॥ श्री राणी भटियाणी जी की आरती - ॐ जय भटियाणी माता, स्वामी जय भटियाणी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★माँ राणी भटियाणी राजस्थान की अत्यंत पूजनीय, जागृत और चमत्कारी लोक देवियों में प्रमुख स्थान रखती हैं। जैसलमेर के जसाल्मेर राजवंश और राठौड़ वंश से जुड़ी माँ भटियाणी (जिन्हें 'मायड़ भटियाणी' और 'बासा' भी कहा जाता है) का इतिहास त्याग, तपस्या, पतिव्रत धर्म और अद्भुत लोक कल्याण की गाथा से परिपूर्ण है। उनकी कृपा मात्र से भक्तों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। उनकी आराधना में गाई जाने वाली 'श्री राणी भटियाणी जी की आरती' (ॐ जय भटियाणी माता, स्वामी जय भटियाणी माता) भक्तों के अंतःकरण को पवित्र कर उन्हें माता के चरणों में लीन कर देती है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम माँ भटियाणी की संपूर्ण आरती, उसके अर्थ, पूजा विधि, महत्व और आध्यात्मिक लाभों का सविस्तार वर्णन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
यहाँ माँ राणी भटियाणी जी की प्रसिद्ध और पारंपरिक आरती के संपूर्ण बोल प्रस्तुत हैं, जिन्हें श्रद्धापूर्वक गाने से माता प्रसन्न होती हैं:
ॐ जय भटियाणी माता, स्वामी जय भटियाणी माता।
जसवंतपुरा की रानी, तुम ही हो भाग्यविधाता॥ ॐ जय...॥
सिंध रावजी की प्यारी, रूपा राठौड़ कहाई।
जैसलमेर की धरती पर, महिमा तुम्हारी छाई॥ ॐ जय...॥
हाथ त्रिशूल विराजे, खड्ग खप्पर धारी।
दुष्टों का संहार करो, माँ तुम हो बलधारी॥ ॐ जय...॥
भक्तन की पीर हरो, संकट तुम टारों।
डूबती नैया मेरी, आकर के पार करो॥ ॐ जय...॥
सुख-समृद्धि दो माता, घर में वास करो।
अंधकार जीवन का, दूर प्रकाश करो॥ ॐ जय...॥
जो कोई नर ध्यावे, मनवांछित फल पावे।
तेरी महिमा गावे, निसदिन गुण गावे॥ ॐ जय...॥
धूप दीप नैवेद्य से, आरती उतारें।
चरणों में तेरे माता, हम प्राण वारें॥ ॐ जय...॥
बोलो श्री राणी भटियाणी की जय!
बोलो मायड़ भटियाणी की जय!
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भक्ति का मार्ग तब अधिक प्रगाढ़ होता है जब हम गाए जाने वाले भजनों और आरतियों के गूढ़ अर्थ को समझते हैं। माँ राणी भटियाणी जी की इस पावन आरती का विस्तृत भावार्थ निम्नलिखित है:
ॐ जय भटियाणी माता, स्वामी जय भटियाणी माता...
इस प्रारंभिक पंक्ति में भक्त माता भटियाणी की वंदना करते हुए उनकी जयकार करते हैं। भक्त स्वीकार करते हैं कि हे माता! आप ही हमारी स्वामिनी और भाग्यविधाता हैं, जो हमारे जीवन के सभी लेखों और कर्मों को दिशा देती हैं।
सिंध रावजी की प्यारी, रूपा राठौड़ कहाई...
यहाँ माता के ऐतिहासिक और अलौकिक स्वरूप का स्मरण किया गया है। आपका मूल नाम रूपा था और आप राठौड़ वंश से संबंधित थीं। सिंध रावजी के साथ आपका संबंध और आपकी त्याग-तपस्या की गाथा इतिहास में अमर है।
हाथ त्रिशूल विराजे, खड्ग खप्पर धारी...
माता भटियाणी के शक्ति स्वरूपा का वर्णन करते हुए भक्त कहते हैं कि आपके हाथों में त्रिशूल, खड्ग और खप्पर शोभायमान हैं। आप आदि शक्ति दुर्गा का ही अवतार हैं, जो दुष्टों और नकारात्मक शक्तियों का संहार करने में समर्थ हैं।
भक्तन की पीर हरो, संकट तुम टारों...
यह पंक्ति भक्त की प्रार्थना को दर्शाती है। भक्त करबद्ध होकर विनती करता है कि हे माता! आप हमारे सभी दुखों, पीड़ाओं और संकटों का हरण कर लीजिए और हमारी जीवन रूपी नैया को भवसागर से पार लगा दीजिए।
सुख-समृद्धि दो माता, घर में वास करो...
परिवार और गृहस्थ जीवन की शांति के लिए माता से निवेदन किया गया है कि हे माता हमारे घर में सुख, शांति, ऐश्वर्य और आरोग्यता का वास हो तथा हमारे जीवन के अज्ञान रूपी अंधकार को अपने ज्ञान के प्रकाश से दूर कर दीजिए।
जो कोई नर ध्यावे, मनवांछित फल पावे...
माता की महिमा अपरंपार है। जो भी मनुष्य सच्चे मन और श्रद्धा से आपका स्मरण करता है, वह अपनी सभी इच्छाओं और मनोकामनाओं को पूर्ण कर लेता है।
धूप दीप नैवेद्य से, आरती उतारें...
अंत में भक्त कहते हैं कि हम धूप, दीप, कपूर और विभिन्न प्रकार के नैवेद्य अर्पित करके आपकी यह मंगल आरती उतार रहे हैं। हम अपने प्राण और सर्वस्व आपके श्रीचरणों में समर्पित करते हैं।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
माँ राणी भटियाणी केवल राजस्थान ही नहीं, अपितु पूरे भारतवर्ष में एक जागृत शक्तिपीठ के रूप में पूजी जाती हैं। उनका जीवन एक साधारण राजकुमारी से लेकर एक महान पतिव्रता और तत्पश्चात लोक देवी बनने की रोमांचक यात्रा रहा है।
- पतिव्रत धर्म की पराकाष्ठा: माँ भटियाणी ने अपने जीवन में धर्म, सत्य और पतिव्रत का पालन करते हुए अनेक कठिनाइयों का सामना किया और अपने प्राणों का उत्सर्ग किया। उनका जीवन नारी शक्ति के सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक है।
- मनोकामना पूर्ति (कामना शक्ति): मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे हृदय से जसलमेर स्थित उनके मुख्य मंदिर (जसोल धाम) अथवा अपने घर पर उनकी आरती करता है, उसकी हर मनोकामना पूरी होती है।
- भूत-प्रेत और नकारात्मक ऊर्जा का नाश: माँ भटियाणी की कृपा से ऊपरी बाधाएं, बुरी नजर और नकारात्मक ऊर्जा स्वतः समाप्त हो जाती हैं। उनकी आरती करने मात्र से घर में सकारात्मक और दैवीय ऊर्जा का संचार होता है।
- संतान की रक्षा और आरोग्य: विशेषकर राजस्थान और गुजरात में माता को बच्चों की रक्षक और परिवार की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। माता की आरती करने से वंश वृद्धि और स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
किसी भी देवी-देवता की पूजा और आरती का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में कुछ निश्चित नियमों और विधियों का उल्लेख किया गया है:
- शुद्धता एवं पवित्रता: प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मंदिर या पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
- आसन का चयन: पूजा करते समय कुशा, ऊन या दर्भ के आसन का ही प्रयोग करें। सीधे जमीन पर बैठकर पूजा न करें।
- धूप और दीप प्रज्वलन: सबसे पहले भगवान गणेश और अपने कुलदेवता का स्मरण करने के पश्चात माँ भटियाणी के सम्मुख शुद्ध घी या चमेली के तेल का दीपक प्रज्वलित करें।
- पुष्प और नैवेद्य अर्पण: माता को लाल रंग के पुष्प (विशेषकर गुलाब या गुड़हल) अति प्रिय हैं। इसके साथ ही मिष्ठान, नारियल, फल या चूरमे का भोग लगाएं।
- आरती गान और आचमन: दोनों हाथों से घंटी बजाते हुए श्रद्धा और उच्च स्वर में 'श्री राणी भटियाणी जी की आरती' गाएं। आरती संपन्न होने के बाद दोनों हाथों को दीपक की लौ पर सेककर अपनी आँखों और मस्तक पर लगाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
माँ राणी भटियाणी की आरती और पूजा को विधि-विधान से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:
- पूजा की थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: मिट्टी या पीतल का दीपक, शुद्ध गाय का घी, और लंबी रुई की बाती।
- कपूर: आरती को अंतिम रूप देने और वातावरण को शुद्ध करने के लिए शुद्ध कपूर।
- घंटी एवं शंख: नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाने और सकारात्मक स्पंदन के लिए पीतल की घंटी और शंख।
- धूपबत्ती या अगरबत्ती: सुगंधित प्राकृतिक धूप या गुग्गल।
- पुष्प एवं माला: ताजे लाल और पीले फूल, माता के लिए विशेष चुनरी या वस्त्र।
- नैवेद्य (भोग): बताशा, मिश्री, ऋतुफल या घर का बना शुद्ध मिष्ठान/चूरमा।
- अक्षत और कुमकुम: तिलक लगाने और अक्षत चढ़ाने के लिए।
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत और लय का देवी देवताओं की आराधना में विशेष स्थान है। माँ राणी भटियाणी की आरती को सस्वर गाने के लिए निम्नलिखित शास्त्रीय और लोक संगीत के मानदंडों का पालन किया जा सकता है:
- उचित राग: इस आरती को 'राग कल्याण', 'राग यमन' या पारंपरिक राजस्थानी लोक धुन (मांड शैली) में बहुत ही मधुरता से गाया जा सकता है।
- ताल: इसे कहरवा ताल (8 मात्रा) या दादरा ताल (6 मात्रा) में आसानी से गाया जा सकता है, जो आम भक्तों द्वारा आसानी से तालमेल बिठाने योग्य होती है।
- गायन का सर्वोत्तम समय: संध्याकाल (गोधूलि बेला) जब दिन और रात का मिलन होता है, माँ भटियाणी की आरती का सबसे उत्तम समय माना जाता है। इसके अतिरिक्त नवरात्रि के नौ दिनों में और चैत्र/आश्विन मास के विशेष उत्सवों पर प्रातः और सायं दोनों समय यह आरती विशेष फलदायी होती है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से माँ राणी भटियाणी की आरती करने से साधक को न केवल भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग भी प्रशस्त होते हैं:
- आत्मबल में वृद्धि: माता की वीरता और शौर्य का गुणगान करने से साधक के मन में साहस और निर्भीकता का संचार होता है।
- कष्टों का निवारण: जीवन में आने वाले आकस्मिक संकट, शत्रु भय और मुकदमों आदि में विजय प्राप्त होती है।
- पारिवारिक सौहार्द: घर-परिवार में आपसी प्रेम, विश्वास और सामंजस्य बना रहता है। क्लेश और अशांति दूर होती है।
- मोक्ष का मार्ग: भक्ति भाव से नियमित आरती करने वाला जातक अंततः माँ के चरणों में स्थान प्राप्त करता है और उसके सारे पाप क्षीण हो जाते हैं।