पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री सालासर बालाजी आरती
10 पाठ

श्री सालासर बालाजी की आरती - आरती बाल कृष्ण की कीजै सालासर में विराजे बालाजी महाराज

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग यमन एवं मिश्र देश शास्त्रीय राग / ताल
6 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Deepak Kumar Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री सालासर बालाजी की आरती - आरती बाल कृष्ण की कीजै सालासर में विराजे बालाजी महाराज ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता

राजस्थान के शेखावाटी अंचल के चूरू जिले में स्थित सालासर धाम आज संपूर्ण विश्व के सनातन प्रेमियों के लिए परम आस्था, चमत्कार और अनंत विश्वास का केंद्र है। यहाँ विराजित भगवान श्री हनुमान जी को 'सालासर बालाजी' के रूप में पूजा जाता है। यह विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ हनुमान जी दाढ़ी और मूंछों वाले सुशोभित बाल-स्वरूप या वीर योद्धा स्वरूप में विराजमान हैं। सालासर बालाजी की स्थापना का इतिहास अत्यंत चमत्कारी और दिव्य है। संवत् १८५४ (सन १७९७) की श्रावण शुक्ल नवमी के दिन नागौर जिले के असोटिया गाँव में एक किसान अपने खेत में हल जोत रहा था। तभी हल का फाल किसी कठोर वस्तु से टकराया। जब उस स्थान की मिट्टी हटाई गई, तो वहाँ से प्रकट हुई पाषाण की एक दिव्य मूर्ति, जिस पर साक्षात महावीर हनुमान जी की आकृतियाँ थीं। उसी रात असोटिया के जागीरदार को स्वप्न में बालाजी महाराज ने दर्शन दिए और उस प्रतिमा को सालासर ले जाने का आदेश दिया। साथ ही, सालासर के महान संत श्री मोहनदास जी महाराज को भी उसी रात्रि बालाजी की प्रेरणा प्राप्त हुई थी।

संत मोहनदास जी सालासर के परम तपस्वी और अनन्य भक्त थे। उन्होंने अपने जीवन का कण-कण बालाजी की सेवा में समर्पित कर दिया था। जब बालाजी की यह दिव्य मूर्ति सालासर पहुँची, तो मोहनदास जी ने इस पावन स्थल पर मंदिर की स्थापना की। कालांतर में बालाजी की महिमा सम्पूर्ण भारत में फैल गई और यहाँ आने वाले भक्तों के कष्टों का निवारण होने लगा। इसी परम पावन दरबार में बालाजी की स्तुति, आराधना और संध्या-वंदन के लिए अनेक भजनों और आरतियों की रचना हुई। हालांकि इस आरती के रचयिता के संबंध में मौखिक परंपराएँ और संत समाज के संस्मरण अलग-अलग मत रखते हैं, किंतु अधिकांश विद्वान इसे सालासर के स्थानीय संतों, महात्माओं और मोहनदास जी के शिष्यों की अनन्य साधना का परिणाम मानते हैं। यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी जीवंत स्तुति है जो भक्त के हृदय में पराभक्ति, निर्भयता और हनुमत्कृपा का संचार कर देती है।

सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल

यहाँ श्री सालासर बालाजी की पावन आरती के संपूर्ण और प्रामाणिक बोल प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जिनका पाठ करने से मन और आत्मा को असीम शांति प्राप्त होती है:

आरती बाल कृष्ण की कीजै, सालासर में विराजे बालाजी महाराज।
दुष्ट दलन अंजनि नंदन, संकट मोचन प्राण अधार॥

बाल समय रवि भक्ष लियो तब, तीनहु लोक भयो अँधियारो।
ताहि समय संकट मोचन ने, देवताओं को काज सँवारो॥
बाल रूप अति सुंदर सोहे, काँधे मूँज जनेऊ साजे।
कानन कुंडल चमक रहे हैं, मुख पर तेज अनूप विराजे॥

हाथ वज्र औ ध्वजा विराजे, कन्दुक गदा त्रिशूल सुहावै।
नाथ तुम्हारी शरण जो आवे, सो नर अमर भए सुख पावै॥
शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन।
विद्यावान गुनी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं, जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं।
दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना॥

आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक तें काँपै।
भूत पिशाच निकट नहिं आवे, महावीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमंत वीरा।
संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

सब पर राम तपस्वी राजा, तिन के काज सकल तुम साजा।
और मनोरथ जो कोई लावै, सोई अमित जीवन फल पावे॥
चारों जुग परताप आपका, है परसिद्ध जगत उजियारा।
सालासर के बीच विराजे, काटत सकल भक्तन संसारा॥

जो जन आरती गावै नित उठि, तिनके कष्ट सदा कट जावैं।
बालक दास कहे करजोरी, चरन कमल में ध्यान लगावैं॥

पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ

आरती की प्रत्येक पंक्ति का गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ है। आइए इसका पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ समझें:

प्रथम पद का भावार्थ

'आरती बाल कृष्ण की कीजै, सालासर में विराजे बालाजी महाराज। दुष्ट दलन अंजनि नंदन, संकट मोचन प्राण अधार॥'
यहाँ अष्ट सिद्धियों और नवनिधियों के दाता हनुमान जी का स्मरण करते हुए भक्त उनके बाल स्वरूप को नमन करता है। माता अंजनि के नंदन (पुत्र) हनुमान जी दुष्टों और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश करने वाले हैं। वे भक्तों के प्राणों के आधार और समस्त संकटों को हरने वाले साक्षात प्राण-प्रिय देवता हैं, जो राजस्थान के पवित्र सालासर धाम में विराजमान होकर सबको अपनी छाया प्रदान करते हैं।

द्वितीय पद का भावार्थ

'बाल समय रवि भक्ष लियो तब, तीनहु लोक भयो अँधियारो। ताहि समय संकट मोचन ने, देवताओं को काज सँवारो॥ बाल रूप अति सुंदर सोहे, काँधे मूँज जनेऊ साजे। कानन कुंडल चमक रहे हैं, मुख पर तेज अनूप विराजे॥'
इस पद में हनुमान जी के बाल्यकाल की उस प्रसिद्ध पौराणिक लीला का स्मरण किया गया है जब उन्होंने बालपन में सूर्य को मीठा फल समझकर निगल लिया था, जिससे तीनों लोकों में अंधकार छा गया था। उस समय भी संकट मोचन ने देवताओं के संकट को दूर किया था। उनके बाल रूप का वर्णन करते हुए भक्त कहता है कि उनके कंधे पर मूँज का जनेऊ सुशोभित है, कानों में कुंडल चमक रहे हैं और उनके मुख मंडल पर अलौकिक व अनुपम तेज सुशोभित हो रहा है।

तृतीय पद का भावार्थ

'हाथ वज्र औ ध्वजा विराजे, कन्दुक गदा त्रिशूल सुहावै। नाथ तुम्हारी शरण जो आवे, सो नर अमर भए सुख पावै॥ शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन। विद्यावान गुनी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥'
भक्त उनके शस्त्रों और स्वरूप का वर्णन करता है—जिनके हाथों में वज्र, ध्वजा, गदा और त्रिशूल सुशोभित होते हैं। जो भी मनुष्य आपकी शरण में आता है, वह भवसागर से पार होकर अमरत्व और परम सुख को प्राप्त करता है। आप भगवान शिव के अंश (रुद्रा अवतार) और केसरी जी के नंदन हैं। आपका तेज और प्रताप संपूर्ण जगत में वंदनीय है। आप समस्त विद्याओं के सागर, गुणों के धाम, अत्यंत चतुर और प्रभु श्रीराम के कार्यों को करने के लिए सदैव तत्पर रहने वाले हैं।

चतुर्थ पद का भावार्थ

'प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं, जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं। दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥ राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे। सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना॥'
माता सीता की खोज के समय प्रभु श्रीराम की मुद्रिका को मुख में रखकर आपने समुद्र को एक छलाँग में लाँघ लिया था, जिसमें कोई अचरज नहीं है क्योंकि आप सामर्थ्यवान हैं। संसार के जितने भी कठिन और असंभव कार्य हैं, वे सब आपकी कृपा मात्र से सुगम हो जाते हैं। आप श्रीराम के दरबार के मुख्य द्वारपाल और रक्षक हैं, आपकी अनुमति के बिना वहाँ प्रवेश संभव नहीं है। जो आपकी शरण में आते हैं, वे सभी सुख प्राप्त करते हैं; जब आप जैसे रक्षक साथ हों, तो किसी को भी किसी प्रकार का भय नहीं रहता।

पंचम पद का भावार्थ

'आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक तें काँपै। भूत पिशाच निकट नहिं आवे, महावीर जब नाम सुनावै॥ नासै रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमंत वीरा। संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥'
आपके अतुलित बल और तेज को केवल आप ही संभाल सकते हैं। आपकी एक हुंकार से तीनों लोक काँप उठते हैं। आपके महावीर नाम का स्मरण मात्र करने से भूत, पिशाच और सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियाँ कोसों दूर भाग जाती हैं। जो वीर हनुमान का निरंतर जप करते हैं, उनके सारे रोग और पीताएँ नष्ट हो जाती हैं। जो मनुष्य मन, वचन और कर्म से हनुमान जी का ध्यान करता है, हनुमान जी उसे बड़े से बड़े संकट से छुड़ा लेते हैं।

षष्ठम पद का भावार्थ

'सब पर राम तपस्वी राजा, तिन के काज सकल तुम साजा। और मनोरथ जो कोई लावै, सोई अमित जीवन फल पावे॥ चारों जुग परताप आपका, है परसिद्ध जगत उजियारा। सालासर के बीच विराजे, काटत सकल भक्तन संसारा॥ जो जन आरती गावै नित उठि, तिनके कष्ट सदा कट जावैं। बालक दास कहे करजोरी, चरन कमल में ध्यान लगावैं॥'
सम्पूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी श्रीराम जी के सभी कार्यों को आपने ही सुशोभित और पूर्ण किया है। जो भी भक्त सालासर बालाजी के दरबार में अपनी मनोकामना लेकर आता है, वह असीम जीवन फल प्राप्त करता है। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग—सातों और चारों युगों में आपका प्रताप प्रसिद्ध है और सारे जगत में आपका ही उजाला छाया हुआ है। सालासर धाम में विराजमान होकर आप भक्तों के संसार रूपी बंधनों और कष्टों को काटते हैं। जो भी मनुष्य नित्य उठकर इस आरती का गान करता है, उसके समस्त कष्ट सदा के लिए कट जाते हैं। रचयिता (बालक दास जी) हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! हमारे प्राण आपके चरण कमलों में ही सदा लगे रहें।

गायन का राग, ताल एवं धुन

भक्ति संगीत में राग और ताल का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। श्री सालासर बालाजी की आरती को गाने के लिए शास्त्रीय और लोक संगीत का एक अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। इस आरती का गायन मुख्य रूप से **राग यमन** और **मिश्र देश (Desh)** की स्वर लहरी में किया जाता है। राग यमन का शांत, गंभीर और सांध्यकालीन प्रभाव मन को तुरंत अंतर्मुखी बना देता है, जबकि देश राग में एक ऐसा उत्साह और ओज है जो हनुमान जी के वीर रस और पराक्रम को जीवंत कर देता है।

  • ताल: यह आरती सामान्यतः आठ मात्राओं की **कहरवा ताल (Kaharwa Tala)** या तीन ताल में गाई जाती है, जिसे ढोलक, मंजीरा और करताल की थाप पर आसानी से संगणित किया जा सकता है।
  • लय: आरती का आरंभ मध्य लय (Moderate Tempo) में होता है और अंत तक पहुँचते-पहुँचते यह तीव्र एवं उत्साहवर्धक हो जाती है, जिससे मंदिर या घर का पूरा वातावरण ऊर्जावान हो जाता है।
  • वाद्य यंत्र: इस आरती की प्रस्तुति में ढोलक, हारमोनियम, मंजीरा, झालर (करताल) और शंख का विशेष महत्व है। ताल की एक निश्चित गति भक्तों के भीतर सामूहिक ऊर्जा का संचार करती है।

आरती थाली घुमाने का क्रम व विधि

सनातन संस्कृति में आरती केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और आत्म-निवेदन का प्रतीक है। सालासर बालाजी की आरती करते समय निम्नलिखित शास्त्रीय नियमों और विधियों का पालन करना चाहिए:

  1. थाली की सज्जा: आरती की थाली में अष्टदल कमल या स्वास्तिक बनाकर कपूर, घी का दीपक (कम से कम पाँच बत्तियों वाला पंचमुखी दीया), कुमकुम, अक्षत, पुष्प और जल से भरा आचमनी पात्र सजाएँ।
  2. प्रज्वलन: शुद्ध गाय के घी या कपूर से दीपक प्रज्वलित करें। दीपक जलाते समय मन में यह भाव रखें कि यह ज्ञान का प्रकाश आपके भीतर के अज्ञान अंधकार को मिटा रहा है।
  3. आरती घुमाने का क्रम:
    • सबसे पहले प्रभु के चरणों की ओर चार बार आरती की थाली को गोलाकार घुमाएँ (यह भगवान के चरण कमलों में पूर्ण समर्पण है)।
    • इसके बाद भगवान की नाभि या उदर क्षेत्र की ओर दो बार घुमाएँ।
    • तत्पश्चात उनके मुखमंडल और मुकुट की ओर सात बार पूर्ण वृत्ताकार घुमाएँ।
    • अंत में समस्त अंगों (सम्पूर्ण शरीर) की तीन बार आरती उतारें। इस प्रकार कुल सात, चार और दो के क्रम से पूर्ण आरती की जाती है।
  4. प्रदक्षिणा और आचमन: आरती संपन्न होने के बाद अपनी ही जगह पर खड़े होकर तीन बार अपनी परिक्रमा (प्रदक्षिणा) करें। तत्पश्चात आरती पर जल फेरकर उसे उपस्थित भक्तों में आचमन के रूप में वितरित करें और स्वयं भी आँखों व मस्तक से लगाएँ।

कर्पूर का महत्व व फलश्रुति

आरती के अंत में गाए जाने वाले 'कर्पूरगौरं करुणावतारम्' या आरती की थाली में जलने वाला कर्पूर केवल एक सुगंधित पदार्थ नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा है। कर्पूर जब आग के संपर्क में आता है, तो वह बिना कोई अवशेष छोड़े पूरी तरह से जलकर हवा में विलीन हो जाता है। इसी प्रकार, साधक का अहंकार भी जब भक्ति की अग्नि में तपता है, तो वह पूरी तरह नष्ट होकर परमात्मा में लीन हो जाता है—यही कर्पूर जलाने का परम रहस्य है।

फलश्रुति: श्री सालासर बालाजी की इस पावन आरती का नित्य प्रातः और सायं काल में जो भी भक्त सच्चे हृदय से पाठ करता है, उसे निम्नलिखित फलों की प्राप्ति होती है:

  • सालासर बालाजी की असीम कृपा से घर में सुख, शांति, समृद्धि और आरोग्य का वास होता है।
  • भय, चिंता, भूत-प्रेत बाधा, बुरी नजर और शत्रु भय से सदा के लिए मुक्ति मिलती है।
  • व्यापार, नौकरी और शिक्षा के क्षेत्र में आने वाली समस्त बाधाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।
  • अंत समय में भगवान राम और हनुमान जी के चरणों में स्थान प्राप्त होता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

Frequently Asked Questions (FAQs)

प्रश्न 1: सालासर बालाजी की आरती का मुख्य समय क्या है?
उत्तर: सालासर बालाजी मंदिर में प्रतिदिन मंगला आरती, श्रृंगार आरती, राजभोग आरती और संध्या आरती का विधान है। सामान्यतः साधक अपने घरों में प्रातःकाल स्नान के बाद और संध्या के समय (सूर्यास्त के पश्चात) इस आरती का नियमपूर्वक पाठ करते हैं।

प्रश्न 2: क्या घर पर सालासर बालाजी की आरती गाई जा सकती है?
उत्तर: हाँ, बिल्कुल। आप अपने घर के पूजा स्थल पर सालासर बालाजी का चित्र या मूर्ति स्थापित कर विधि-विधान से दीपक प्रज्वलित कर इस आरती का सस्वर गान कर सकते हैं। इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

प्रश्न 3: सालासर बालाजी की मूर्ति अन्य हनुमान मूर्तियों से भिन्न क्यों है?
उत्तर: सालासर बालाजी की प्रतिमा विश्व की एकमात्र ऐसी हनुमान मूर्ति है जिसमें वे दाढ़ी और मूंछों वाले युवा एवं वीर योद्धा के रूप में प्रकट हुए हैं। यह स्वयंभू मूर्ति है जो खेत की जुताई के समय प्रकट हुई थी।

प्रश्न 4: इस आरती के नियमित पाठ से क्या लाभ होता है?
उत्तर: नियमित पाठ से मानसिक बल में वृद्धि होती है, संकटों का नाश होता है, असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मकता व आत्म-विश्वास का संचार होता है।

१. श्री सालासर बालाजी की आरती - आरती बाल कृष्ण की कीजै सालासर में विराजे बालाजी महाराज का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री सालासर बालाजी के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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