॥ श्री मोहिनी अवतार भगवान की पावन आरती - ॐ जय मोहिनी देवा, स्वामी जय मोहिनी देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★भगवान विष्णु का मोहिनी अवतार भारतीय पौराणिक कथाओं में सबसे आकर्षक और रहस्यमयी स्वरूप माना जाता है। समुद्र मंथन के समय जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत के लिए संघर्ष हुआ, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर असुरों के मोह को भंग किया और देवताओं को अमृत पान कराया। यह आरती न केवल प्रभु के सौंदर्य का गुणगान है, बल्कि यह हमें माया के बंधन से मुक्त होने की प्रेरणा भी देती है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
ॐ जय मोहिनी देवा, स्वामी जय मोहिनी देवा।
अमृत कलश धारी, असुरन मद हरवा॥ ॐ जय मोहिनी देवा॥
सागर मंथन कीन्हा, सुर-असुरन मिलके।
विष निकला जब भारी, शिव ने लिया झिलके॥ ॐ जय मोहिनी देवा॥
अमृत जब प्रगटा, मची मची हाहाकार।
माया रूप धरे प्रभु, मोह लिया संसार॥ ॐ जय मोहिनी देवा॥
असुरन को भरमायो, सुरन को सुधा पिलाई।
धर्म की रक्षा कीन्हा, दुष्टन की मति मारी॥ ॐ जय मोहिनी देवा॥
रूप तुम्हारा सोहे, त्रिभुवन मन मोहे।
भक्तों के तुम स्वामी, संकट सब खोये॥ ॐ जय मोहिनी देवा॥
जो कोई गावे आरती, प्रेम सहित मन लाय।
मोहिनी प्रभु की कृपा से, भवसागर तर जाय॥ ॐ जय मोहिनी देवा॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
इस आरती की प्रथम पंक्ति 'ॐ जय मोहिनी देवा' प्रभु के उस दिव्य स्वरूप को नमन करती है जो मोहक है। 'अमृत कलश धारी' का अर्थ है कि प्रभु ने ही अमृत की रक्षा की। 'असुरन मद हरवा' का तात्पर्य है कि आपने असुरों के अहंकार को अपने सौंदर्य और बुद्धि से नष्ट कर दिया। आगे की पंक्तियों में समुद्र मंथन की घटना का वर्णन है, जहाँ भगवान ने विष को शिव द्वारा धारण करने के बाद अमृत के बंटवारे में मध्यस्थता की। 'माया रूप धरे प्रभु' का अर्थ है कि भगवान विष्णु ने मोहिनी का मायावी रूप धारण किया, जिसने समस्त संसार को मोहित कर लिया। अंतिम पंक्तियों में भक्त प्रार्थना करता है कि हे प्रभु, आपका यह रूप त्रिभुवन (तीनों लोकों) को मोहित करने वाला है। जो भी भक्त इस आरती को श्रद्धापूर्वक गाता है, वह संसार के मायाजाल से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
मोहिनी अवतार का महत्व केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 'विवेक' का प्रतीक है। यह अवतार सिखाता है कि जब बुद्धि और विवेक (विष्णु) माया (मोहिनी) के साथ मिलते हैं, तो अमृत (ज्ञान/मोक्ष) की प्राप्ति होती है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, मोहिनी अवतार ने न केवल अमृत वितरण में सहायता की, बल्कि भगवान शिव के साथ मिलकर धर्म की स्थापना भी की।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
आरती करने के लिए सर्वप्रथम शुद्ध होकर आसन पर बैठें। भगवान मोहिनी स्वरूप की प्रतिमा या चित्र को गंगाजल से शुद्ध करें। धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। आरती के समय घंटी और शंख का नाद करना अत्यंत शुभ माना जाता है। आरती हमेशा खड़े होकर और पूरी श्रद्धा के साथ करनी चाहिए।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
- शुद्ध घी का दीपक (पंचमुखी हो तो उत्तम)
- कपूर की आरती
- धूप या अगरबत्ती
- ताजे पुष्प (विशेषकर कमल या पीले फूल)
- नैवेद्य (मिश्री, फल या पंचामृत)
- शंख और घंटी
राग, ताल एवं गायन समय
मोहिनी अवतार की आरती को 'राग कल्याण' या 'राग यमन' में गाना अत्यंत प्रभावी होता है। यह राग मन को शांति और भक्ति भाव से भर देता है। इसे संध्याकाल (सूर्यास्त के समय) में गाना सबसे उत्तम माना गया है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से मोहिनी अवतार की आरती करने से मन की चंचलता दूर होती है। यह व्यक्ति को मोह-माया के बंधनों से ऊपर उठकर सत्य को पहचानने की शक्ति प्रदान करती है। जो भक्त इसे गाते हैं, उनके जीवन में आने वाले संकट दूर होते हैं और उन्हें मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।