॥ श्री राधा अष्टमी विशेष - श्री राधारानी की पावन आरती (कीजै राधिका सुमेरु की आरती): संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★श्री राधा अष्टमी का पावन पर्व सनातन धर्म में अत्यंत ही महिमामंडित और विशेष माना गया है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को वृषभानु ललकी श्री राधा रानी का प्राकट्य उत्सव संपूर्ण ब्रजमंडल सहित पूरे विश्व में अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर भगवती राधारानी की विधिवत आराधना करने और उनकी अलौकतीक आरती गाने से साधक के जीवन के समस्त संताप दूर हो जाते हैं और उसे श्री बांकेबिहारी जी की अहैतुकी कृपा प्राप्त होती है। 'कीजै राधिका सुमेरु की आरती' राधारानी की परम प्रसिद्ध आरती है, जिसके गायन मात्र से मन वृंदावन के प्रेम रस में सराबोर हो जाता है। Bhaktilok.in के इस विशेष भक्ति ग्रंथ में हम श्री राधारानी की इस पावन आरती के संपूर्ण बोल, गूढ़ भावार्थ, पूजा विधि, और इसके आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से वर्णन कर रहे हैं।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
कीजै राधिका सुमेरु की आरती, ललिता विशाखा सखियन प्रीति प्रीति॥
वृषभानु दुलारी वृषभानु की प्यारी, त्रिभुवन की महारानी अति सुखकारी॥
चरण कमल जिनके जग सिर मढ़िये, कोटि रूप अनंग लजावत मढ़िये॥
नंद नंदन प्राण वल्लभ सुखदाई, मुरली मनोहर की मन भाई॥
कीजै राधिका सुमेरु की आरती...
पीताम्बर पट दामिनी जैसी, छवि देखत लज्जित शशि जैसी॥
अंग अंग आभूषण मणियन सोहै, देखत रूप त्रैलोक्य मन मोहै॥
बरसाने की महारानी कहावे, भक्तन के मन की पीर मिटावे॥
कीजै राधिका सुमेरु की आरती...
जो जन राधिका नाम सुनावै, सो सीधे बैकुंठ सिधावै॥
राधा-राधा जो नर नित गावै, सो सहजहिं श्रीहरि दर्शन पावै॥
दास कृपा कर दीजै महारानी, 'कृपालु' यश गावै तुम्हारी बानी॥
कीजै राधिका सुमेरु की आरती, ललिता विशाखा सखियन प्रीति प्रीति॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
श्री राधारानी की यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उनके परम दिव्य स्वरूप, उनके स्वभाव और उनके श्री चरणों में संपूर्ण समर्पण का एक जीवंत दस्तावेज है। आइए इस पावन आरती के प्रत्येक शब्द के भावार्थ को समझें:
कीजै राधिका सुमेरु की आरती... - इस प्रथम पंक्ति का आशय यह है कि हमें सुमेरु पर्वत की भांति अटल, महान और सर्वोपरि भगवती राधारानी की आरती उतारनी चाहिए। ललिता और विशाखा जैसी परम प्रिय सखियां जिनके प्रेम में सदैव मग्न रहती हैं, उन राधारानी की वंदना सर्वोपरि है।
वृषभानु दुलारी वृषभानु की प्यारी... - राजा वृषभानु की लाड़ली पुत्री और उनकी अत्यंत प्रिय, तीनों लोकों की महारानी श्री राधा रानी भक्तों को अपार सुख प्रदान करने वाली हैं। उनके श्री चरणों में साष्टांग प्रणाम करने से जीवन के सारे कष्ट स्वतः ही मिट जाते हैं।
चरण कमल जिनके जग सिर मढ़िये... - जिनके चरण कमलों की धूल को देवता और ऋषि-मुनि अपने सिर पर मुकुट की भांति धारण करते हैं, उनका वह अलौकिक सौंदर्य और कोटि-कोटि कामदेवों को लज्जित करने वाला रूप अत्यंत मनोहारी है।
नंद नंदन प्राण वल्लभ सुखदाई... - जो भगवान श्रीकृष्ण (नंदनंदन) की प्राण वल्लभ हैं, उनकी प्रियतमा हैं और मुरली मनोहर की मन को भाने वाली हैं, ऐसी राधारानी की आरती करना परम सौभाग्य का विषय है।
पीताम्बर पट दामिनी जैसी... - उनका पीतांबर वस्त्र बिजली के समान चमक रहा है, और उनका मुखमंडल देखकर चंद्रमा भी लज्जित हो जाता है। उनके अंग-अंग पर रत्नजड़ित आभूषण ऐसे शोभायमान होते हैं कि त्रैलोक्य का मन मोह लेते हैं।
जो जन राधिका नाम सुनावै... - जो भी मनुष्य भगवती राधारानी का पवित्र नाम स्मरण करता है या दूसरों को सुनाता है, वह सीधे परम धाम बैकुंठ को प्राप्त होता है। 'राधा-राधा' नाम का निरंतर जाप करने वाले को भगवान श्रीकृष्ण के सहज ही दर्शन प्राप्त हो जाते हैं।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन संस्कृति में भगवान श्रीकृष्ण की आराधना राधा नाम के बिना अधूरी मानी जाती है। कहा जाता है कि 'कृष्ण' नाम से भी अधिक शक्तिशाली और कृपालु 'राधा' नाम है। श्री राधा अष्टमी के दिन राधारानी की आरती करने से साधक को ब्रह्महत्या जैसे महापाप से भी मुक्ति मिल जाती है। पद्मपुराण और स्कंदपुराण में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि जो व्यक्ति बरसाने वाली श्री राधारानी की नित्य वंदना और आरती करता है, उसके घर में कभी भी अन्न-धन की कमी नहीं होती।
राधारानी योगमाया की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे साक्षात महालक्ष्मी का ही स्वरूप हैं। जब भक्त उनकी आरती उतारता है, तो दीपमाला के प्रकाश से उसके भीतर का अज्ञान रूपी अंधकार दूर हो जाता है। राधा रानी की कृपा के बिना कोई भी साधक वृंदावन धाम में प्रवेश नहीं पा सकता और न ही बांकेबिहारी की सच्ची भक्ति प्राप्त कर सकता है। इसलिए, राधा अष्टमी के दिन विशेष रूप से इस आरती का अनुष्ठान करना अत्यंत फलदायी होता है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
- ब्रह्म मुहूर्त एवं स्नान: राधा अष्टमी के दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ, पीले या गुलाबी रंग के वस्त्र धारण करें।
- वेदी या चौकी की स्थापना: एक पवित्र चौकी पर लाल या पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं। उस पर श्री राधा-कृष्ण की संयुक्त प्रतिमा या श्री राधारानी के विग्रह को स्थापित करें।
- पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन: सबसे पहले राधारानी को गंगाजल से स्नान कराएं। तत्पश्चात कुमकुम, हल्दी, अक्षत, रोली, इत्र, और सोलह श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें।
- पुष्प और नैवेद्य अर्पण: राधारानी को लाल और पीले रंग के सुगंधित फूल (विशेषकर कमल या गेंदे के फूल) अर्पित करें। भोग में मक्खन-मिश्री, पेड़ा, और फल का भोग लगाएं।
- आरती गान: घी का दीपक और कपूर जलाकर दाहिने हाथ से तीन बार घड़ी की सुई की दिशा में घुमाते हुए सस्वर 'कीजै राधिका सुमेरु की आरती' का गान करें।
- परिक्रमा और दंडवत: आरती के पश्चात भगवान की तीन बार परिक्रमा करें और क्षमा प्रार्थना के साथ साष्टांग दंडवत करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
एक दिव्य और सफल आरती के संपादन के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना अनिवार्य है:
- पूजा की थाल: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: शुद्ध गाय के घी का दीपक (मिट्टी का या पीतल का)।
- कपूर: शुद्ध भीमसेनी कपूर जो आरती में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
- घंटी और शंख: आरती के समय नाद करने के लिए पीतल की घंटी और शंख, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखते हैं।
- पुष्प और रोली: थाली में अक्षत, पुष्प और कुमकुम।
- धूपबत्ती या अगरबत्ती: सुगंधित प्राकृतिक धूप।
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत की दृष्टि से श्री राधारानी की यह आरती 'राग कल्याण' या 'राग यमन' में गाई जाती है, जो भक्ति रस और माधुर्य का प्रतीक है। इसकी ताल 'दादरा' (6 मात्रा) या 'केरवा' (8 मात्रा) होती है, जिस पर करताल और मृदंग की थाप के साथ भक्त झूम उठते हैं। इस आरती को गाने का सर्वोत्तम समय संध्याकाल (प्रदोष काल) या राधा अष्टमी के दिन मध्याह्न (दोपहर 12 बजे) का होता है, क्योंकि इसी समय राधारानी का प्राकट्य हुआ था।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमपूर्वक श्री राधारानी की इस आरती का पाठ करने से निम्नलिखित आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- पारिवारिक कलह समाप्त होती है और घर में सुख-शांति एवं प्रेम का वास होता है।
- मन की चंचलता शांत होती है और भगवान के चरणों में गाढ़ प्रेम उत्पन्न होता है।
- अकाल मृत्यु और भय का नाश होता है।
- साधक को अंत समय में ब्रजधाम मेंिवास अथवा श्री राधा-कृष्ण के चरणों में स्थान प्राप्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: राधा अष्टमी के दिन आरती का क्या विशेष समय है?
उत्तर: राधा अष्टमी के दिन मध्याह्न काल (दोपहर 12 बजे) राधारानी के प्राकट्य का समय माना जाता है। इस समय विशेष आरती करना अत्यंत फलदायी होता है, हालांकि संध्याकाल में भी आरती की जाती है।
प्रश्न 2: क्या इस आरती को केवल राधा अष्टमी पर ही गा सकते हैं?
उत्तर: नहीं, यद्यपि यह राधा अष्टमी विशेष आरती है, तथापि भक्त इसे प्रतिदिन अपनी दैनिक पूजा में अथवा प्रत्येक अष्टमी तिथि को गा सकते हैं।
प्रश्न 3: राधारानी की आरती में किस रंग के दीप और वस्त्र का प्रयोग करना चाहिए?
उत्तर: राधारानी को पीला और गुलाबी रंग अत्यंत प्रिय है। अतः पीले वस्त्र पहनकर और गाय के घी का दीपक जलाकर आरती करना श्रेष्ठ माना गया है।
प्रश्न 4: क्या घर पर सामान्य महिला या पुरुष राधारानी की आरती कर सकते हैं?
उत्तर: बिल्कुल! राधारानी अत्यंत दयालु और करुणा की सागर हैं। कोई भी श्रद्धावान भक्त अपने घर के मंदिर में प्रेमपूर्वक उनकी आरती कर सकता है।