॥ श्री महालक्ष्मी अष्टकम एवं महालक्ष्मी आरती - ॐ जय लक्ष्मी माता सम्पूर्ण बोल एवं भावार्थ ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन संस्कृति में धन, वैभव, यश, और ऐश्वर्य की अधिष्ठाता देवी माता महालक्ष्मी को जगत जननी शक्ति का स्वरूप माना गया है। भगवान विष्णु की अर्धांगिनी और क्षीरसागर से प्राविर्भूत होने वाली माँ लक्ष्मी भक्तों को न केवल भौतिक समृद्धि, बल्कि आध्यात्मिक शांति और आत्मबल भी प्रदान करती हैं। दीपावली के पावन पर्व, शुक्रवार के व्रतों और प्रतिदिन की संध्या वंदना में 'श्री महालक्ष्मी अष्टकम' और लोकप्रिय आरती 'ॐ जय लक्ष्मी माता' का गान करने से घर में माता लक्ष्मी का स्थायी वास होता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम माँ लक्ष्मी के पावन अष्टकम, संपूर्ण आरती के बोल, उनके गहरे दार्शनिक भावार्थ, शास्त्रसम्मत पूजा विधि और इसके चमत्कारी आध्यात्मिक लाभों का संपूर्ण विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
श्री महालक्ष्मी अष्टकम
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपिठे सुरपूजिते।
शंकुचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
नमस्ते गरुडारूढ् कोणासुरभयंकरि।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयंकरि।
सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी।
मंत्रमूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि।
योगज्ञे योगसंभूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे।
महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि।
परेशि जगताम् मातः महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
श्वेताम्बरधरे नानालंकारभूषिते।
जगत्स्थिते जगन्मातः महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
महालक्ष्मीष्टकं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिमान् नरः।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा॥
एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्।
द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः॥
त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाभयविनाशनम्।
महालक्ष्मीर्भवेत् नित्या प्रसंगान्नात्र संशयः॥
माता लक्ष्मी जी की आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता, मिया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निसदिन ध्यावत, हरि विष्णु विधाता॥
(ॐ जय लक्ष्मी माता...)
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता।
सूर्य चन्द्रावत ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
(ॐ जय लक्ष्मी माता...)
दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
(ॐ जय लक्ष्मी माता...)
तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव प्रकाशकि, भव की निधि ज्ञाता॥
(ॐ जय लक्ष्मी माता...)
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
(ॐ जय लक्ष्मी माता...)
तुम बिन यज्ञ न होवे, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
(ॐ जय लक्ष्मी माता...)
शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
(ॐ जय लक्ष्मी माता...)
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गावे।
उर आनन्द समावे, पाप उतर जावे॥
(ॐ जय लक्ष्मी माता...)
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
माता लक्ष्मी की आरती और उनके अष्टकम का केवल पाठ करना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु इसके गहन अर्थ को समझकर मन में उतारना ही सच्ची भक्ति है। यहाँ हम इसके भावार्थ को विस्तार से समझ रहे हैं:
श्री महालक्ष्मी अष्टकम का भावार्थ: इन्द्र देवता द्वारा रचित इस स्तोत्र में माँ महालक्ष्मी को ब्रह्मांड की आद्या शक्ति के रूप में वंदना की गई है। प्रथम श्लोक में कहा गया है कि हे महामाये! जो श्रीपीठ पर विराजमान हैं, समस्त देवताओं द्वारा पूजित हैं, जिनके हाथों में शंख, चक्र और गदा शोभायमान हैं, ऐसी महालक्ष्मि आपको बारंबार नमस्कार है। गरुड़ पर आसीन होने वाली, सभी पापों और दुष्टों का नाश करने वाली, भक्तों को रिद्धि-सिद्धि, मुक्ति और योग प्रदान करने वाली हे जगन्माता! आप स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूपों में ब्रह्मांड में व्याप्त हैं। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस अष्टकम का पाठ करता है, उसे सांसारिक दुखों से मुक्ति मिलती है और वह महालक्ष्मी की कृपा से अक्षय धन-धान्य तथा ऐश्वर्य को प्राप्त करता है।
महालक्ष्मी आरती का भावार्थ: 'ॐ जय लक्ष्मी माता' आरती के माध्यम से भक्त माता के संपूर्ण स्वरूप का गुणगान करते हैं। भक्त गाते हैं कि हे माता! ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी प्रतिदिन आपका ध्यान करते हैं। आप ही पार्वती (उमा), लक्ष्मी (रमा) और सरस्वती (ब्रह्माणी) के रूप में संपूर्ण जगत का संचालन करती हैं। आपके ही आशीर्वाद से व्यक्ति को सुख, संपत्ति, ऋद्धि और सिद्धि प्राप्त होती है। जिस घर में माता लक्ष्मी का वास होता है, वहाँ स्वतः ही सद्गुणों का प्रवेश हो जाता है और जीवन के सभी संकट टल जाते हैं। आपके बिना संसार में किसी भी यज्ञ, अनुष्ठान या भोजन-वस्त्र का आनंद पूर्ण नहीं होता क्योंकि समस्त वैभव और रत्न आपके ही प्रसाद से प्राप्त होते हैं। इस आरती का गान करने वाले के हृदय में आनंद समा जाता है और उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन परंपरा में महालक्ष्मी जी की आरती और अष्टकम का बहुत ऊंचा स्थान है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब समुद्र मंथन हुआ था, तब चौदह रत्नों में से चौदहवें रत्न के रूप में माता लक्ष्मी क्षीरसागर से प्रकट हुईं। देवराज इंद्र ने जब ऐश्वर्य खो दिया था, तब उन्होंने इसी महालक्ष्मी अष्टकम का पाठ करके पुनः तीनों लोकों का आधिपत्य प्राप्त किया था। धार्मिक मान्यता है कि शुक्रवार के दिन जो जातक माता लक्ष्मी की इस आरती और अष्टकम का सस्वर पाठ करता है, उसके घर में कभी भी अन्न और धन की कमी नहीं होती। यह स्तोत्र नकारात्मक ऊर्जा, दरिद्रता, आलस्य और मानसिक संताप को दूर करके सकारात्मकता और प्रकाश का संचार करता है। दीपावली की रात्रि में माता लक्ष्मी के पूजन के उपरांत इस आरती का विशेष रूप से गायन किया जाता है ताकि माता वर्षभर के लिए उस घर में स्थिर रूप से निवास करें।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
माता लक्ष्मी की आरती विधि-विधान से करने पर ही पूर्ण फल की प्राप्ति होती है:
- स्थान की शुद्धि: सबसे पहले पूजा स्थल या ईशान कोण को भली-भांति स्वच्छ करें। माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र को लाल या पीले रंग के आसन पर स्थापित करें।
- संकल्प एवं ध्यान: स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें (विशेषकर लाल या गुलाबी वस्त्र शुभ माने जाते हैं)। मन में माता का स्मरण कर दीप प्रज्वलित करें।
- पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन: माता को रोली, अक्षत (अखंडित चावल), लाल फूल, कमल का पुष्प (यदि उपलब्ध हो), सिंदूर, इत्र, और नैवेद्य (मखाने, खीर या मिठाई) अर्पित करें।
- धूप-दीप अर्पण: घी का दीपक जलाकर माता की प्रतिमा के समक्ष रखें।
- आरती गान: हाथ में कपूर या घी का दीपक लेकर पूरी श्रद्धा, ताल और स्वर के साथ 'ॐ जय लक्ष्मी माता' आरती गाएं। आरती के उपरांत शंख और घंटी जरूर बजाएं।
- परिक्रम एवं क्षमा प्रार्थना: अपनी ही जगह पर तीन बार परिक्रमा करें और अंत में आरती की थाली को सभी भक्तों में घुमाकर आशीर्वाद लें। माता से अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
माता महालक्ष्मी की आरती और पूजन को पूर्णता प्रदान करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियाँ अत्यंत आवश्यक हैं:
- पूजा की थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीप प्रज्वलन: शुद्ध गाय का घी और लंबी रुई की बत्ती (अथवा दीपक में तिल का तेल भी प्रयोग कर सकते हैं)।
- कपूर: आरती की दिव्यता बढ़ाने और वातावरण को शुद्ध करने के लिए शुद्ध कपूर।
- घंटी और शंख: नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाने और सकारात्मक स्पंदन उत्पन्न करने के लिए पंचजन्य शंख और पीतल की घंटी।
- पुष्प और अक्षत: लाल गुलाब या कमल के ताजे फूल तथा रोली से रंगे हुए साबुत चावल।
- नैवेद्य (भोग): मखाना पाग, खीर, सफेद या पीली मिठाई, और फल।
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत की दृष्टि से महालक्ष्मी अष्टकम और आरती का गायन अत्यधिक मधुर और चित्ताकर्षक होता है:
- राग: इसे 'राग कल्याण' या 'राग यमन' तथा 'राग भैरवी' की कोमल धुनों में गाया जा सकता है, जो मन को शांत और एकाग्र करते हैं।
- ताल: कहवा (8 मात्रा) या दादरा (6 मात्रा) ताल में इसका लयबद्ध गायन बहुत सुंदर लगता है।
- गायना समय: माता लक्ष्मी की आरती का उत्तम समय प्रातःकाल ब्रह्म बेला (सूर्योदय से पूर्व) और प्रदोष काल (संध्या समय) माना जाता है। शुक्रवार का दिन इसके लिए विशेष रूप से सर्वश्रेष्ठ है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से महालक्ष्मी अष्टकम और आरती करने से जीवन में निम्नलिखित सकारात्मक परिवर्तन आते हैं:
- आर्थिक स्थिरता: घर से कर्ज, दरिद्रता और आर्थिक तंगी का हमेशा के लिए नाश होता है। व्यापार और नौकरी में उन्नति के मार्ग खुलते हैं।
- मानसिक शांति: अत्यधिक तनाव, अवसाद और अनजाने भय से मुक्ति मिलती है। मन में सकारात्मक ऊर्जा और संतोष का वास होता है।
- पारिवारिक सुख-शांति: घर-परिवार में आपसी प्रेम, सौहार्द और मधुर संबंध स्थापित होते हैं। गृह क्लेश समाप्त होते हैं।
- मोक्ष और पुण्य प्राप्ति: भक्त को भौतिक सुखों के साथ-साथ अंत में भगवत प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त होता है।