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श्री भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) आरती
7 पाठ

श्री कार्तिकेय स्वामी की आरती - ॐ जय स्कंद देवा, स्वामी जय स्कंद देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री कार्तिकेय स्वामी की आरती - ॐ जय स्कंद देवा, स्वामी जय स्कंद देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

भगवान कार्तिकेय, जिन्हें मुरुगन, स्कंद, षडानन और सुब्रह्मण्यम के नाम से भी जाना जाता है, देव सेना के सेनापति और ज्ञान के देवता हैं। भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय की उपासना दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत तक अत्यंत श्रद्धा के साथ की जाती है। उनकी कृपा प्राप्ति के लिए 'ॐ जय स्कंद देवा' आरती का गान अत्यंत फलदायी माना गया है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम भगवान कार्तिकेय की आरती के संपूर्ण बोल, उसका भावार्थ, पूजा विधि, आवश्यक सामग्री और जीवन में मिलने वाले आध्यात्मिक लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय स्कंद देवा, स्वामी जय स्कंद देवा।
भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर देवा॥ ॐ जय...॥

शिव शंकर के प्यारे, पार्वती के नंदन।
त्रिभुवन के स्वामी, तुमको सब वंदन॥ ॐ जय...॥

छः मुख की छवि सोहे, मस्तक पर चंदा।
तारक सुर संहारक, हरते सब फंदा॥ ॐ जय...॥

मयूर पर विराजे, हाथों में शक्ति।
जो कोई तुमको ध्यावे, पावे अति भक्ति॥ ॐ जय...॥

देव सेना के राजा, रण में बलधारी।
दुष्ट दलन हित प्रगटे, असुरन भयकारी॥ ॐ जय...॥

ज्ञान और वैराग्य के, तुम हो प्रदाता।
संकट मोचन स्वामी, हो भाग्य विधाता॥ ॐ जय...॥

जो गावे यह आरती, मन लावे ध्याना।
उसकी सब विध पूरण, होवे मनमाना॥ ॐ जय...॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

भगवान कार्तिकेय की इस दिव्य आरती का हर एक शब्द असीम शक्ति और भक्ति से ओत-प्रोत है। आइए इसके विस्तृत भावार्थ को समझें:

प्रथम चरण: 'ॐ जय स्कंद देवा, स्वामी जय स्कंद देवा। भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर देवा॥' - इस पंक्ति में भक्त भगवान स्कंद (कार्तिकेय) की जयकार करते हुए कहते हैं कि हे स्वामी! आप अपने भक्तों के सभी प्रकार के दुखों और संकटों को पल भर में हर लेते हैं।

द्वितीय चरण: 'शिव शंकर के प्यारे, पार्वती के नंदन। त्रिभुवन के स्वामी, तुमको सब वंदन॥' - इसमें कार्तिकेय जी के दिव्य वंश का वर्णन है। वे भगवान शिव और माता पार्वती के अत्यंत प्रिय पुत्र हैं। तीनों लोकों (स्वर्ग, म्रत्यु और पाताल) के स्वामी होने के कारण समस्त देवता और ऋषि-मुनि आपको नमन करते हैं।

तृतीय चरण: 'छः मुख की छवि सोहे, मस्तक पर चंदा। तारक सुर संहारक, हरते सब फंदा॥' - भगवान कार्तिकेय को 'षडानन' यानी छह मुख वाले कहा गया है। उनके छह मुख छह अलग-अलग दिशाओं और गुणों के प्रतीक हैं। उन्होंने भयानक असुर तारकासुर का वध किया था, इसलिए वे भक्तों के जीवन के सभी बंधनों और कष्टों को काटते हैं।

चतुर्थ चरण: 'मयूर पर विराजे, हाथों में शक्ति। जो कोई तुमको ध्यावे, पावे अति भक्ति॥' - भगवान कार्तिकेय का वाहन मयूर (मोर) है और उनके हाथ में दिव्य 'शक्ति' आयुध सुशोभित रहता है। जो भी भक्त सच्चे मन से उनका स्मरण करता है, उसे परम भक्ति और साहस की प्राप्ति होती है।

पंचम चरण: 'देव सेना के राजा, रण में बलधारी। दुष्ट दलन हित प्रगटे, असुरन भयकारी॥' - वे देवताओं की सेना के सेनापति (महासेनापति) हैं। युद्ध के मैदान में उनका पराक्रम अद्वितीय है। अधर्म और दुष्टों का नाश करने के लिए ही उनका प्राकट्य हुआ है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

स्कंद पुराण, महाभारत और शिव पुराण में भगवान कार्तिकेय के जन्म और उनके महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। कार्तिकेय स्वामी केवल पराक्रम और युद्ध कौशल के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे परम ज्ञान, ब्रह्मचर्य और योग के भी अधिष्ठाता हैं। दक्षिण भारत में उन्हें 'मुरुगन स्वामी' के रूप में पूजा जाता है और स्कंद षष्ठी, थााइपुसम जैसे पर्वों पर उनकी विशेष आराधना होती है। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से कार्तिकेय स्वामी की आरती करता है, उसके अंदर साहस, नेतृत्व क्षमता और आध्यात्मिक तेज का विकास होता है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  1. ब्रह्म मुहूर्त स्नान: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर पीले या श्वेत वस्त्र) धारण करें।
  2. स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। भगवान कार्तिकेय की मूर्ति या तस्वीर को चौकी पर स्थापित करें।
  3. षोपचार पूजन: भगवान को रोली, अक्षत, पीले फूल, धूप, दीप और नैवेद्य (भोग) अर्पित करें।
  4. आरती गान: घी का दीपक जलाकर दोनों हाथों से थाल थामें और पूरी श्रद्धा, सुर-ताल के साथ 'ॐ जय स्कंद देवा' आरती गाएं।
  5. परिक्रमा और समर्पण: आरती के पश्चात स्वयं की तीन परिक्रमा करें और कपूर से अंतिम आरती उतारकर सभी में प्रसाद वितरित करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

  • शुद्ध तांबे या पीतल की थाली
  • गाय के शुद्ध घी का दीपक या कपूर
  • रोली, कुमकुम और पीले अक्षत (चावल)
  • पुष्पमाला और ताजे पीले फूल
  • भोग के लिए फल या पंचामृत
  • घंटी और शंख (सकारात्मक ऊर्जा के संचार के लिए)

राग, ताल एवं गायन समय

इस आरती को भगवान शिव और उनके परिवार की स्तुति के अनुकूल राग कल्याण या राग यमन में गाया जाना अत्यंत आनंददायक होता है। इसकी ताल কাহারवा (8 बीट) या दादरा (6 बीट) हो सकती है। गायन का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल (सूर्योदय के समय) और प्रदोष काल (संध्या के समय) है। स्कंद षष्ठी के दिन इसका विशेष गायन किया जाता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

भगवान कार्तिकेय की आरती करने से साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • शत्रु विजय और साहस: मन का डर समाप्त होता है और जीवन की हर चुनौती का सामना करने का संबल मिलता है।
  • ज्ञान और बुद्धि: विद्यार्थियों के लिए यह आरती स्मरण शक्ति और बौद्धिक विकास में सहायक है।
  • मंगल दोष निवारण: ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, कार्तिकेय उपासना से मंगल ग्रह के अशुभ प्रभाव शांत होते हैं।
  • पारिवारिक शांति: घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और क्लेश दूर होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री कार्तिकेय स्वामी की आरती - ॐ जय स्कंद देवा, स्वामी जय स्कंद देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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