- घंटी और शंख: सकारात्मक ऊर्जा के संचार और नकारात्मकता को दूर भगाने के लिए घंटी और शंख।
- पुष्प और माला: अर्पित करने के लिए ताजे फूल और तुलसी दल।
- धूप और अगरबत्ती: वातावरण को सुगंधित और पवित्र बनाने के लिए।
- नैवेद्य: भोग के लिए प्रसाद (मिश्री, फल, या पारंपरिक प्रसाद)।
राग, ताल एवं गायन समय
संत तुकराम महाराज की इस आरती को पारंपरिक वारकरी पद्धति से राग कल्याण या राग यमन की धुनों में गाया जाता है। इसकी ताल दादरा या कहरवा (ताल झपताल या त्रिताल के अनुकूल) होती है, जो श्रोताओं को झूमने पर विवश कर देती है। इस आरती को करने का सबसे उत्तम समय एकादशी के दिन, आषाढ़ी या कार्तिकी वारी के अवसर पर, अथवा प्रतिदिन संध्याकाल (प्रदोष काल) में है। प्रातःकाल की मंगला आरती के समय भी इसका गान अत्यंत फलदायी माना गया है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
संत तुकराम महाराज की आरती का नियमित पाठ और श्रवण करने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक शांति: मन में चल रहे उद्वेग, चिंता और तनाव शांत होते हैं और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।
- भक्ति भाव में वृद्धि: भगवान विठ्ठल और संत तुकराम के प्रति अनन्य प्रेम और भक्ति जागृत होती है।
- पापों का नाश: सच्चे मन से गाई गई यह आरती पिछले कर्मों के बंधनों और पापों को क्षीण करती है।
- पारिवारिक सुख-शांति: घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और क्लेश समाप्त होकर सुख-समृद्धि आती है।
- मोक्ष मार्ग की प्राप्ति: अहंकार का शमन होता है और मोक्ष का द्वार प्रशस्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संत तुकराम महाराज की आरती का मुख्य नाम क्या है?
संत तुकराम महाराज की इस पावन आरती को 'आरती तुकयाची केली हो साजरी' के नाम से जाना जाता है, जिसे वारकरी संप्रदाय में बहुत श्रद्धा से गाया जाता है।
संत तुकराम महाराज की आरती किस समय करनी चाहिए?
इस आरती को प्रतिदिन प्रातःकाल पूजा के समय अथवा संध्याकाल (प्रदोष काल) में करना सबसे उत्तम माना गया है। विशेषकर एकादशी के दिन इसका विशेष महत्व है।
क्या इस आरती के लिए किसी विशेष नियम की आवश्यकता होती है?
इसके लिए केवल शुद्धता, स्वच्छता और अनन्य श्रद्धा की आवश्यकता होती है। वारकरी परंपरा के अनुसार तुलसी दल और शुद्ध घी के दीपक का प्रयोग अनिवार्य माना गया है।
संत तुकराम महाराज का जन्म कहाँ हुआ था?
संत तुकराम महाराज का जन्म महाराष्ट्र के पुणे जिले के अंतर्गत देहू नामक पावन गाँव में हुआ था।