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श्री बाबा रामदेव जी आरती
8 पाठ

श्री रामदेव जी की आरती - ॐ जय श्री रामदेव पीर, स्वामी जय श्री रामदेव पीर: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री रामदेव जी की आरती - ॐ जय श्री रामदेव पीर, स्वामी जय श्री रामदेव पीर: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

राजस्थान के लोक-देवता और जन-जन के आस्था के केंद्र रुणिचेरा धनी बाबा रामदेव जी (रामदेव पीर) केवल मारवाड़ ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत में पूजनीय हैं। भगवान श्री कृष्ण के अवतार माने जाने वाले बाबा रामदेव जी ने अपने चमत्कारों, समाज सुधार के कार्यों और अछूतोद्धार से करोड़ों दिलों पर राज किया है। उनकी उपासना में गाई जाने वाली श्री रामदेव जी की आरती ('ॐ जय श्री रामदेव पीर, स्वामी जय श्री रामदेव पीर') भक्तों के अंतःकरण को पवित्र करने वाली और समस्त दुखों का नाश करने वाली मानी जाती है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम बाबा रामदेव जी की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गहन भावार्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि और इसके चमत्कारी आध्यात्मिक फलों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय श्री रामदेव पीर, स्वामी जय श्री रामदेव पीर।
अजमल घर अवतार लियो, भक्तों के वीर॥
ॐ जय श्री रामदेव पीर...

मेणादे के गर्भ से प्रगटे, अजमल जी के लाल।
परचे भारी जग में दीन्हा, मेटे सब जंजाल॥
ॐ जय श्री रामदेव पीर...

नीले घोड़े पर असवारो, हाथों में नेजा राजै।
भादवा सुदी दूज तिहारे, मेला भारी सजै॥
ॐ जय श्री रामदेव पीर...

डाली बाई बहन तुम्हारी, हरजी भाटी दास कहायो।
सुखों के दाता संकट मोचन, दर पर जो आया पायो॥
ॐ जय श्री रामदेव पीर...

पाँचों पीर पिरों के पीर, रुणिचा धाम बसाया।
कुँवर रामसापीर कहाए, अमरपुर से धाया॥
ॐ जय श्री रामदेव पीर...

जो जन ध्यान धरे मन लावे, वांछा फल पावे।
'दास' चरण में शीश झुकावे, संकट मिट जावे॥
ॐ जय श्री रामदेव पीर, स्वामी जय श्री रामदेव पीर।

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

बाबा रामदेव जी की यह आरती अत्यंत भावपूर्ण और उनके जीवन-चरित्र का सार प्रस्तुत करने वाली है। आइए इसके प्रत्येक पद के गहरे अर्थ को समझें:

प्रथम पद: 'ॐ जय श्री रामदेव पीर, स्वामी जय श्री रामदेव पीर। अजमल घर अवतार लियो, भक्तों के वीर॥'
भावार्थ: हे रामदेव पीर! आपकी जय हो, आपकी जय हो। आपने तोमर वंशी राजा अजमल जी के घर में अवतार लिया और आप अपने भक्तों की रक्षा करने वाले महान शूरवीर हैं। यह पंक्ति उनके दिव्य अवतरण और भक्त-वत्सल स्वरूप को दर्शाती है।

द्वितीय पद: 'मेणादे के गर्भ से प्रगटे, अजमल जी के लाल। परचे भारी जग में दीन्हा, मेटे सब जंजाल॥'
भावार्थ: माता मेणादे की कोख से प्रकट होकर आपने अजमल जी के घर को प्रदीप्त किया। आपने इस संसार में एक से बढ़कर एक भारी 'परचे' (चमत्कार) दिए और अपने भक्तों के संसार रूपी सभी जंजालों व दुखों को हमेशा के लिए मिटा दिया।

तृतीय पद: 'नीले घोड़े पर असवारो, हाथों में नेजा राजै। भादवा सुदी दूज तिहारे, मेला भारी सजै॥'
भावार्थ: हे प्रभु! आप नीले रंग के घोड़े पर सवार रहते हैं और आपके हाथों में सफेद या सतरंगी 'नेजा' (निशान) शोभायमान होता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया (बाबे री दूज) को आपके दरबार में विशाल और भव्य मेला सजता है, जहाँ देश-विदेश से भक्त आते हैं।

चतुर्थ पद: 'डाली बाई बहन तुम्हारी, हरजी भाटी दास कहायो। सुखों के दाता संकट मोचन, दर पर जो आया पायो॥'
भावार्थ: धर्म की बहन डाली बाई आपकी अनन्य भक्त थीं और हरजी भाटी आपके परम सेवक रहे हैं। हे सुखों के दाता और संकट मोचन! जो भी सच्चे मन से आपके दरबार में आता है, वह मनवांछित फल अवश्य प्राप्त करता है।

पंचम पद: 'पाँचों पीर पिरों के पीर, रुणिचा धाम बसाया। कुँवर रामसापीर कहाए, अमरपुर से धाया॥'
भावार्थ: मक्का से आए पाँच पीरों की परीक्षा लेकर उन्हें चमत्कार दिखाने के कारण आप 'पीरों के पीर' कहलाए। आपने राजस्थान के मरुस्थल में 'रुणिचा' नामक पवित्र धाम बसाया और रामसापीर के रूप में भक्तों का कल्याण करने के लिए अवतरित हुए।

षष्ठम पद: 'जो जन ध्यान धरे मन लावे, वांछा फल पावे। 'दास' चरण में शीश झुकावे, संकट मिट जावे॥'
भावार्थ: जो भी मनुष्य सच्चे मन से आपका ध्यान लगाता है, वह अपनी सभी इच्छाओं (वांछा) को पूरा कर लेता है। जो भक्त आपके चरणों में शीश झुकाता है, उसके जीवन के सभी कष्ट और संकट हमेशा के लिए मिट जाते हैं।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

हिन्दू और लोक संस्कृति में बाबा रामदेव जी को भगवान श्री कृष्ण का अवतार माना जाता है। मान्यता है कि द्वारकाधीश ने ही वचन दिया था कि वे अजमल जी के घर पुत्र रूप में जन्म लेंगे। बाबा रामदेव जी ने छुआछूत, ऊंच-नीच और जात-पात के भेदों को मिटाकर समतावादी समाज की स्थापना की थी। उनकी आरती गाने या सुनने मात्र से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सकारात्मकता का संचार होता है। विशेष रूप से मारवाड़, गुजरात, पंजाब, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में रामदेव पीर की आरती का अत्यंत ऊंचा स्थान है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  • शुद्धता: प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • स्थान: पूजा घर में बाबा रामदेव जी की मूर्ति, तस्वीर या नेजा (निशान) को स्थापित करें।
  • दीपक प्रज्वलन: शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। धूपबत्ती और अगरबत्ती जलाएं।
  • पुष्प एवं भोग: बाबा को पीले वस्त्र, नारियल, चूरमे का भोग (या मिष्ठान) और पुष्प अर्पित करें।
  • आरती गान: ताली बजाकर और शंख-घंटी की ध्वनि के साथ सस्वर 'ॐ जय श्री रामदेव पीर' आरती गाएं।
  • परिक्रमा: आरती संपन्न होने के बाद अपने स्थान पर ही तीन बार clockwise परिक्रमा करें और आरती को स्वयं भी लें तथा परिवार में वितरित करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

एक पूर्ण और फलदायी आरती के लिए निम्नलिखित पूजन सामग्री का होना आवश्यक है:

  • तांबे, पीतल या चांदी की सजी हुई थाली
  • शुद्ध घी का दीपक (या कपूर आरती के लिए)
  • रुई की बत्तियां
  • धूपबत्ती और लोहबान
  • रोली, अक्षत (चावल), और कुमकुम तिलक के लिए
  • ताजा पुष्प और माला
  • चूरमा, लड्डू या मिश्री का भोग
  • घंटी और शंख (ध्वनि के लिए)

राग, ताल एवं गायन समय

श्री रामदेव जी की आरती को लोक धुनों के साथ-साथ पारंपरिक राग कल्याण या यमन में गाया जाता है। इसकी ताल কাহারवा (8 बीट) या दादरा (6 बीट) होती है, जो इसे अत्यंत लयबद्ध और झूमने योग्य बनाती है। इस आरती को करने का सर्वोत्तम समय संध्या बेला (गोदूलि बेला, शाम 6 बजे से 8 बजे के बीच) या भाद्रपद मास की दूज के अवसर पर है। हालांकि, दैनिक पूजा में सुबह और शाम दोनों समय इसका गान किया जा सकता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

बाबा रामदेव जी की आरती का नियमित पाठ करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • कष्टों का निवारण: जीवन में आने वाले आकस्मिक संकट, कर्जे और बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
  • आरोग्य लाभ: कुष्ठ रोग, नेत्र विकार और असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को बाबा की कृपा से राहत मिलती है।
  • पारिवारिक सुख-शांति: घर में आपसी प्रेम, सौहार्द और सुख-समृद्धि का वास होता है।
  • मन की शांति: अज्ञात भय, चिंता और मानसिक तनाव दूर होते हैं और दृढ़ आत्मबल की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

बाबा रामदेव जी को किसका अवतार माना जाता है?

बाबा रामदेव जी को भगवान श्री कृष्ण का अंशावतार तथा अर्जुन का पुनर्जन्म माना जाता है।

रुणिचा का मेला कब भरता है?

रुणिचा (जैसलमेर, राजस्थान) में प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया (दूज) से एकादशी तक विशाल मेला भरता है।

क्या रामदेव जी की आरती कोई भी कर सकता है?

हाँ, बाबा रामदेव जी 'पीरों के पीर' हैं और जाति-धर्म के बंधनों से परे सभी मानव जाति के कल्याणक हैं। कोई भी श्रद्धावान भक्त उनकी आरती कर सकता है।

बाबा रामदेव जी का प्रमुख प्रतीक चिन्ह क्या है?

बाबा रामदेव जी का प्रमुख प्रतीक 'नेजा' (सफेद या सतरंगी ध्वजा/निशान) और उनका 'नीला घोड़ा' (लीलो घोड़ो) है।

१. श्री रामदेव जी की आरती - ॐ जय श्री रामदेव पीर, स्वामी जय श्री रामदेव पीर: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री बाबा रामदेव जी के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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