॥ श्री नृसिंह भगवान की आरती - ॐ जय नरसिंह हरे: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★भगवान नृसिंह, भगवान विष्णु के चौथे अवतार हैं, जो अपने भक्तों की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए जाने जाते हैं। उनकी आरती करना न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है, बल्कि नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश कर जीवन में सुरक्षा का कवच प्रदान करता है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय नरसिंह हरे, प्रभु जय नरसिंह हरे।
स्तम्भ फाड़ प्रभु प्रकटे, जन-मन-भय-हारी॥
ॐ जय नरसिंह हरे...
कश्यप-सुत-प्रभु-नाशक, हिरण्यकश्यप-मारी।
भक्त प्रह्लाद की रक्षा, की प्रभु बलिहारी॥
ॐ जय नरसिंह हरे...
नख-विदारित-अरि-उर, रक्त-रंजित-काया।
अद्भुत रूप निहारत, सुर-मुनि-जन-माया॥
ॐ जय नरसिंह हरे...
त्रिभुवन-व्याप्त-तेजस्वी, प्रभु-अति-बलशाली।
भक्त-वत्सल-प्रभु-स्वामी, मंगल-करने-वाली॥
ॐ जय नरसिंह हरे...
आरती नरसिंह प्रभु की, जो कोई नर गावे।
तन-मन-धन-सुख-पावे, भव-सागर-तर जावे॥
ॐ जय नरसिंह हरे...
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
इस आरती की प्रत्येक पंक्ति भगवान नृसिंह के उस रौद्र और करुणामयी स्वरूप का वर्णन करती है, जो उन्होंने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए धारण किया था। 'स्तम्भ फाड़ प्रभु प्रकटे' का अर्थ है कि भगवान ने खंभे को चीरकर अपने भक्त की पुकार सुनी। 'हिरण्यकश्यप मारी' यह दर्शाता है कि अहंकार का अंत निश्चित है। 'नख-विदारित-अरि-उर' का अर्थ है कि भगवान ने अपने नाखूनों से असुर का सीना चीर दिया, जो उनकी शक्ति का प्रतीक है। यह आरती हमें सिखाती है कि ईश्वर सर्वव्यापी हैं और वे अपने भक्तों के लिए किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान नृसिंह का अवतार वैशाख मास की चतुर्दशी को हुआ था। वे भगवान विष्णु के 'नर' (मनुष्य) और 'सिंह' (शेर) के मिश्रित अवतार हैं। यह अवतार न केवल हिरण्यकश्यप के वध के लिए था, बल्कि यह संदेश देने के लिए भी था कि ईश्वर का कोई निश्चित स्थान नहीं है, वे कण-कण में व्याप्त हैं। नृसिंह आरती का पाठ करने से व्यक्ति को शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और जीवन के सभी भय समाप्त हो जाते हैं।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
आरती करने के लिए सबसे पहले भगवान नृसिंह की प्रतिमा या चित्र को स्वच्छ स्थान पर स्थापित करें। गंगाजल से शुद्धिकरण करें। धूप, दीप, नैवेद्य और पुष्प अर्पित करें। आरती करते समय मन में पूर्ण श्रद्धा रखें। आरती हमेशा दाहिने हाथ से घड़ी की दिशा में घुमाते हुए करनी चाहिए। आरती के अंत में 'कर्पूर गौरं करुणावतारं' मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
- शुद्ध घी का दीपक (पंचमुखी दीपक सर्वोत्तम है)
- कपूर की टिकिया
- धूप या अगरबत्ती
- ताजे पुष्प (विशेषकर लाल पुष्प)
- नैवेद्य (गुड़-चना या पंचामृत)
- घंटी और शंख
राग, ताल एवं गायन समय
नृसिंह आरती को राग कल्याण या यमन में गाना अत्यंत प्रभावी माना जाता है। इसकी लय गंभीर और उत्साहवर्धक होनी चाहिए। संध्या काल (सूर्यास्त के समय) आरती करना सबसे अधिक फलदायी होता है, क्योंकि भगवान नृसिंह का प्राकट्य काल भी संध्या का ही था।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नित्य नृसिंह आरती करने से घर में नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश नहीं होता। यह मानसिक तनाव को कम करती है और आत्मविश्वास में वृद्धि करती है। जो भक्त श्रद्धापूर्वक नृसिंह आरती गाते हैं, उन्हें अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और वे जीवन के हर क्षेत्र में विजय प्राप्त करते हैं।