॥ श्री नवग्रह देवता की पावन आरती - ॐ जय नवग्रह देवा, स्वामी जय नवग्रह देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन धर्म और ज्योतिषीय परंपरा में श्री नवग्रह देवता (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु) को ब्रह्मांड के नियामक, कर्म फलदाता और संपूर्ण चराचर जगत के संचालक के रूप में पूजा जाता है। जब मनुष्य अपने संचित कर्मों के अनुसार विभिन्न सुख-दुखों को भोगता है, तब इन नौ ग्रहों की ऊर्जा और कृपा हमारे जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। इन ग्रहों को शांत करने, उनका आशीर्वाद प्राप्त करने और जीवन में व्याप्त समस्त बाधाओं, दोषों (जैसे कालसर्प दोष, पितृ दोष, साढ़ेसाती, ढैया) का निवारण करने के लिए 'श्री नवग्रह देवता की पावन आरती' का गायन और पूजन अत्यंत चमत्कारी माना गया है। भक्तिलोक के इस विस्तृत गाइड में हम नवग्रह आरती के संपूर्ण बोल, गूढ़ भावार्थ, धार्मिक महत्व, पूजा की सही विधि और उससे मिलने वाले आध्यात्मिक लाभों का सविस्तार वर्णन कर रहे हैं।'
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय नवग्रह देवा, स्वामी जय नवग्रह देवा।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, तुम ही जगत सेवा।। ॐ जय नवग्रह देवा...॥
प्रथमहिं सूर्यदेवता, तुम हो प्रकाश दाता।
संसार के जीवन के, तुम ही हो त्राता।। ॐ जय नवग्रह देवा...॥
द्वितीया चंद्रदेवता, सुधांशु मन सोहे।
शीतल किरण तुम्हारी, सकल जगत मोहे।। ॐ जय नवग्रह देवा...॥
तृतीय मंगलदाता, भूमि पुत्र कहलावे।
रण कौशल बल दाता, संकट सब टरकावे।। ॐ जय नवग्रह देवा...॥
चतुर्थ बुध बलशाली, विद्या बुद्धिदाता।
व्यापार वाणिज्य के, तुम ही हो ज्ञाता।। ॐ जय नवग्रह देवा...॥
पंचम गुरु बृहस्पत, ज्ञानी सुखकारी।
देव पुरोहित स्वामी, महिमा अति भारी।। ॐ जय नवग्रह देवा...॥
षष्ठम शुक्र देवता, दैत्य गुरु ज्ञाना।
सुख वैभव के दाता, जग में मान्या माना।। ॐ जय नवग्रह देवा...॥
सप्तम शनि देवता, कर्म फल प्रदाता।
न्यायधीश कहलावे, दुःख के हरता त्राता।। ॐ जय नवग्रह देवा...॥
अष्टम राहु बलशाली, माया के स्वामी।
छाया ग्रह कहलावे, अंतर्यामी ज्ञानी।। ॐ जय नवग्रह देवा...॥
नवम केतु महाबली, मोक्ष के प्रदाता।
भक्तजनों के संकट, पल में दूर गाता।। ॐ जय नवग्रह देवा...॥
जो कोई नवग्रह की, आरती नित गावे।
सुख-संपत्ति अनुरागी, परम गति पावे।। ॐ जय नवग्रह देवा...॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
नवग्रह आरती का प्रत्येक शब्द ब्रह्मांडीय ऊर्जा और देवताओं के गुणों का बखान करता है। आइए इसके विस्तृत भावार्थ को समझें:
आरती आरंभ और त्रिदेवों की स्तुति: आरती की पहली पंक्ति में भक्त नौ ग्रहों की वंदना करते हुए कहते हैं कि हे नवग्रह देव! आपकी जय हो। जिस प्रकार ब्रह्मा (सृष्टि), विष्णु (पालन) और महेश्वर (संहार) संपूर्ण जगत की सेवा और संचालन करते हैं, उसी प्रकार आप नौ ग्रह भी ब्रह्मांड के सुचारू रूप से चलने का कार्य संभालते हैं।
प्रथम ग्रह - भगवान सूर्य: सूर्य देव को संसार का प्रकाश दाता और प्राण ऊर्जा का स्त्रोत कहा गया है। उनके बिना इस सृष्टि में जीवन की कल्पना भी असंभव है। वे समस्त जीवों की रक्षा करने वाले और आरोग्य प्रदान करने वाले देवता हैं।
द्वितीय ग्रह - भगवान चंद्र: चंद्रमा को 'सुधांशु' यानी अमृत की किरणें बिखेरने वाला कहा गया है। उनकी शीतल और मनमोहक किरणें मानव मन को शांति देती हैं और संपूर्ण जगत को मुग्ध करती हैं। ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है।
तृतीय ग्रह - भगवान मंगल: भूमिपुत्र मंगल पराक्रम, ऊर्जा, साहस और भूमि के कारक हैं। वे भक्तों के जीवन से युद्ध जैसे संकटों, ऋण और भूमि विवादों को टरकाते हैं तथा बल और उत्साह प्रदान करते हैं।
चतुर्थ ग्रह - भगवान बुध: बुध ग्रह बुद्धि, विवेक, वाणी, तर्क और व्यापार के देवता हैं। इनकी कृपा से मनुष्य ज्ञानवान बनता है और वाणिज्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में अपार सफलता प्राप्त करता है।
पंचम ग्रह - भगवान बृहस्पति (गुरु): देवताओं के गुरु बृहस्पति परम ज्ञानी, सुख और सौभाग्य प्रदान करने वाले हैं। इनकी कृपा से व्यक्ति को धर्म, अध्यात्म और जीवन के हर क्षेत्र में सर्वोच्च मार्गदर्शन मिलता है।
षष्ठम ग्रह - भगवान शुक्र: दैत्य गुरु शुक्र सौंदर्य, प्रेम, भौतिक सुख-वैभव, आकर्षण और कला के स्वामी हैं। संसार में सुख-सुविधाओं का भोग इनकी कृपा के बिना संभव नहीं है।
सप्तम ग्रह - भगवान शनि: न्याय के देवता शनि महाराज हमारे कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। वे निष्पक्ष न्यायाधीश हैं जो बुरे कर्मों का दंड देकर व्यक्ति को शुद्ध करते हैं और सच्चे भक्तों के दुखों का नाश करते हैं।
अष्टम एवं नवम ग्रह - राहु और केतु: राहु मायावी ऊर्जा और छाया ग्रह के रूप में जाने जाते हैं, जो जीवन में अचानक बदलाव लाते हैं। वहीं केतु महाबली मोक्ष के प्रदाता और आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत करने वाले हैं। ये दोनों मिलकर भक्त के समस्त संकटों को दूर करते हैं।
फलश्रुति: अंत में आरती गाने का फल बताया गया है कि जो भी मनुष्य नियमित रूप से नवग्रहों की इस पावन आरती का गान करता है, उसके जीवन में सुख-संपत्ति का वास होता है और अंत में वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन शास्त्रों में नवग्रहों की पूजा का विधान वेदों और पुराणों जितना ही प्राचीन है। मार्कण्डेय पुराण, बृहत पाराशर होरा शास्त्र और विभिन्न ज्योतिषीय ग्रंथों में नवग्रहों को प्रत्यक्ष देवताओं के रूप में स्वीकार किया गया है।
- कर्म फल का नियंत्रण: नवग्रह भगवान सूर्य (आत्मा), चंद्रमा (मन), मंगल (ऊर्जा), बुध (बुद्धि), गुरु (ज्ञान), शुक्र (सुख), शनि (कर्म), राहु (भ्रम) और केतु (मोक्ष) के माध्यम से मानव जीवन के हर पहलू को नियंत्रित करते हैं।
- ग्रह शांति और दोष निवारण: जिन जातकों की कुंडली में ग्रहों की महादशा, अंतर्दशा, नीचस्थ ग्रह या पापी ग्रहों की दृष्टि होती है, उनके लिए नवग्रह आरती रामबाण औषधि का कार्य करती है।
- सकारात्मक ऊर्जा का संचार: नियमित रूप से नवग्रह आरती करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और दिव्य सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
नवग्रहों की पूजा और आरती करने के लिए कुछेक विशेष नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक होता है ताकि पूर्ण फल की प्राप्ति हो सके:
- ब्रह्म मुहूर्त स्नान: प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके स्वच्छ, पीले या लाल रंग के वस्त्र धारण करें।
- वेदी या चित्र स्थापना: ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर नवग्रह यंत्र या नवग्रहों के चित्र/सुपारी पर मौली बांधकर उनकी स्थापना करें।
- षोडशोपचार पूजन: नवग्रहों को रो अक्षत, गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य (विशेषकर गुड़-चना, तिल, और विभिन्न अनाजों का भोग) अर्पित करें।
- आरती गान: घी का दीपक और कपूर प्रज्वलित करके पूर्ण तन्मयता के साथ 'ॐ जय नवग्रह देवा' आरती का सस्वर गान करें।
- प्रदक्षिणा और क्षमा प्रार्थना: आरती के पश्चात स्थान पर ही तीन बार परिक्रमा करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
एक आदर्श और फलदायी आरती के लिए निम्नलिखित पूजन सामग्री थाल में अवश्य होनी चाहिए:
| सामग्री का नाम | विशेषता एवं उपयोग |
|---|---|
| पूजा की थाली | तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली। |
| घी का दीपक | शुद्ध गाय के घी का प्रज्वलित दीपक। |
| कपूर | शुद्ध भीमसेनी कपूर आरती की भव्यता और सुगंध के लिए। |
| घंटी और शंख | नकारात्मक ऊर्जा भगाने और देवताओं के आह्वान हेतु। |
| पुष्प और अक्षत | आरती के समय ग्रहों पर अर्पित करने के लिए ताजे फूल। |
| नैवेद्य (भोग) | गुड़, तिल के लड्डू, पंचामृत या ऋतुफल। |
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत की दृष्टि से नवग्रह आरती का गायन राग कल्याण या राग यमन में करना अत्यंत प्रभावी माना गया है। यह राग मन को शांत करता है और एकाग्रता बढ़ाता है। आरती के लिए सर्वोत्तम समय प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय के समय (जब सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है) अथवा शनिवार और मंगलवार की संध्या बेला में है। विशेषकर प्रत्येक रविवार, सोमवार या शुक्ल पक्ष के पहले वार को नवग्रह स्तोत्र और इस आरती का पाठ करने से विशेष फल मिलता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
जो साधक नियमित रूप से श्री नवग्रह देवता की इस पावन आरती को अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं, उन्हें निम्नलिखित अद्भुत आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक शांति: चंद्र और बुध के शांत होने से मन की चंचलता समाप्त होती है और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।
- आरोग्य लाभ: सूर्य और मंगल की कृपा से शारीरिक बल, रोग प्रतिरोधक क्षमता और ओज में वृद्धि होती है।
- करियर और व्यापार में उन्नति: गुरु, शुक्र और बुध की कृपा से नौकरी, व्यवसाय, शिक्षा और कला के क्षेत्र में अप्रत्याशित सफलता मिलती है।
- भय मुक्ति: शनि, राहु और केतु के कुप्रभाव समाप्त होते हैं, जिससे अकाल मृत्यु, दुर्घटना और शत्रुओं का भय दूर होता है।