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श्री नवग्रह (राहु-केतु) आरती
7 पाठ

श्री राहु केतु नवग्रह शांति आरती: संपूर्ण बोल, विधि एवं महत्व

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग भैरवी / यमन शास्त्रीय राग / ताल
6 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री राहु केतु नवग्रह शांति आरती: संपूर्ण बोल, विधि एवं महत्व ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता

सनातन संस्कृति और वैदिक ज्योतिष में नवग्रहों का मानव जीवन पर अत्यंत गहरा प्रभाव माना गया है। इनमें सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि के साथ-साथ छाया ग्रह के रूप में राहु और केतु को भी अत्यंत प्रभावशाली स्थान प्राप्त है। जहाँ सूर्य और चंद्रमा को राजा और रानी की पदवी प्राप्त है, वहीं राहु और केतु को ज्योतिष में 'छाया ग्रह' या 'तमस ग्रह' कहा जाता है। समुद्र मंथन के दौरान स्वरभानु नामक राक्षस ने देवताओं का रूप धारण कर अमृत पान कर लिया था, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया था। सिर वाला भाग 'राहु' और धड़ वाला भाग 'केतु' के रूप में अमर हो गया।

राहु और केतु की यह खगोलीय स्थिति मानव जीवन में कालसर्प दोष, पितृ दोष, ग्रहण योग और विभिन्न प्रकार की मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक बाधाओं का कारण बनती है। इन बाधाओं के शमन और नवग्रहों की कृपा प्राप्ति के लिए प्राचीन ऋषियों, आचार्यों और संत परंपरा ने विभिन्न स्तोत्रों, मंत्रों और आरतियों की रचना की है। 'श्री राहु केतु नवग्रह शांति आरती' इसी परंपरा का एक अत्यंत दिव्य और चमत्कारी अंग है। इस आरती के रचयिता अज्ञात प्राचीन ऋषि और वैदिक संत हैं, जिन्होंने जनसाधारण के कल्याण के लिए इसे सरल पद्यबद्ध शैली में प्रस्तुत किया ताकि आम भक्त भी इसका गान करके अपने जीवन के कष्टों को दूर कर सकें।

जब कोई भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ नवग्रहों के अधिपति भगवान सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु की संयुक्त आरती करता है, तो ब्रह्मांडीय ऊर्जा का संतुलन स्थापित होता है। यह आरती केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि समस्त नक्षत्र मंडল के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक आध्यात्मिक माध्यम है। इसके पाठ से क्रूर ग्रहों की उग्रता शांत होती है और जीवन में सकारात्मकता, शांति, आरोग्य तथा ऐश्वर्य का आगमन होता है।

सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल

जय नवग्रह देवा, स्वामी जय नवग्रह देवा।
प्रथम मनाऊं सुरपति, पूरुज सब मेवा॥ जय नवग्रह देवा॥

सूर्यदेव तुम भास्कर, जगत के उज्यारे।
चंदा मामा शीतल, किरणें मन को तारे॥ जय नवग्रह देवा॥

मंगल भौम महाबली, रण में भयकारी।
बुध बुद्धिवंत ज्ञानी, विद्या के धारी॥ जय नवग्रह देवा॥

देवगुरु बृहस्पति, ज्ञानी सुखदाता।
शुक्र देव सुंदरता, वैभव के ज्ञाता॥ जय नवग्रह देवा॥

शनिदेव न्यायकारी, दुखहारी जग के।
कर्म फल दाता स्वामी, रक्षक हैं पग के॥ जय नवग्रह देवा॥

राहु महाबलशाली, छाया ग्रह राजा।
भ्रम को दूर करो तुम, राखो मम लाजा॥ जय नवग्रह देवा॥

केतु धड़ बलधारी, मोक्ष के प्रदाता।
विपत्ति हरो हमारी, हे जग के त्राता॥ जय नवग्रह देवा॥

जो यह आरती गावे, नवग्रह मन लावे।
सुख-संपत्ति घर पावे, संकट टरि जावे॥ जय नवग्रह देवा॥

पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ

प्रथम पद का भावार्थ: 'जय नवग्रह देवा, स्वामी जय नवग्रह देवा।' भक्तगण समस्त नौ ग्रहों की वंदना करते हुए उनकी जयकार करते हैं। 'प्रथम मनाऊं सुरपति, पूरुज सब मेवा॥' इसका अर्थ है कि सभी देवताओं के स्वामी और ग्रहों के नियंत्रणकर्ता भगवान का स्मरण करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में मधुरता व संतोष का वास होता है।

द्वितीय पद का भावार्थ: 'सूर्यदेव तुम भास्कर, जगत के उज्यारे। चंदा मामा शीतल, किरणें मन को तारे॥' इस चरण में जगत को प्रकाश और ऊर्जा देने वाले भगवान सूर्य (भास्कर) और शीतलता, शांति व मानसिक स्थिरता प्रदान करने वाले चंद्रमा की स्तुति की गई है। सूर्य आत्मा के कारक हैं और चंद्रमा मन के, अतः दोनों की शांति से जीवन संतुलित होता है।

तृतीय पद का भावार्थ: 'मंगल भौम महाबली, रण में भयकारी। बुध बुद्धिवंत ज्ञानी, विद्या के धारी॥' मंगल ग्रह पराक्रम, साहस, ऊर्जा और भूमि के कारक हैं, जो शत्रुओं पर विजय दिलाते हैं। वहीं बुध ग्रह बुद्धि, तर्क, वाणी, व्यापार और विद्या के दाता हैं। इन दोनों ग्रहों की कृपा से बौद्धिक क्षमता और पराक्रम में वृद्धि होती है.

चतुर्थ पद का भावार्थ: 'देवगुरु बृहस्पति, ज्ञानी सुखदाता। शुक्र देव सुंदरता, वैभव के ज्ञाता॥' देवगुरु Brihaspati (गुरु) ज्ञान, विवेक, भाग्य और वैवाहिक सुख के प्रदाता हैं। शुक्र ग्रह भौतिक सुख-सुविधाओं, ऐश्वर्य, कला, प्रेम और सुंदरता के कारक हैं। इनकी कृपा से जीवन में समृद्धि और आनंद का विस्तार होता है।

पंचम पद का भावार्थ: 'शनिदेव न्यायकारी, दुखहारी जग के। कर्म फल दाता स्वामी, रक्षक हैं पग के॥' शनि महाराज मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार फल देने वाले न्याय के देवता हैं। वे भक्तों के कष्टों को हरते हैं और उन्हें धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। शनि की शांति से जीवन के सभी संघर्ष समाप्त होते हैं।

षष्ठ पद का भावार्थ: 'राहु महाबलशाली, छाया ग्रह राजा। भ्रम को दूर करो तुम, राखो मम लाजा॥' राहु को एक शक्तिशाली छाया ग्रह माना गया है जो व्यक्ति के जीवन में भ्रम, अचानक आने वाली बाधाओं और मानसिक उलझनों का कारण बनता है। इस पद में राहु देव से प्रार्थना की जाती है कि वे भक्तों के जीवन के सभी भ्रमों और अंधकार को दूर करके उनकी मान-मर्यादा की रक्षा करें।

सप्तम पद का भावार्थ: 'केतु धड़ बलधारी, मोक्ष के प्रदाता। विपत्ति हरो हमारी, हे जग के त्राता॥' केतु को मोक्ष, आध्यात्मिकता और विचित्र परिस्थितियों का कारक माना जाता है। केतु के शांत होने पर गुप्त शत्रुओं और आकस्मिक संकटों से मुक्ति मिलती है। भक्त प्रार्थना करते हैं कि हे जग के त्राता, हमारी समस्त विपत्तियों का नाश करें।

अष्टम पद का भावार्थ: 'जो यह आरती गावे, नवग्रह मन लावे। सुख-संपत्ति घर पावे, संकट टरि जावे॥' अंत में आरती के फल का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन और श्रद्धा के साथ नवग्रहों की इस आरती का गान करता है, उसके घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और उसके सभी प्रकार के ग्रह जनित संकट हमेशा के लिए टल जाते हैं।

गायन का राग, ताल एवं धुन

श्री राहु केतु नवग्रह शांति आरती का गायन मुख्य रूप से 'राग भैरवी' या 'राग यमन' में किया जाता है। राग भैरवी भक्ति और शांति का प्रतीक है, जो मन को एकाग्र करती है, जबकि राग यमन में एक मधुर उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस आरती को पारंपरिक रूप से कहरवा ताल (८ मात्राओं की ताल) या दादरा ताल (६ मात्राओं की ताल) में गाया जाता है। गायन के दौरान ढोलक, मंजीरा, और हारमोनियम का प्रयोग करने से वातावरण अत्यंत पवित्र और भक्तिमय बन जाता है। आरती की गति मध्यम होनी चाहिए ताकि प्रत्येक शब्द का उच्चारण स्पष्ट रूप से हो सके और उसका कंपन श्रोता के मन-मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव डाले.

दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि

नवग्रह और राहु-केतु शांति की आरती करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करना चाहिए:

  • सामग्री: एक पीतल या तांबे की थाली, गाय का शुद्ध घी, कपूर, रोली, अक्षत (अतूट चावल), लाल और काले वस्त्र (राहु-केतु के लिए), पुष्प और धूपबत्ती।
  • स्थान शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। एक चौकी पर नवग्रह यंत्र या नवग्रहों के प्रतीक स्वरूप नौ सुपारी या सिक्के स्थापित करें।
  • दीप प्रज्वलन: थाली में कपास की बत्ती और शुद्ध घी का दीपक जलाएं। साथ ही कपूर भी प्रज्वलित करें।
  • आरती का क्रम: सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें, तत्पश्चात नवग्रहों का ध्यान करते हुए आरती की थाली को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) कुल सात बार घुमाएं।
  • विशेष ध्यान: राहु और केतु की शांति के लिए शनिवार या अमावस्या के दिन नीले या काले पुष्प अर्पित करें और तिल के तेल का दीपक जलाना विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। आरती पूर्ण होने के बाद दोनों हाथों से आरती की ज्योति को अपनी आँखों से लगाएं और चरणामृत ग्रहण करें।

कर्पूर का महत्व व फलश्रुति

हिन्दू सनातन परंपरा में आरती के अंत में प्रज्वलित किया जाने वाला 'कर्पूर' (कपूर) विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। जिस प्रकार कपूर जलने के बाद आकाश में पूरी तरह विलीन हो जाता है और पीछे कोई अवशेष या राख नहीं छोड़ता, उसी प्रकार भक्त का अहंकार भी ईश्वर की भक्ति में पूरी तरह समर्पित होकर नष्ट हो जाना चाहिए। कपूर की सुगंध से वातावरण के सूक्ष्म कीटाणु और नकारात्मक ऊर्जाएं नष्ट होती हैं, जिससे सकारात्मक और दिव्य ऊर्जा का प्रवाह बढ़ जाता है।

फलश्रुति: इस पावन नवग्रह एवं राहु-केतु शांति आरती का प्रतिदिन या विशेष अवसरों (जैसे शनिवार, अमावस्या, सूर्य-चंद्र ग्रहण, या जन्मकुंडली में ग्रह दोष होने पर) पाठ करने से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:

  • कुंडली में उपस्थित कालसर्प दोष, पितृ दोष और महादशा के अशुभ प्रभाव कम होते हैं।
  • मानसिक अशांति, अनिद्रा, भय और अज्ञात चिंता से मुक्ति मिलती है।
  • व्यापार, नौकरी और आजीविका में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और यश-कीर्ति की प्राप्ति होती है।
  • घर-परिवार में सुख, शांति, आरोग्य और आपसी प्रेम का माहौल बना रहता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: राहु और केतु की शांति के लिए आरती कब करनी चाहिए?
उत्तर: राहु और केतु की शांति के लिए शनिवार, मंगलवार, अमावस्या के दिन अथवा किसी भी ग्रह की महादशा या अंतर्दशा चलने पर यह आरती अत्यंत फलदायी होती है। इसे प्रतिदिन संध्याकाल में भी किया जा सकता है।

प्रश्न 2: क्या इस आरती को कोई भी साधारण गृहस्थ कर सकता है?
उत्तर: हाँ, इस आरती को कोई भी साधारण गृहस्थ अपने घर में श्रद्धापूर्वक कर सकता है। इसके लिए किसी जटिल तांत्रिक विधि की आवश्यकता नहीं होती, केवल शुद्ध मन और सात्विक भाव होना चाहिए।

प्रश्न 3: राहु-केतु की आरती के समय कौन से रंग के वस्त्र पहनना शुभ होता है?
उत्तर: राहु के लिए नीला या स्मोकी ग्रे और केतु के लिए धूसर (Smokey/Multi-color) या सात्विक श्वेत वस्त्र पहनना पूजा के दौरान अत्यंत शुभ माना जाता है।

प्रश्न 4: क्या नवग्रह आरती करने से कुंडली के सभी दोष शांत हो जाते हैं?
उत्तर: नियमित रूप से नवग्रह और राहु-केतु की आरती करने, मंत्र जाप करने और सात्विक जीवन जीने से ग्रहों के क्रूर प्रभाव बहुत हद तक शांत हो जाते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

१. श्री राहु केतु नवग्रह शांति आरती: संपूर्ण बोल, विधि एवं महत्व का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री नवग्रह (राहु-केतु) के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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