॥ श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की पावन आरती - ॐ जय लक्ष्मीनारायण देवा, स्वामी जय लक्ष्मीनारायण देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन धर्म में श्री लक्ष्मीनारायण की उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान विष्णु, जो इस सृष्टि के पालनहार हैं और माता लक्ष्मी, जो धन, ऐश्वर्य, वैभव तथा समृद्धि की देवी हैं, जब एक साथ विराजित होते हैं तो इन्हें 'लक्ष्मीनारायण' कहा जाता है। इनकी संयुक्त पूजा और आरती करने से साधक के जीवन में कभी भी भौतिक सुख-सुविधाओं और आध्यात्मिक शांति की कमी नहीं होती। Bhaktilok.in के इस पावन आलेख में हम श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की प्रसिद्ध आरती 'ॐ जय लक्ष्मीनारायण देवा' के संपूर्ण बोल, विस्तृत भावार्थ, पूजा की सही विधि, आवश्यक सामग्री और इसके धार्मिक महत्व का सविस्तार वर्णन कर रहे हैं। इस पवित्र आरती के माध्यम से भक्त जन अपने आराध्य की वंदना कर उनके चरणों में अपनी पूर्ण शरणागति अर्पित करते हैं।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
यहाँ श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की पारंपरिक और लोकप्रिय आरती के संपूर्ण बोल दिए गए हैं, जिन्हें प्रतिदिन संध्या वंदन या विशेष पर्वों पर श्रद्धापूर्वक गाया जाता है:
ॐ जय लक्ष्मीनारायण, स्वामी जय लक्ष्मीनारायण देवा।
तुम जियो कोटि बरिसा, प्रभु जियो कोटि बरिसा, सुख भक्ता मेवा॥ ॐ जय...॥
अधम उधारन स्वामी, पतितन टारक भारी।
शेषशयन विहरित, बैकुंठ बिहारी॥ ॐ जय...॥
बालक तुम्हरे हम हैं, तुम पिता हमारे।
प्राण बचाइए प्रभु, संकट हर सारे॥ ॐ जय...॥
वेदों की महिमा गावत, शेष नाग गावै।
नारद शारद मिलके, गुण प्रभु के गावै॥ ॐ जय...॥
पीताम्बर तन साजे, मुकुट सिर राजै।
देखत रूप तुम्हारा, मन मुदित राजै॥ ॐ जय...॥
लक्ष्मी संग विराजत, केसर तल लावै।
दासिन दास तुम्हारे, दरसन को आवै॥ ॐ जय...॥
जो जन ध्यावत तुमको, मनवांछित फल पावै।
दुख-संताप न आवै, हर पल सुख छावै॥ ॐ जय...॥
जो कोई आरती गावे, प्रेम सहित गावे।
कहत कबीर जोगी, बैकुंठ धाम पावे॥ ॐ जय...॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भक्ति को अधिक प्रगाढ़ और सार्थक बनाने के लिए आरती के शब्दों का अर्थ समझना अत्यंत आवश्यक है। यहाँ श्री लक्ष्मीनारायण आरती का पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ प्रस्तुत है:
- प्रथम पद: 'ॐ जय लक्ष्मीनारायण, स्वामी जय लक्ष्मीनारायण देवा...'- हे प्रभु! आपकी जय हो। आप करोड़ों वर्षों तक जीवित रहें और अपने भक्तों को निरंतर सुख-समृद्धि का प्रसाद प्रदान करते रहें।
- द्वितीय पद: 'अधम उधारन स्वामी, पतितन टारक भारी...'- हे स्वामी! आप अधम (पापियों) का उद्धार करने वाले हैं और पतितों को इस भवसागर से पार लगाने वाले महान तारणहार हैं। आप शेषनाग की शैया पर विश्राम करने वाले और परम धाम बैकुंठ में विहार करने वाले हैं।
- तृतीय पद: 'बालक तुम्हरे हम हैं, तुम पिता हमारे...'- हम सभी आपके बालक (संतान) हैं और आप हमारे परम पिता हैं। हे प्रभु! हमारे प्राणों की रक्षा कीजिए और हमारे जीवन के सभी संकटों का नाश कीजिए।
- चतुर्थ पद: 'वेदों की महिमा गावत, शेष नाग गावै...'- वेदों के साथ-साथ शेषनाग भी आपकी महिमा का गान करते हैं। देवर्षि नारद और माता सरस्वती मिलकर आपके गुणों का बखान करते हैं।
- पंचम पद: 'पीताम्बर तन साजे, मुकुट सिर राजै...'- आपके शरीर पर सुंदर पीले वस्त्र (पीताम्बर) सुशोभित हैं और सिर पर मुकुट जगमगा रहा है। आपके इस अलौकिक और दिव्य रूप को देखकर सभी के मन में प्रसन्नता और आनंद छा जाता है।
- षष्ठ पद: 'लक्ष्मी संग विराजत, केसर तल लावै...'- आपके साथ माता लक्ष्मी विराजमान हैं। आपके श्रीचरणों में केसर का तिलक लगाया जाता है। आपके अनेकों दास और दासी आपके दर्शनों के लिए सदा तत्पर रहते हैं।
- सप्तम पद: 'जो जन ध्यावत तुमको, मनवांछित फल पावै...'- जो भी मनुष्य सच्चे मन से आपका ध्यान करता है, वह अपनी इच्छा के अनुसार सभी फल प्राप्त करता है। उसके जीवन में कोई दुख-संताप नहीं आता और सर्वत्र सुख का वास होता है।
- अष्टम पद: 'जो कोई आरती गावे, प्रेम सहित गावे...'- जो भी भक्त इस आरती को प्रेम, श्रद्धा और भाव के साथ गाता है, वह अंत में बैकुंठ धाम को प्राप्त करता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन संस्कृति में लक्ष्मीनारायण की उपासना को सर्वांगीण सुख और कल्याणकारी माना गया है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का मिलन प्रकृति और पुरुष के शाश्वत संतुलन का प्रतीक है। जहाँ भगवान विष्णु धर्म, कर्म और पालन के प्रतीक हैं, वहीं माता लक्ष्मी चंचलता और समृद्धि का प्रतिनिधित्व करती हैं। जब दोनों की संयुक्त आरती की जाती है, तो घर में दरिद्रता, कलह और अशांति का नाश होता है। पुराणों के अनुसार, जो व्यक्ति नियमित रूप से प्रदोष काल में या एकादशी के दिन लक्ष्मीनारायण की आरती करता है, उसके पूर्वजन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह आरती पारिवारिक कलह को दूर करने, दांपत्य जीवन में मधुरता लाने और आर्थिक तंगी से मुक्ति पाने के लिए अचूक उपाय मानी जाती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
किसी भी देवी-देवता की आरती का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसे शास्त्रीय नियमों और पूरी विधि-विधान के साथ किया जाए। लक्ष्मीनारायण की आरती के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करना चाहिए:
- प्रातःकाल या संध्या वंदन: आरती हमेशा स्नान करने के बाद शुद्ध वस्त्र धारण करके करनी चाहिए। संध्या काल (प्रदोष काल) लक्ष्मीनारायण की पूजा के लिए सर्वोत्तम समय माना जाता है।
- स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल या मंदिर को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान लक्ष्मीनारायण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- पंचोपचार या षोडशोपचार पूजा: सबसे पहले भगवान को जल, रो अक्षत, कुमकुम, पीला चंदन, पीले पुष्प, और नैवेद्य (फल या मिठाई) अर्पित करें।
- दीपक प्रज्वलन: घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं और धूपबत्ती दिखाएं।
- आरती गान: हाथ में कपूर या दीप प्रज्वलित थाल लेकर पूरी श्रद्धा, लय और ताल के साथ 'ॐ जय लक्ष्मीनारायण देवा' का गान करें।
- परिक्रमा और प्रदक्षिणा: आरती पूर्ण होने के बाद भगवान की तीन बार परिक्रमा करें और अंत में स्वयं पर तथा उपस्थित भक्तों पर आरती की ज्योति लें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
आरती करते समय सभी आवश्यक सामग्रियों का थाल में होना पूजा की पूर्णता को सुनिश्चित करता है। नीचे दी गई तालिका के माध्यम से आप आवश्यक सामग्री की सूची देख सकते हैं:
| क्रम संख्या | सामग्री का नाम | प्रयोजन / महत्व |
|---|---|---|
| १ | पूजा की थाली | पीतल, तांबे या चांदी की स्वच्छ थाली |
| २ | शुद्ध घी का दीपक | अंधकार और नकारात्मकता को दूर करने के लिए |
| ३ | कपूर | आरती को प्रज्वलित करने और वातावरण शुद्ध करने हेतु |
| ४ | घंटी और शंख | नकारात्मक ऊर्जा भगाने और सकारात्मक स्पंदन के लिए |
| ५ | पीले पुष्प एवं माला | भगवान को अर्पित करने के लिए |
| ६ | कुमकुम, हल्दी और चंदन | तिलक लगाने के लिए |
| ७ | पंचामृत या मिष्ठान | भगवान को भोग लगाने के लिए |
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत और भक्ति का गहरा संबंध है। 'ॐ जय लक्ष्मीनारायण देवा' आरती को सामान्यतः **राग कल्याण** या **राग यमन** की धुनों में गाया जाता है, जो मन को शांति और दिव्यता प्रदान करती हैं। इसे कहरवा ताल (८ मात्रा) में आसानी से गाया जा सकता है। इस आरती को गाने का सबसे उत्तम समय संध्या बेला (सूर्यास्त के समय) अथवा एकादशी, पूर्णिमा और गुरुवार के दिन है। धीमी और सुरीली लय में गाई गई यह आरती मन में एकाग्रता और भक्ति का संचार करती है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की आरती का नियमित पाठ करने से जीवन में निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- आर्थिक समृद्धि: माता लक्ष्मी की कृपा से घर में धन-धान्य के भंडार भरे रहते हैं और कर्ज से मुक्ति मिलती है।
- पारिवारिक सुख-शांति: पति-पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों के बीच प्रेम एवं सामंजस्य बढ़ता है।
- मानसिक शांति: भगवान विष्णु के स्मरण से मन का भटकना बंद होता है और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।
- पाप नाश: जाने-अनजाने में हुए पापों का प्रायश्चित होता है और अंत में वैकुंठ धाम की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की आरती किस दिन करना सबसे उत्तम होता है?
श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की आरती यूं तो प्रतिदिन करनी चाहिए, परंतु विशेष रूप से गुरुवार (बृहस्पतिवार), एकादशी तिथि, और पूर्णिमा के दिन इस आरती का आयोजन अत्यंत फलदायी माना गया है।
क्या इस आरती को घर की महिलाएं भी कर सकती हैं?
हाँ, शत-प्रतिशत। धर्म में किसी भी प्रकार का कोई लिंगभेद नहीं है। घर की माताएं, बहनें और बेटियां पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ श्री लक्ष्मीनारायण की आरती कर सकती हैं।
आरती के दौरान घंटी और शंख क्यों बजाए जाते हैं?
घंटी और शंख की ध्वनि से उत्पन्न होने वाले कंपन (Vibrations) नकारात्मक ऊर्जा, बुरी दृष्टियों और कीट-पतंगों को दूर भगाते हैं तथा सकारात्मक एवं पवित्र ऊर्जा का संचार करते हैं।
आरती समाप्त होने के बाद क्या करना चाहिए?
आरती समाप्त होने के बाद भगवान को प्रणाम करें, क्षमा प्रार्थना करें, अपने दोनों हाथों से आरती की ज्योति को अपनी आंखों और सिर पर लगाएं, और उपस्थित सभी भक्तों में प्रसाद वितरित करें।