पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री भगवान विष्णु (मोहिनी अवतार) आरती
14 पाठ

श्री मोहिनी अवतार भगवान की पावन आरती - ॐ जय मोहिनी देवा, स्वामी जय मोहिनी देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री मोहिनी अवतार भगवान की पावन आरती - ॐ जय मोहिनी देवा, स्वामी जय मोहिनी देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

भगवान विष्णु का मोहिनी अवतार भारतीय पौराणिक कथाओं में सबसे आकर्षक और रहस्यमयी स्वरूप माना जाता है। समुद्र मंथन के समय जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत के लिए संघर्ष हुआ, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर असुरों के मोह को भंग किया और देवताओं को अमृत पान कराया। यह आरती न केवल प्रभु के सौंदर्य का गुणगान है, बल्कि यह हमें माया के बंधन से मुक्त होने की प्रेरणा भी देती है।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

ॐ जय मोहिनी देवा, स्वामी जय मोहिनी देवा।
अमृत कलश धारी, असुरन मद हरवा॥ ॐ जय मोहिनी देवा॥

सागर मंथन कीन्हा, सुर-असुरन मिलके।
विष निकला जब भारी, शिव ने लिया झिलके॥ ॐ जय मोहिनी देवा॥

अमृत जब प्रगटा, मची मची हाहाकार।
माया रूप धरे प्रभु, मोह लिया संसार॥ ॐ जय मोहिनी देवा॥

असुरन को भरमायो, सुरन को सुधा पिलाई।
धर्म की रक्षा कीन्हा, दुष्टन की मति मारी॥ ॐ जय मोहिनी देवा॥

रूप तुम्हारा सोहे, त्रिभुवन मन मोहे।
भक्तों के तुम स्वामी, संकट सब खोये॥ ॐ जय मोहिनी देवा॥

जो कोई गावे आरती, प्रेम सहित मन लाय।
मोहिनी प्रभु की कृपा से, भवसागर तर जाय॥ ॐ जय मोहिनी देवा॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

इस आरती की प्रथम पंक्ति 'ॐ जय मोहिनी देवा' प्रभु के उस दिव्य स्वरूप को नमन करती है जो मोहक है। 'अमृत कलश धारी' का अर्थ है कि प्रभु ने ही अमृत की रक्षा की। 'असुरन मद हरवा' का तात्पर्य है कि आपने असुरों के अहंकार को अपने सौंदर्य और बुद्धि से नष्ट कर दिया। आगे की पंक्तियों में समुद्र मंथन की घटना का वर्णन है, जहाँ भगवान ने विष को शिव द्वारा धारण करने के बाद अमृत के बंटवारे में मध्यस्थता की। 'माया रूप धरे प्रभु' का अर्थ है कि भगवान विष्णु ने मोहिनी का मायावी रूप धारण किया, जिसने समस्त संसार को मोहित कर लिया। अंतिम पंक्तियों में भक्त प्रार्थना करता है कि हे प्रभु, आपका यह रूप त्रिभुवन (तीनों लोकों) को मोहित करने वाला है। जो भी भक्त इस आरती को श्रद्धापूर्वक गाता है, वह संसार के मायाजाल से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

मोहिनी अवतार का महत्व केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 'विवेक' का प्रतीक है। यह अवतार सिखाता है कि जब बुद्धि और विवेक (विष्णु) माया (मोहिनी) के साथ मिलते हैं, तो अमृत (ज्ञान/मोक्ष) की प्राप्ति होती है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, मोहिनी अवतार ने न केवल अमृत वितरण में सहायता की, बल्कि भगवान शिव के साथ मिलकर धर्म की स्थापना भी की।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

आरती करने के लिए सर्वप्रथम शुद्ध होकर आसन पर बैठें। भगवान मोहिनी स्वरूप की प्रतिमा या चित्र को गंगाजल से शुद्ध करें। धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। आरती के समय घंटी और शंख का नाद करना अत्यंत शुभ माना जाता है। आरती हमेशा खड़े होकर और पूरी श्रद्धा के साथ करनी चाहिए।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

  • शुद्ध घी का दीपक (पंचमुखी हो तो उत्तम)
  • कपूर की आरती
  • धूप या अगरबत्ती
  • ताजे पुष्प (विशेषकर कमल या पीले फूल)
  • नैवेद्य (मिश्री, फल या पंचामृत)
  • शंख और घंटी

राग, ताल एवं गायन समय

मोहिनी अवतार की आरती को 'राग कल्याण' या 'राग यमन' में गाना अत्यंत प्रभावी होता है। यह राग मन को शांति और भक्ति भाव से भर देता है। इसे संध्याकाल (सूर्यास्त के समय) में गाना सबसे उत्तम माना गया है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से मोहिनी अवतार की आरती करने से मन की चंचलता दूर होती है। यह व्यक्ति को मोह-माया के बंधनों से ऊपर उठकर सत्य को पहचानने की शक्ति प्रदान करती है। जो भक्त इसे गाते हैं, उनके जीवन में आने वाले संकट दूर होते हैं और उन्हें मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

१. श्री मोहिनी अवतार भगवान की पावन आरती - ॐ जय मोहिनी देवा, स्वामी जय मोहिनी देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान विष्णु (मोहिनी अवतार) के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री भगवान विष्णु (मोहिनी अवतार) जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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