॥ भगवान श्री राम जी की आरती - श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं सम्पूर्ण तुलसीदास पद ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता
सनातन संस्कृति और रामभक्ति की परंपरा में महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित स्तुति 'श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं' को अत्यंत उच्च कोटि का स्थान प्राप्त है। यद्यपि इसे अधिकांश स्थानों पर श्री राम आरती के रूप में गाया जाता है, किंतु आध्यात्मिक दृष्टि से यह महाकाव्य 'रामचरितमानस' और तुलसीदास जी की अनन्य रामभक्ति का सारगर्भित निचोड़ है। जिस प्रकार सूरदास जी के पद कृष्णभक्ति का प्राण हैं, उसी प्रकार तुलसीदास जी के यह पद श्री राम के चरणों में अर्पित शत-शत नमन और शरणागत की पुकार हैं।
ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसीदास जी ने जब काशी के संकटमोचन मंदिर और असी घाट पर बैठकर भगवान श्री राम के अलोकिक स्वरूप का ध्यान किया, तब उनके हृदय से यह स्तोत्र अनायास ही प्रकट हुआ। इसमें भगवान श्री राम के रूप-सौंदर्य, उनके स्वभाव, भक्तों के प्रति उनकी वात्सल्य भावना तथा भवसागर से पार लगाने वाली उनकी कृपा का अत्यंत सजीव चित्रण मिलता है। इस आरती का गायन करने मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्म के पाप और सांसारिक संताप नष्ट हो जाते हैं।
सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल
श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।
नवकंज लोचन कंज मुख कंज पद कंजादरुणं॥
कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुंदरं।
पटपीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौनि जनक सुतावरं॥
भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनं।
रघुनन्द आनंद कंद कौशल चन्द दशरथ नंदनं॥
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदार अंग विभूषणं।
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं॥
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं।
मम हृदय कंज निवास कुरु कामादिक्सल खंजनं॥
मनु जाहि राचेउ मिलिहि सोई वारु सहज सुंदर सावरो।
करुना निधान सुजान सीलू सनेहु जानत रावरो॥
एहि भांति गौरी आसीसु सुनिसहित सिय हरषी हिय।
তুলসী भवानी पूजी पुनि-पुनि मुनि मन मंदिर मिय॥
पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ
प्रत्येक पंक्ति में छिपे गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को समझना एक साधक के लिए अत्यंत आवश्यक है। आइए इस दिव्य स्तुति का पद-दर-पद भावार्थ समझें:
प्रथम पद
श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं। नवकंज लोचन कंज मुख कंज पद कंजादरुणं॥
भावार्थ: हे मेरे मन! तू कृपा के सागर भगवान श्री रामचंद्र का भजन कर, जो संसार के जन्म-मरण रूपी भयानक भयों (भवभय दारुणं) को हरने वाले हैं। उनके नेत्र नए खिले हुए कमल के समान (नवकंज लोचन) सुंदर हैं, उनका मुख भी कमल के सदृश है, उनके चरण-कमल भी कोमल हैं और उनके चरण-नख लालिमायुक्त कमलों की भांति शोभा दे रहे हैं।
द्वितीय पद
कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुंदरं। पटपीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौनि जनक सुतावरं॥
भावार्थ: जिनकी असीम और अलौकिक छवि के आगे अनंतिम कामदेव भी लज्जित हो जाएं, ऐसे वे श्री राम नए नीले मेघ (जलद) के समान सुंदर कांति वाले हैं। उनके शरीर पर पीतांबर (पीले वस्त्र) ऐसे शोभायमान हो रहे हैं मानो काले बादलों में बिजली चमक रही हो। ऐसे पवित्र और माता सीता के वर (स्वामी) श्री राम का मैं स्मरण करता हूँ।
तृतीय पद
भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनं। रघुनन्द आनंद कंद कौशल चन्द दशरथ नंदनं॥
भावार्थ: हे मन! उन दीनबंधुओं के बंधु, सूर्य के समान तेजस्वी, दानव और दैत्य कुल का नाश करने वाले भगवान का भजन कर। वे रघुवंश के आनंदकंद, कोशल देश रूपी आकाश के चंद्रमा और राजा दशरथ के प्रिय नंदन हैं।
चतुर्थ पद
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदार अंग विभूषणं। आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं॥
भावार्थ: जिनके मस्तक पर सुंदर मुकुट, कानों में कुण्डल, ललाट पर सुशोभित तिलक और उदार अंगों पर दिव्य आभूषण चमक रहे हैं। जिनकी भुजाएं घुटनों तक लंबी हैं (आजानुबाहु), जो हाथों में धनुष-बाण धारण किए हुए हैं और जिन्होंने युद्ध में खर और दूषण जैसे महाबली राक्षसों को परास्त किया है।
पंचम पद
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं। मम हृदय कंज निवास कुरु कामादिक्सल खंजनं॥
भावार्थ: तुलसीदास जी प्रार्थना करते हैं कि हे शिव, शेषनाग और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले प्रभु! आप मेरे हृदय रूपी कमल में हमेशा के लिए निवास कीजिए और काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों रूपी शत्रुओं का नाश कीजिए।
गायन का राग, ताल एवं धुन
संगीत शास्त्र के दृष्टिकोण से भगवान श्री राम की यह आरती अत्यंत मधुर और मन को एकाग्र करने वाली है। इसे सामान्यतः राग यमन अथवा राग खमाज में गाया जाता है। इसकी लय तीन ताल (१६ मात्रा) या दादरा ताल (६ मात्रा) में होती है। प्रातःकालीन संध्या वंदन या संध्या आरती के समय जब इस स्तुति को हारमोनियम और ढोलक के साथ स्वरबद्ध किया जाता है, तो पूरा वातावरण राममय और अध्यात्म से परिपूर्ण हो जाता है। इसके उच्चारण में शब्दों की स्पष्टता और भावों की गहराई का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि
श्री राम आरती को विधि-विधान के साथ संपन्न करने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है:
- पवित्रता: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और आसन पर बैठकर मानसिक रूप से श्री राम का स्मरण करें।
- थाली सजाना: पूजा की थाली में शुद्ध घी का दीपक (कम से कम पाँच बत्तियों वाला), कपूर, कुमकुम, अक्षत, पुष्प और घंटी रखें।
- आरती का क्रम: आरती गाते समय सबसे पहले भगवान के चरणों में थाली को चार बार घुमाएं, फिर नाभि देश में दो बार, मुख मंडल पर एक बार और अंत में संपूर्ण शरीर पर सात बार गोल-गोल (प्रदक्षिणा रूप में) थाली घुमाएं।
- शंख और घंटी नाद: आरती के दौरान घंटी निरंतर बजनी चाहिए ताकि नकारात्मक ऊर्जा दूर हो सके और सकारात्मक स्पंदन उत्पन्न हो।
कर्पूर का महत्व व फलश्रुति
आरती के अंत में कपूर प्रज्वलित करने का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। कपूर जिस प्रकार बिना कोई अवशेष छोड़े जलकर समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार साधक के अहंकार और वासनाएं भी प्रभु के प्रेम की अग्नि में भस्म हो जानी चाहिए। श्री राम आरती की फलश्रुति यह है कि जो भी भक्त प्रतिदिन नियमपूर्वक श्रद्धा और भक्ति के साथ इस आरती का गान करता है, उसके जीवन से समस्त क्लेश मिट जाते हैं और अंत में उसे श्री राम के परम धाम (साकेत लोक) की प्राप्ति होती है।