पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री श्री राधा माधव / बांके बिहारी आरती
5 पाठ

श्री राधा माधव जी की पावन आरती - जय जय राधा रमण हरि बोल, आरती कुंज बिहारी की: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
7 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री राधा माधव जी की पावन आरती - जय जय राधा रमण हरि बोल, आरती कुंज बिहारी की: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म और भक्ति मार्ग में श्री राधा माधव (बांके बिहारी) की उपासना का अत्यंत उच्च एवं विशिष्ट स्थान है। ब्रजमंडल के कण-कण में र रचे श्यामा-श्याम के प्रेम की पराकाष्ठा को समर्पित यह पावन आरती - 'आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की' और 'जय जय राधा रमण हरि बोल' भक्त के हृदय को अलौकिक आनंद और दिव्यता से भर देती है। इस विस्तृत आरती गाइड में हम जानेंगे श्री राधा माधव जी की आरती के संपूर्ण बोल, एक-एक पंक्ति का गहरा भावार्थ, सही पूजा विधि, आवश्यक सामग्री और इसके अनंत आध्यात्मिक लाभों के बारे में।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

आरती कुंज बिहारी की

आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की।
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥

गले में बज्‍जयन्ती माला, रिया बासुरी बजाए नंदलाला।
श्यामा छवि अति न्यारी, नैनन में बांके बिहारी,
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥

कंचन थार कपूर की बत्ती, आरती करत मालती रति।
ललित सुगा सखी गावत गारी, विरह प्रगट भई जुगल बिहारी,
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥

चमकत बीज कटोरी छटा, लटकत लट मुकुट की छटा।
अधर मधुर मुस्कान मनोहर, रीझत लखि छबि नटवर नागर,
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥

अनंत कोटि विष्णु ब्रह्मा शिव, सेवत पदरज निसदिन शिव।
नारद मुनि गान करत रिझाई, भक्तान की लाज रखत गोसाईं,
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥

जय जय राधा रमण हरि बोल

जय जय राधा रमण हरि बोल, हरि बोल, हरि बोल, जय राधा रमण हरि बोल।
जय जय कुंज बिहारी हरि बोल, हरि बोल, हरि बोल, जय कुंज बिहारी हरि बोल।
श्यामा श्याम की जय जय बोल, हरि बोल, हरि बोल, बांके बिहारी लाल की जय।

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री राधा माधव की यह दिव्य आरती केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह श्यामा-श्याम के नित्य विहार और उनके सौंदर्य का सजीव चित्र है। आइए इसका विस्तृत भावार्थ समझें:

"आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की..."
यहाँ भक्त कुंजों (वृंदावन के गुप्त व रमणीय स्थलों) में विहार करने वाले प्रियतम श्रीकृष्ण, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को धारण किया था (गिरधर), जो कंस आदि असुरों का संहार करने वाले मुरारी हैं, उनकी आरती उतार रहा है।

"गले में बज्ज्‍यन्ती माला, रिया बासुरी बजाए नंदलाला..."
प्रभु के गले में वैजयन्ती माला सुशोभित है। वे नन्दलाल अधरों पर प्यारी बांसुरी बजा रहे हैं। श्यामा (राधा रानी) और बांके बिहारी की यह जोड़ी संसार में सबसे निराली और अद्वितीय है।

"कंचन थार कपूर की बत्ती, आरती करत मालती रति..."
भक्त स्वर्ण (कंचन) की थाली में कपूर की ज्योति जलाकर आरती कर रहा है। सखियां और मालती जैसी गोपियां भाव-विभोर होकर युगल सरकार की आरती गा रही हैं।

"चमकत बीज कटोरी छटा, लटकत लट मुकुट की छटा..."
भगवान के मस्तक पर मोर मुकुट सुशोभित है और उसकी लटें उनके कपोलों पर लटक रही हैं। उनके अधरों की मधुर मुस्कान इतनी मनमोहक है कि नटवर नागर की इस छवि को देखकर भक्त का मन मुग्ध हो जाता है।

"अनंत कोटि विष्णु ब्रह्मा शिव, सेवत पदरज निसदिन शिव..."
ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे अनंत कोटि देवता और शिवजी भी निरंतर जिनके चरणों की धूल की सेवा करते हैं, वे दीनबंधु भक्तों की लाज रखते हैं।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

सनातन परंपरा में आरती को भगवान के प्रति समर्पण और उनकी दिव्यता की वंदना का सर्वोच्च साधन माना गया है। श्री राधा माधव की आरती करने मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। ब्रज संस्कृति में श्यामा-श्याम की उपासना को 'मधुर भक्ति' या 'राधा-भाव' कहा गया है। इस आरती का गान करने से साधक को वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर और निधिवन के दिव्य दर्शनों की अनुभूति होती है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन संध्या काल में श्री राधा माधव की आरती गाता है और सुनता है, उसे भगवान श्रीकृष्ण के गोलोकधाम में शाश्वत स्थान प्राप्त होता है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

नियम और विधि के साथ की गई पूजा ही पूर्ण फल प्रदान करती है। श्री राधा माधव की आरती करते समय निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:

  • स्नान एवं पवित्रता: प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • स्थान की शुद्धि: मंदिर या पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। श्री राधा-कृष्ण की प्रतिमा या चित्र को पुष्पों से सजाएं।
  • दीप प्रज्ज्वलन: तांबे या पीतल के दीपक में शुद्ध घी या कपूर का प्रयोग करें।
  • आसमान में घुमाने की विधि: आरती हमेशा दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में घुमाई जानी चाहिए। भगवान के चरणों में 4 बार, नाभि क्षेत्र में 2 बार, मुख मंडल पर 1 बार और समस्त अंगों पर 7 बार आरती घुमाने का विधान है।
  • आचमन और पुष्पानंजलि: आरती पूर्ण होने के बाद दोनों हाथों से आरती की ज्योति लें, आंखों से लगाएं और अंत में पुष्प समर्पित करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

श्री राधा माधव की दिव्य आरती को संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री अनिवार्य रूप से थाली में सजाई जानी चाहिए:

  • शुद्ध चांदी, पीतल या तांबे की थाली
  • शुद्ध देशी गाय के घी का दीपक (या कपूर की टिकिया)
  • चंदन की धूप या अगरबत्ती
  • ताजे एवं सुगंधित पुष्प (विशेषकर गुलाब, मोगरा या गेंदा)
  • नैवेद्य या भोग (मिश्री, माखन-मिश्री, या फल)
  • पूजा की घंटी (घंटा) और शंख
  • रोली, कुमकुम और अक्षत (चावल)

राग, ताल एवं गायन समय

श्री राधा माधव की आरती मुख्य रूप से शास्त्रीय **राग कल्याण** या **राग यमन** में गाई जाती है, जो संध्या के समय के लिए अत्यंत उपयुक्त और मन को शांति देने वाला राग है। इसे तीन ताल या कहरवा ताल में मधुर स्वर में गाया जा सकता है। आरती का सर्वोत्तम समय **संध्याकाल (प्रदोष काल)** माना जाता है, जब सूर्य अस्त हो रहा हो और रात्रि का आगमन हो रहा हो। इसके अतिरिक्त, मंगला आरती (प्रातःकाल) और शयन आरती (रात्रि) के समय भी इसके विशेष बोलों का गान किया जाता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से श्री राधा माधव की आरती करने और सुनने के अचूक आध्यात्मिक लाभ निम्नलिखित हैं:

  • मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति मिलती है।
  • परिवार में सुख, समृद्धि, प्रेम और सौहार्द बना रहता है।
  • भक्त के हृदय में भगवान के प्रति अनन्य प्रेम (भक्ति) का उदय होता है।
  • अकाल मृत्यु, भय, रोग और सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं।
  • अंत समय में भगवान के चरणों की प्राप्ति (मोक्ष) होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री राधा माधव जी की पावन आरती - जय जय राधा रमण हरि बोल, आरती कुंज बिहारी की: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री राधा माधव / बांके बिहारी के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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