॥ श्री रामचन्द्र जी की आरती - श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में भगवान श्री रामचन्द्र जी को मर्यादा पुरुषोत्तम, जगतपिता और ब्रह्मांड के पालनहार के रूप में पूजा जाता है। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित एवं महाकवि द्वारा महिमामंडित पावन भजन एवं आरती 'श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं' भक्तों के हृदय में भक्ति का अनंत स्त्रोत प्रवाहित कर देती है। यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का संकलन नहीं है, बल्कि यह भौतिक संसार के दुखों, जन्म-मरण के चक्र और भवभय से मुक्ति पाने का एक अचूक आध्यात्मिक माध्यम है। जिस घर में प्रतिदिन भगवान श्री राम की यह अलौकिक आरती श्रद्धा और प्रेम के साथ गाई जाती है, वहाँ सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। भक्तिलok.in के इस विशेष और विस्तृत आरती गाइड में हम इस दिव्य रचना के मूल बोल, गूढ़ भावार्थ, धार्मिक महत्व, और पूजन पद्धति का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं॥
कंदर्प अगणिত अमिय छबि नव నీरद सुन्दरं।
पटपीत मानहु तड़ित रुचि सुचि नौमि जनक सुतावरं॥
भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनं।
रघुनन्द आनन्द कंद कोशल चन्द दशरथ नन्दनं॥
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदार अङ्ग विभूषणं।
आज़ानु भुज शर चाप धरण सङ्ग्राम जित खरदूषणं॥
इति वदति तुलसीदास शङ्कर शेष मुनि मन रंजनं।
मम हृदय कंज निवास कुरु कामादि खल दल गंजनं॥
मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो मनु सुबर सहि सुंदर सुवरं।
सोइ रामु करि अनुराग ब्याह उत्सव मङ्गळ आयतनं॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान श्री राम की यह आरती गोसाईं तुलसीदास जी की परम भक्ति और उनके गाढ़ समर्पण का जीवंत दस्तावेज है। आइए इस दिव्य रचना की प्रत्येक पंक्ति के भाव को गहराई से समझें:
प्रथम छंद का भावार्थ
हे मेरे मन! तू उन कृपालु श्री रामचन्द्र जी का भजन कर, जो इस संसार के समस्त जन्म-मरण और जन्मजात भय (भवभय) को हरने वाले हैं। उनके नेत्र नए खिले हुए कमल (नव कंज) के समान सुंदर हैं, उनका मुखारविंद भी कमल जैसा कोमल है, तथा उनके हाथ और चरण भी लाल कमल के समान अत्यंत मनोरम और कोमल हैं।
द्वितीय छंद का भावार्थ
उनकी रूप-छवि कामदेवों की अनगिनत सुंदरता से भी बढ़कर है, और उनका शरीर नवीन जल से भरे हुए मेघ (नीले बादल) के समान सुंदर श्यामवर्ण है। उन्होंने पीतांबर (पीले वस्त्र) धारण किए हुए हैं, जो ऐसे शोभायमान हैं मानो नीले आकाश में बिजली चमक रही हो। ऐसे पवित्र स्वरूप वाले, माता जानकी के पति श्री राम को मैं प्रणाम करता हूँ.
तृतीय छंद का भावार्थ
हे मन! तू दीन-दुखियों के बंधु, सूर्य के समान तेजस्वी, दानव और दैत्य वंश का नाश करने वाले भगवान का भजन कर। आप रघुकुल को आनंदित करने वाले, आनंद के कंद, कोशल देश के चंद्रमा और राजा दशरथ के प्यारेुलारे नंदन हैं।
चतुर्थ छंद का भावार्थ
श्री राम के मस्तक पर सुंदर मुकुट, कानों में कुण्डल, ललाट पर शोभायमान तिलक और उनके प्रत्येक अंग पर उत्तम आभूषण सुशोभित हैं। उनकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी हैं (आज़ानुबाहु), वे हाथों में धनुष-बाण धारण किए रहते हैं और उन्होंने महाबली खर और दूषण जैसे राक्षसों का संग्राम में संहार किया है।
पंचम छंद का भावार्थ
तुलसीदास जी प्रार्थना करते हैं कि हे शिव, शेषनाग और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले प्रभु! आप मेरे हृदय रूपी कमल में हमेशा निवास करें और मेरे भीतर छिपे हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि समस्त खल (विकारों) का पूरी तरह से दमन कर दीजिए।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
श्री रामचन्द्र जी की यह आरती केवल एक स्तुति नहीं बल्कि महामंत्र के समान फलदायी है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान श्री राम त्रेतायुग में धर्म की स्थापना, अधर्म के नाश और सज्जनों की रक्षा के लिए अवतरित हुए थे। वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस और अध्यात्म रामायण में श्री राम के चरित्र को मर्यादा का सर्वोच्च मानदंड माना गया है।
जब कोई भक्त संध्याकाल में या पूजा के अंत में इस आरती का गान करता है, तो उसके आसपास की नकारात्मक शक्तियां स्वतः दूर हो जाती हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, भगवान राम का नाम स्वयं तारक मंत्र है। इस आरती का गान करने से ग्रहों की पीड़ा शांत होती है, विशेषकर सूर्य और मंगल ग्रह के दोषों से मुक्ति मिलती है, क्योंकि राम जी सूर्यवंश (रघुकुल) के सूर्य हैं और उनके पराक्रम की तुलना मंगल ग्रह के तेज से की जाती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
भगवान श्री राम की आरती विधि-विधान से करने पर ही उसका पूर्ण फल प्राप्त होता है। यहाँ चरण-बद्ध पूजा विधि दी गई है:
- शुद्धता एवं तैयारी: प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल छिड़कर पवित्र करें।
- वेदी की स्थापना: एक चौकी पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान श्री राम, माता सीता, लक्ष्मण जी और भक्त हनुमान की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- षोडशोपचार पूजन: भगवान को रोली, अक्षत, पीले पुष्प, दूर्वा, धूप, दीप और नैवेद्य (फल, मिठाई) अर्पित करें।
- आरती का प्रारंभ: घी का दीपक जलाकर और कपूर प्रज्वलित कर थाल सजाएं। शंख और घंटी की ध्वनि के साथ सस्वर आरती गाएं।
- आरती परिक्रमा: आरती की थाल को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) कम से कम चार बार घुमाएं—चरणों में चार बार, नाभि क्षेत्र में दो बार, मुख मंडल पर एक बार और संपूर्ण शरीर पर सात बार।
- आचमन और समर्पण: आरती संपन्न होने के बाद शंख से जल घुमाकर आचमन करें और दोनों हाथों से आरती की ज्योति को अपनी आँखों से लगाएं। उपस्थित भक्तों में चरणामृत और प्रसाद वितरित करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
भगवान श्री राम की आरती को विधिपूर्वक संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियां आवश्यक हैं:
- पूजा की थाल: पीतल, तांबे या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: मिट्टी या धातु का दीपक जिसमें गाय का शुद्ध घी और रुई की बत्ती हो।
- कपूर: शुद्ध भीमसेनी कपूर, जो वातावरण को सुगंधित और पवित्र करता है।
- घंटी (Ghanta): नकारात्मक ऊर्जा को भगाने और सकारात्मक स्पंदन के लिए पीतल की घंटी।
- शंख (Shankh): शंखनाद से ब्रह्मांडीय ऊर्जा जागृत होती है और देवी-देवता आकृष्ट होते हैं।
- अन्य सामग्री: रोली, अक्षत, पीले फूल, तुलसी दल (अत्यंत प्रिय), धूपबत्ती, और नैवेद्य हेतु मौसमी फल या पंजीरी।
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत की दृष्टि से श्री रामचन्द्र जी की यह आरती अत्यंत मधुर और गंभीर भाव वाली है। इसे मुख्य रूप से राग कल्याण या राग यमन में गाया जाता है, जो शांति और भक्ति भाव को तीव्र करता है। इसके अलावा इसे কাহারवा ताल या दीपचन्दी ताल में धीमी गति से गाया जा सकता है।
गायन का सर्वोत्तम समय:
- प्रातःकालीन बेला (सूर्योदय के समय) जब मन शांत होता है।
- संध्याकालीन आरती (प्रदोष काल) जब दिन और रात का मिलन होता है।
- विशेष अवसरों पर जैसे रामनवमी, विवाह पंचमी, दीपावली और प्रत्येक मंगलवार या गुरुवार को।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से श्री राम आरती का पाठ और श्रवण करने से निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ मिलते हैं:
- मानसिक शांति: मन की चंचलता समाप्त होती है और आंतरिक शांति की अनुभूति होती है।
- पाप नाश: जाने-अनजाने किए गए पापों और मानसिक संतापों से मुक्ति मिलती है।
- पारिवारिक सौहार्द: भगवान राम और माता सीता का आदर्श जीवन परिवार में प्रेम और एकता बढ़ाता है।
- भय मुक्ति: किसी भी प्रकार का अज्ञात भय, शत्रुओं का भय या संकट दूर होता है।
- मोक्ष प्राप्ति: अंत समय में भगवान श्री राम के चरणों में स्थान प्राप्त होता है।