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श्री भगवान कार्तिकेय आरती
22 पाठ

श्री कार्तिकेय स्वामी की पावन आरती - ॐ जय स्कंद देवा, स्वामी जय कार्तिकेय देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री कार्तिकेय स्वामी की पावन आरती - ॐ जय स्कंद देवा, स्वामी जय कार्तिकेय देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र, देवताओं के महासेनापति, और अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करने वाले महातेजस्वी स्वामी कार्तिकेय (जिन्हें मुरुगन, स्कंद, और सुब्रह्मण्यम भी कहा जाता है) की पावन आरती सनातन धर्म में अत्यंत ऊर्जावान और फलदायी मानी जाती है। जब भक्त सच्चे मन से 'ॐ जय स्कंद देवा, स्वामी जय कार्तिकेय देवा' आरती का गान करते हैं, तो उनके जीवन से समस्त प्रकार के भय, शत्रु बाधा और मानसिक संताप समाप्त हो जाते हैं। दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत तक, कार्तिकेय स्वामी का यह वंदना गान साधकों को अद्भुत आत्मबल और साहस प्रदान करता है। आज के इस विस्तृत आलेख में हम भगवान कार्तिकेय की इस अद्भुत आरती के संपूर्ण बोल, उसका गूढ़ भावार्थ, नियम, पूजा विधि और आध्यात्मिक महत्व का संपूर्ण अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय स्कंद देवा, स्वामी जय कार्तिकेय देवा।
जातत ही फल पावत, जन दुविधा मेवा॥ ॐ जय...॥

भक्तन के हितकारी, सेवक सुखकारी।नारद मुनि गण गावत, महिमा अति भारी॥ ॐ जय...॥

कार्तिक मास सुहावन, बहु विधि सुखकारी।
देविन के दुख भंजन, रिपु दल संहारी॥ ॐ जय...॥

मोहिनी मूरत सांची, शिखि वाहन सोहै।
त्रिभुवन जन मन मोहन, छवि देखत मोहै॥ ॐ जय...॥

शुक्र और कुज वारहिं, जो व्रत नर राखे।
वांछित फल सो पावे, मन चिंता भागे॥ ॐ जय...॥

शस्त्र शक्ति कर साजे, त्रिशूल गदा भारी।
भक्तन की रक्षा हित, प्रगटे सुर भारी॥ ॐ जय...॥

देवाशरण जो आए, ताको दुःख टारो।
संकट मोचन स्वामी, भव बंधन हारो॥ ॐ जय...॥

कार्तिकेय स्वामी की आरती जो नर नित गावे।
कहा कहौं तह महिमा, सुख संपत्ति पावे॥ ॐ जय...॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

भगवान कार्तिकेय की इस आरती की प्रत्येक पंक्ति में आध्यात्मिक ज्ञान और दिव्य ऊर्जा समाहित है। आइए इसके विस्तृत भावार्थ को समझते हैं:

प्रथम पद भावार्थ: 'ॐ जय स्कंद देवा, स्वामी जय कार्तिकेय देवा। जातत ही फल पावत, जन दुविधा मेवा॥' - हे स्कंद देव! हे कार्तिकेय स्वामी! आपकी जय हो। आपके दर्शन मात्र से या आपका स्मरण करते ही मनुष्यों के सभी प्रकार के संशय, दुविधाएं और कष्ट नष्ट हो जाते हैं तथा वे तुरंत ही अभीष्ट फल प्राप्त कर लेते हैं।'

द्वितीय पद भावार्थ: 'भक्तन के हितकारी, सेवक सुखकारी। नारद मुनि गण गावत, महिमा अति भारी॥' - हे स्वामी! आप हमेशा अपने भक्तों का कल्याण करने वाले और उनकी सेवा करने वालों को असीम सुख देने वाले हैं। देवर्षि नारद और अन्य महान ऋषिगण आपकी विशाल महिमा का गुणगान निरंतर करते रहते हैं।'

तृतीय पद भावार्थ: 'कार्तिक मास सुहावन, बहु विधि सुखकारी। देविन के दुख भंजन, रिपु दल संहारी॥' - कार्तिक मास में आपकी आराधना विशेष फलदायी होती है। आप देवताओं के दुखों को हरने वाले और राक्षसों तथा शत्रुओं के दलों का संहार करने वाले महाप्रतापी सेनापति हैं।'

चतुर्थ पद भावार्थ: 'मोहिनी मूरत सांची, शिखि वाहन सोहै। त्रिभुवन जन मन मोहन, छवि देखत मोहै॥' - आपकी यह परम सुंदर और मोहक मूर्ति पूर्णतः सत्य और दिव्य है। आपका वाहन मयूर (शिखि) आपकी शोभा को और अधिक बढ़ाता है। त्रिभुवन ( तीनों लोकों) के जीव आपकी इस अलौकिक छवि को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।'

पंचम पद भावार्थ: 'शुक्र और कुज वारहिं, जो व्रत नर राखे। वांछित फल सो पावे, मन चिंता भागे॥' - जो भी मनुष्य शुक्रवार या मंगलवार (कुज वार) के दिन आपका व्रत रखता है और विधि-विधान से पूजा करता है, वह अपनी इच्छाओं के अनुसार सभी फल प्राप्त करता है और उसके मन की सारी चिंताएं दूर हो जाती हैं।'

षष्ठ पद भावार्थ: 'शस्त्र शक्ति कर साजे, त्रिशूल गदा भारी। भक्तन की रक्षा हित, प्रगटे सुर भारी॥' - आपके हाथों में विभिन्न दिव्य अस्त्र-शस्त्र और त्रिशूल सुशोभित हैं। आप अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए ही देवों के सेनापति के रूप में प्रकट हुए हैं।'

सप्तम पद भावार्थ: 'देवाशरण जो आए, ताको दुःख टारो। संकट मोचन स्वामी, भव बंधन हारो॥' - जो भी शरणार्थी आपकी शरण में आता है, आप उसके समस्त दुखों को हर लेते हैं। हे संकट मोचन स्वामी! आप हमारे जन्म-मृत्यु के भव बंधन को काटने वाले हैं।'

अष्टम पद भावार्थ: 'कार्तिकेय स्वामी की आरती जो नर नित गावे। कहा कहौं तह महिमा, सुख संपत्ति पावे॥' - जो भी मनुष्य नित्य नियम से कार्तिकेय स्वामी की इस पावन आरती का गान करता है, उसकी महिमा का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता; उसे जीवन में सभी प्रकार के सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।'

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान कार्तिकेय का प्राकट्य देवताओं की रक्षा और तारकासुर जैसे महाशक्तिशाली राक्षस का वध करने के लिए हुआ था। स्कंद पुराण में कार्तिकेय स्वामी की उत्पत्ति, उनके बालचरित और उनकी सेनापति पदवी का विस्तृत वर्णन मिलता है। कार्तिकेय स्वामी की आरती का गान करने से कुंडली में मंगल ग्रह से संबंधित दोष (जैसे मंगल दोष) और स्कंद षष्ठी के प्रभावों का सकारात्मक फल प्राप्त होता है। स्कंद षष्ठी के दिन उनकी पूजा और आरती करने से संतान प्राप्ति, बुद्धि, तेज और शत्रुओं पर विजय की प्राप्ति होती है। यह आरती साधक के मूलाधार चक्र को जाग्रत करने और कुण्डलिनी जागरण में भी सहायक मानी जाती है क्योंकि कार्तिकेय जी को ज्ञान, योग और ब्रह्मचर्य का प्रतीक माना गया है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  1. स्थान की शुद्धि: प्रातःकाल स्नान करके मंदिर या पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
  2. प्रतिमा स्थापना: एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान कार्तिकेय (या उनके शस्त्र वेल/मयूरासीन चित्र) की स्थापना करें।
  3. षोडशोपचार पूजा: भगवान को रोली, अक्षत, पीले फूल, धूप, दीप, और नैवेद्य (विशेषकर मोदक या फल) अर्पित करें।
  4. आरती का समय: संध्याकाल या प्रातःकाल धूप-दीप जलाकर श्रद्धापूर्वक कार्तिकेय स्वामी की आरती गाएं।
  5. आचरण: आरती के दौरान घंटी बजाएं और कपूर प्रज्वलित कर दोनों हाथों से आरती को ग्रहण करें तथा पूरे परिवार में उसका प्रकाश फैलाएं।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

  • स्वच्छ तांबे या पीतल की पूजा थाली।
  • शुद्ध घी का दीपक (या चमेली के तेल का दीपक विशेष अवसरों पर)।
  • कपूर आरती के लिए शुद्ध कपूर की टिकिया।
  • धूपबत्ती और अगरबत्ती।
  • पुष्प अर्पण हेतु ताजे पीले या लाल फूल।
  • नैवेद्य के लिए मिष्ठान, पंचामृत या फल।
  • पूजा की शुद्धि और वातावरण को सकारात्मक बनाने के लिए घंटी और शंख।

राग, ताल एवं गायन समय

श्री कार्तिकेय स्वामी की यह आरती पारंपरिक रूप से राग कल्याण या राग यमन की सुमधुर धुनों में गाई जाती है। इसका गायन प्रातःकाल (सूर्योदय के समय) या प्रदोष काल (संध्या के समय) में करना अत्यंत फलदायी होता है। इसे तालबद्ध तरीके से गाने पर मन को एकाग्रता और असीम शांति मिलती है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नित्य प्रति इस आरती का पाठ करने से निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • आत्मबल में वृद्धि: साधक के भीतर नेतृत्व क्षमता, साहस और निर्भीकता का विकास होता है।
  • शत्रु बाधा मुक्ति: छिपे हुए शत्रुओं और नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा होती है।
  • बुद्धि और ज्ञान: विद्यार्थियों के लिए यह आरती स्मरण शक्ति और बौद्धिक विकास में वरदान साबित होती है।
  • पारिवारिक सुख-शांति: घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सभी प्रकार के कलह-कलेश दूर होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री कार्तिकेय स्वामी की पावन आरती - ॐ जय स्कंद देवा, स्वामी जय कार्तिकेय देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान कार्तिकेय के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री भगवान कार्तिकेय जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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