॥ श्री संत ज्ञानेश्वर महाराज की पावन आरती - आरती ज्ञानेश्वर माउली, योगियांची माउली: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★महाराष्ट्रीयन वारकरी संप्रदाय के शिखर पुरुष, महान संत, दार्शनिक और 'ज्ञानेश्वरी' के रचयिता श्री संत ज्ञानेश्वर महाराज केवल एक संत नहीं, अपितु साक्षात भक्ति और ज्ञान के अवतार थे। उनकी यह पावन आरती 'आरती ज्ञानेश्वर माउली, योगियांची माउली' हर उस साधक के लिए अमृततुल्य है जो अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की कामना करता है। इस लेख में हम संत ज्ञानेश्वर महाराज की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गहन भावार्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि और इसके अद्भुत आध्यात्मिक लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
यहाँ श्री संत ज्ञानेश्वर महाराज की प्रसिद्ध और पारंपरिक आरती प्रस्तुत है:
आरती ज्ञानेश्वर माउली, योगियांची माउली।
चैतन्याची मूर्ती, श्रीगुरुदेव॥
आरती ज्ञानेश्वर माउली...
तपाराशी ब्रह्मराशी, अज्ञानाचा नाश करी।
भक्तांचे कैवारी, पांडुरंग रूप॥
आरती ज्ञानेश्वर माउली...
आदीमाया आदिनाथ, प्रत्यक्ष शंकर।
उद्धार करावया, भूमीवर अवतरले॥
आरती ज्ञानेश्वर माउली...
अमृततुल्य ज्ञानेश्वरी, गीता ज्ञान सांगावया।
पामरांचे उद्धाराया, ग्रंथरत्न दिले॥
आरती ज्ञानेश्वर माउली...
ज्ञानदेवा पादपद्मी, नमन माझे भावे।
चरणी शरण जावे, भवसागर तरावया॥
आरती ज्ञानेश्वर माउली...
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
संत ज्ञानेश्वर महाराज की यह आरती केवल स्तुति नहीं है, बल्कि उनके विराट व्यक्तित्व और उनके द्वारा मानव कल्याण के लिए किए गए कार्यों का सार है। आइए इस पावन आरती के प्रत्येक चरण के भावार्थ को गहराई से समझें:
प्रथम चरण - 'आरती ज्ञानेश्वर माउली, योगियांची माउली। चैतन्याची मूर्ती, श्रीगुरुदेव॥' इसका अर्थ है कि हे संत ज्ञानेश्वर! आप हम सबके लिए माता (माउली) के समान स्नेही और रक्षक हैं। आप योगियों के भी मार्गदर्शक और श्रेष्ठ गुरु हैं। आप किसी साधारण शरीर में नहीं, बल्कि साक्षात चैतन्य की जीवंत मूर्ति हैं, जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है।
द्वितीय चरण - 'तपाराशी ब्रह्मराशी, अज्ञानाचा नाश करी। भक्तांचे कैवारी, पांडुरंग रूप॥' इस पंक्ति का भाव यह है कि महाराज ज्ञानेश्वर तपस्या के पुंज और ब्रह्मज्ञान के अथाह भंडार हैं। आपके सानिध्य से मनुष्य के जीवन का अज्ञान और मोह नष्ट हो जाता है। आप भक्तों के सच्चे हितैषी और रक्षक हैं, और आपमें स्वयं भगवान पांडुरंग (विट्ठल) का ही रूप झलकता है।
तृतीय चरण - 'आदीमाया आदिनाथ, प्रत्यक्ष शंकर। उद्धार करावया, भूमीवर अवतरले॥' यहाँ उनके दिव्य अवतार का वर्णन है। संत ज्ञानेश्वर को भगवान शिव और आदिनाथ का ही अंश माना गया है। वे इस भूलोक पर साधारण मनुष्यों के उद्धार और उन्हें भक्ति मार्ग दिखाने के लिए ही अवतरित हुए थे।
चतुर्थ चरण - 'अमृततुल्य ज्ञानेश्वरी, गीता ज्ञान सांगावया। पामरांचे उद्धाराया, ग्रंथरत्न दिले॥' यह पंक्ति श्रीमद्भागवत गीता पर आधारित उनकी अद्भुत रचना 'भावार्थ दीपिका' यानी 'ज्ञानेश्वरी' की महिमा बताती है। उन्होंने कठिन गीता के ज्ञान को प्राकृत भाषा में अमृत के समान सरल बनाकर इस संसार के दीन-दुखियों और पामर जीवों के उद्धार का मार्ग प्रशस्त किया।
पंचम चरण - 'ज्ञानदेवा पादपद्मी, नमन माझे भावे। चरणी शरण जावे, भवसागर तरावया॥' अंतिम पंक्तियों में भक्त पूरी श्रद्धा के साथ ज्ञानेश्वर महाराज के चरण कमलों में नमन करता है और प्रार्थना करता है कि इस भवसागर (संसार रूपी सागर) को पार करने के लिए वह केवल आपकी शरण में आया है, आपकी कृपा से ही मुक्ति संभव है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
वारकरी संप्रदाय में संत ज्ञानेश्वर महाराज को भगवान विठ्ठल का मानस पुत्र और स्वयं माउली (माता) का दर्जा दिया गया है। आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी के अवसर पर आंदी (आलंदी) से पंढरपूर तक निकलने वाली पालकी सोहले में लाखों वारकरी इस आरती का गान करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस आरती का नियमित गान करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मानसिक शांति मिलती है और परिवार में आरोग्य एवं समृद्धि का वास होता है। संत ज्ञानेश्वर ने मात्र 21 वर्ष की आयु में आलंदी में जीवित समाधि ली थी, और उनकी समाधि आज भी जीवित चैतन्य का अनुभव कराती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
किसी भी संत या भगवान की आरती करने के कुछ नियम और चरण होते हैं जिनका पालन करने से साधना का पूर्ण फल प्राप्त होता है:
- सबसे पहले प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें।
- संत ज्ञानेश्वर महाराज की तस्वीर या विग्रह के समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
- धूप, दीप, रोली, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।
- आरती की थाल को दाएं हाथ से घड़ी की सुई की दिशा में (Clockwise) कम से कम तीन बार वृत्ताकार घुमाएं।
- आरती गाते समय मन में पूर्ण श्रद्धा और समर्पण का भाव रखें।
- आरती समाप्त होने के बाद दोनों हाथों से दीपक की ज्योति को अपनी आँखों से लगाएं और चरणामृत ग्रहण करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
आरती को संपन्न और प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना अनिवार्य है:
- पूजा की थाल: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: शुद्ध गाय के घी का दीपक (मिट्टी या पीतल का)।
- कपूर: शुद्ध भीमसेनी कपूर जो वातावरण को पवित्र करता है।
- पुष्प और अक्षत: ताजे फूल और साबुत चावल।
- घंटी और शंख: नकारात्मक ऊर्जा को भगाने और सकारात्मक स्पंदन उत्पन्न करने के लिए।
- नैवेद्य: शक्कर, मिश्री, गुड़ या फल का भोग।
राग, ताल एवं गायन समय
संत ज्ञानेश्वर महाराज की यह आरती मुख्यतः राग कल्याण या राग यमन की सुमधुर धुनों में गाई जाती है। इसका गायन समय संध्यावंदन के समय (संध्या आरती) या एकादशी के पावन दिनों में विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। इसे तीन ताल या दादरा ताल के साथ समवेत स्वरों में गाया जाए तो इसका आध्यात्मिक प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
जो साधक प्रतिदिन नियमपूर्वक संत ज्ञानेश्वर महाराज की इस आरती का पाठ करता है, उसके जीवन में निम्नलिखित परिवर्तन और लाभ देखने को मिलते हैं:
- आत्मिक शांति: मन का भटकाव कम होता है और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ती है।
- ज्ञान की प्राप्ति: बुद्धि का विकास होता है और सात्विक विचारों का संचार होता है।
- संकट निवारण: जीवन के बड़े से बड़े संकट और बाधाएं गुरु कृपा से टल जाती हैं।
- मोक्ष मार्ग प्रशस्त: भक्त का अगला जन्म और मरण का चक्र सुगम होता है, और अंत में परम गति की प्राप्ति होती है।