॥ श्री कुबेर भगवान की आरती - ॐ जय कुबेर देवा, स्वामी जय कुबेर देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन धर्म और पौराणिक परंपराओं में भगवान श्री कुबेर को देवताओं का कोषाध्यक्ष यानी धन का स्वामी माना गया है। यक्षराज कुबेर उत्तर दिशा के दिक्पाल और समस्त भौतिक संपदा, खजानों तथा निधियों के संरक्षक हैं। माता लक्ष्मी के साथ भगवान कुबेर की उपासना करने से साधक के जीवन में कभी भी धन-धान्य, अन्न, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि की कमी नहीं होती। श्री कुबेर भगवान की आरती 'ॐ जय कुबेर देवा, स्वामी जय कुबेर देवा' का गान और पाठ करने से साधक के घर में नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत और पावन लेख में हम श्री कुबेर भगवान की सम्पूर्ण आरती, उसका सरल हिंदी भावार्थ, पूजा विधि, आवश्यक सामग्री और इसके अनंत आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभों के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
ॐ जय कुबेर देवा, स्वामी जय कुबेर देवा। चरण शरण में आए, भक्तां सुख मेवा ॥ ॐ जय कुबेर देवा ॥ विशाल वक्ष स्थल पर, मणि मुक्ता माला। धवल वस्त्र धारी, सुंदर छबिराला ॥ ॐ जय कुबेर देवा ॥ अलका पुरी के राजा, यक्षराज प्यारे। शिव जी के प्रिय मित्र, संकट भंव टारे ॥ ॐ जय कुबेर देवा ॥ संख और पद्म निधि, तेरे द्वार खड़े। देव मुनि जन सेवत, चरणों में पड़े ॥ ॐ जय कुबेर देवा ॥ सोने का सिंहासन, मुकुट सिर साजे। हाथ गदा सोहे, त्रिशूल मन भाजे ॥ ॐ जय कुबेर देवा ॥ भोग लगे मिष्ठान्न का, मेवा और खीर। भक्त जनों की नैया, पार करो वीर ॥ ॐ जय कुबेर देवा ॥ धन धान्य भंडार भरो, संकट सब काटो। महादेव की कृपा से, सुख संपत्ति बांटो ॥ ॐ जय कुबेर देवा ॥ जो जन आरती गावे, नित प्रति मन लावे। धन वैभव सुख पावे, कलिकाल न आवे ॥ ॐ जय कुबेर देवा ॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान श्री कुबेर की यह आरती अत्यंत भावपूर्ण और वेदों-पुराणों के सार पर आधारित है। आइए इसके प्रत्येक चरण का विस्तृत और सरल हिंदी भावार्थ समझते हैं ताकि आरती गाते समय हमारा मन पूरी तरह से आराध्य के चरणों में लीन हो सके।
प्रथम चरण - 'ॐ जय कुबेर देवा, स्वामी जय कुबेर देवा। चरण शरण में आए, भक्तां सुख मेवा ॥' इसका अर्थ है कि हे यक्षराज भगवान कुबेर! आपकी जय हो। हम आपकी शरण में आए हैं, आप अपने शरणागत भक्तों को सभी प्रकार के भौतिक सुख, ऐश्वर्य और मोक्ष रूपी मेवा प्रदान करते हैं।
द्वितीय चरण - 'विशाल वक्ष स्थल पर, मणि मुक्ता माला। धवल वस्त्र धारी, सुंदर छबिराला ॥' भगवान कुबेर का स्वरूप अत्यंत दिव्य है। उनके विशाल वक्ष (छाती) पर मणियों और मोतियों की भव्य माला सुशोभित है। वे श्वेत (धवल) वस्त्र धारण करते हैं और उनका रूप तथा श्रृंगार अत्यंत मनमोहक एवं आकर्षक है।
तृतीय चरण - 'अलका पुरी के राजा, यक्षराज प्यारे। शिव जी के प्रिय मित्र, संकट भंव टारे ॥' कुबेर जी कैलाश के समीप बसी दिव्य नगरी 'अलकापुरी' के राजा हैं और उन्हें समस्त यक्षों का राजा (यक्षराज) कहा जाता है। वे देवों के देव महादेव भगवान शिव के परम मित्र और प्रिय भक्त हैं, जो अपने भक्तों के जीवन के सभी संकटों और भयों को दूर करते हैं।
चतुर्थ चरण - 'संख और पद्म निधि, तेरे द्वार खड़े। देव मुनि जन सेवत, चरणों में पड़े ॥' ब्रह्मांड की नौ प्रकार की निधियां (विशेषकर शंख और पद्म निधि) साक्षात रूप से कुबेर देव के द्वार पर पहरा देती हैं और उनकी सेवा में तत्पर रहती हैं। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और देवता भी उनके चरणों में नमन करते हैं।
पंचम चरण - 'सोने का सिंहासन, मुकुट सिर साजे। हाथ गदा सोहे, त्रिशूल मन भाजे ॥' भगवान कुबेर स्वर्ण निर्मित सिंहासन पर आसीन होते हैं, उनके मस्तक पर दैदीप्यमान मुकुट सुशोभित है। उनके हाथों में गदा और अस्त्र-शस्त्र उनकी दिव्यता और शक्ति का प्रतीक हैं।
षष्ठ चरण - 'भोग लगे मिष्ठान्न का, मेवा और खीर। भक्त जनों की नैया, पार करो वीर ॥' भक्त उन्हें मिष्ठान्न, सूखे मेवे और खीर का भोग अर्पित करते हैं। हे वीर कुबेर! हमारे जीवन रूपी नैया को इस भवसागर से पार लगाइए और हमारे भंडारे सदा भरे रखिए।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन परंपरा में धन की देवी महालक्ष्मी और भगवान कुबेर का जोड़ा अटूट माना जाता है। जहां माता लक्ष्मी चंचला हैं और धन का आगमन दर्शाती हैं, वहीं भगवान कुबेर उस धन के संरक्षक और प्रबंधक (Treasurer) हैं।
- कुबेर महालक्ष्मी पूजन: दीपावली, धनतेरस और प्रत्येक मास की त्रयोदशी या पूर्णिमा के दिन भगवान कुबेर की आरती करने से घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होता है।
- कर्ज मुक्ति: यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से कर्ज (ऋण) के बोझ से दबा है, तो नियमित रूप से कुबेर आरती करने से आय के नए स्रोत खुलते हैं और आर्थिक संकट समाप्त होते हैं।
- उत्तर दिशा के स्वामी: वास्तु शास्त्र के अनुसार, उत्तर दिशा भगवान कुबेर की दिशा मानी जाती है। घर की उत्तर दिशा को साफ-सुथरा रखकर वहां कुबेर जी की तस्वीर या मूर्ति स्थापित कर आरती करने से वास्तु दोषों का शमन होता है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
किसी भी देवी-देवता की आरती का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता जब उसे विधि-विधान और पूरी श्रद्धा के साथ किया जाए:
- स्थान की शुद्धि: प्रातःकाल स्नान के पश्चात या संध्याकाल में पूजा घर (विशेषकर उत्तर दिशा) को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
- आसन और स्थापना: एक साफ चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान श्री कुबेर और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- दीप प्रज्वलन: घी का दीपक और कपूर जलाकर पंचोपचार विधि (गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य) से पूजन करें।
- आरती गान: हाथ में घंटी (घंटा) लेकर और प्रज्वलित थाल को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) भगवान के चरणों से लेकर पूरे शरीर तक चार बार, नाभि क्षेत्र में दो बार, और मुखमंडल पर एक बार घुमाते हुए कुल सात बार आरती उतारें।
- क्षमा प्रार्थना: आरती के अंत में भूलचूक के लिए क्षमा मांगते हुए परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
भगवान कुबेर की आरती और पूजन में निम्नलिखित सामग्रियों का होना अत्यंत शुभ माना गया है:
- शुद्ध गाय का घी या तिल के तेल का दीपक
- कपूर (अग्निकर्म व आरती के लिए)
- धूपबत्ती और अगरबत्ती
- तांबे या पीतल की सजी हुई आरती की थाल
- पूजा की घंटी (शंख या घड़ियाल)
- पीले फूल, अक्षत (अतूट चावल) और कुमकुम/रोली
- नैवेद्य के लिए खीर, मखाने, मिष्ठान्न या मौसमी फल
- जल से भरा आचमनी या कलश
राग, ताल एवं गायन समय
भगवान कुबेर की आरती का गायन मुख्य रूप से राग कल्याण या राग यमन में किया जाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। यह राग मन को शांत करता है और भक्ति भाव को तीव्र करता है। इसे कहवा या दादरा ताल (मध्यलय) में गाया जा सकता है। आरती का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल सूर्योदय के समय या संध्याकाल (प्रदोष काल) में रात के प्रथम पहर में होता है। धनतेरस और दीपावली की रात्रि में अर्धरात्रि के समय कुबेर आरती का विशेष महत्व है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
प्रतिदिन नियमपूर्वक श्री कुबेर भगवान की आरती करने से साधक को अलौकिक आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- अक्षय धन संपत्ति: साधक के जीवन में कभी भी धन का अभाव नहीं रहता और उसके धन के स्रोत हमेशा बने रहते हैं।
- மனोबल में वृद्धि: यक्षराज की कृपा से व्यक्ति का आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है।
- नकारात्मक ऊर्जा का नाश: आरती के समय बजने वाली घंटी और कपूर की सुगंध से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- पारिवारिक सुख-शांति: घर में कलेश समाप्त होते हैं और माता लक्ष्मी के साथ अन्नपूर्णा का भी आशीर्वाद बना रहता है।