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श्री श्री कालभैरव आरती
17 पाठ

श्री कालभैरव भगवान की पावन आरती - ॐ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग भैरवी / यमन शास्त्रीय राग / ताल
6 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री कालभैरव भगवान की पावन आरती - ॐ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

भगवान श्री कालभैरव देवों के देव महादेव भगवान शिव के ही अत्यंत तेजस्वी, जाग्रत और रुद्र अवतार माने जाते हैं। कालभैरव को काशी का कोतवाल और ब्रह्मांड का प्रलयंकर कहा जाता है। सनातन धर्म में कालभैरव की उपासना का विशेष स्थान है, विशेषकर तंत्र साधना, भय मुक्ति, शत्रुओं पर विजय और शनि-राहु के दुष्प्रभावों से रक्षा के लिए इनकी आराधना अचूक मानी जाती है। जब भक्त संध्याकाल में या विशेष अवसरों पर 'ॐ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा' की इस पावन आरती का गान करते हैं, तो उनके जीवन से अकाल मृत्यु का भय, नकारात्मक ऊर्जाएं और सभी प्रकार की बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं। भक्तलोक.इन के इस समर्पित आलेख में हम श्री कालभैरव आरती के संपूर्ण बोल, गूढ़ भावार्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि और इसके चमत्कारी लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा।
सुर नर मुनि जन पूजा, तेरी सेवा॥ ॐ जय भैरव देवा...॥

नख सिखर त्रय नेत्रों से, रूप महा भारी।
सुर नर मुनि सब कांपत, छटा तेरी न्यारी॥ ॐ जय भैरव देवा...॥

रूप कराल तुम्हारा, विकट नयन सोहे।
तीन लोक कांपत है, छवि देखत मोहे॥ ॐ जय भैरव देवा...॥

वाहन श्वान विराजे, हाथ त्रिशूल धारे।
भक्तन की रक्षा हित, संकट सब टारे॥ ॐ जय भैरव देवा...॥

काशी के तुम राजा, पुरी महा पावन।
दर्शन से पातक सब, होते हैं पावन॥ ॐ जय भैरव देवा...॥

काल रूप तुम भ्राता, यम डरत तुमसे।
भक्त शरण में आए, उबारो सब हमसे॥ ॐ जय भैरव देवा...॥

दीनन के प्रतिपालक, दुखियों के त्राता।
आदि अनादि प्रभुजी, तुम ही हो ज्ञाता॥ ॐ जय भैरव देवा...॥

जो जन आरती गावै, नित्त उठ सुर ध्यावै।
वांछित फल पावै, भवसागर तर जावै॥ ॐ जय भैरव देवा...॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री कालभैरव जी की यह आरती अत्यंत ऊर्जावान और दिव्य स्पंदनों से परिपूर्ण है। इसके हर एक शब्द में भगवान के महाकाल स्वरूप की महिमा का बखान किया गया है:

प्रथम चरण का भावार्थ: 'ॐ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा।' इस प्रथम पंक्ति में भक्त भगवान भैरव की वंदना करते हुए उनकी जयकार करते हैं। आगे कहा गया है कि 'सुर नर मुनि जन पूजा, तेरी सेवा।' अर्थात देवता, मनुष्य और ऋषि-मुनि सभी आपकी पूजा और सेवा में तत्पर रहते हैं, क्योंकि आप ही संपूर्ण ब्रह्मांड के पालनहार और रक्षक हैं।

द्वितीय एवं तृतीय चरण का भावार्थ: 'नख सिखर त्रय नेत्रों से, रूप महा भारी। सुर नर मुनि सब कांपत, छटा तेरी न्यारी।' यहां भगवान के विकराल स्वरूप का वर्णन है। उनके मस्तक पर तीन दिव्य नेत्र हैं और उनका रूप इतना प्रचंड है कि देवता और ऋषि भी उनकी अलौकिक छवि को देखकर विस्मित हो जाते हैं। उनका विकट नयन और कराल रूप तीनों लोकों में अद्वितीय है।

चतुर्थ एवं पंचम चरण का भावार्थ: 'वाहन श्वान विराजे, हाथ त्रिशूल धारे। भक्तन की रक्षा हित, संकट सब टारे।' भगवान कालभैरव का वाहन श्वान (कुत्ता) है और उनके हाथों में त्रिशूल सुशोभित रहता है। वे अपने शरणागत भक्तों के सभी संकटों को पलभर में हर लेते हैं। 'काशी के तुम राजा, पुरी महा पावन।' काशी (वाराणसी) नगरी के आप ही अधिपति राजा हैं, जिनके दर्शन मात्र से मनुष्यों के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।

षष्ठम एवं अंतिम चरण का भावार्थ: 'काल रूप तुम भ्राता, यम डरत तुमसे।' आप स्वयं महाकाल के रूप हैं, जिससे यमराज भी भय खाते हैं। 'जो जन आरती गावै, नित्त उठ सुर ध्यावै। वांछित फल पावै, भवसागर तर जावै।' जो भी भक्त निष्ठापूर्वक इस आरती का गान करता है और भगवान का ध्यान करता है, वह संसार के सभी सुखों को प्राप्त करता हुआ अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

शिवपुराण और कालभैरव तंत्र के अनुसार, श्री कालभैरव की उत्पत्ति भगवान शिव के क्रोध से हुई थी। एक बार अहंकारवश ब्रह्माजी ने शिवजी का अपमान कर दिया था, तब शिवजी के भ्रकुटी से प्रकट हुए कालभैरव ने ब्रह्माजी के पांचवें सिर को काट दिया था। इस प्रकार ब्रह्मांड में अहंकार का नाश करने वाले भैरव देव 'काशी के कोतवाल' के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
धार्मिक मान्यता है कि काशी यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक भक्त कालभैरव के दर्शन नहीं कर लेते। इन्हें 'दंडाधिकारी' भी कहा जाता है, जो पापी और दुष्ट प्रवृत्तियों के लोगों को दंडित करते हैं तथा भक्तों को सदा अभय दान देते हैं। अष्टमी तिथि (विशेषकर कालाष्टमी) और मंगलवार-रविवार के दिन इनकी आरती करने से अकाल मृत्यु, दुर्घटना, भूत-प्रेत बाधा तथा शत्रुओं का भय समूल नष्ट हो जाता है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  1. शुद्धता एवं समय: कालभैरव की आरती विशेष रूप से ब्रह्म बेला (सुबह) या प्रदोष काल/संध्याकाल में की जानी चाहिए। स्नान के बाद स्वच्छ काले, नीले या लाल वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  2. स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। भगवान कालभैरव की मूर्ति या तस्वीर के सामने आसन बिछाकर बैठें।
  3. दीप प्रज्वलन: सरसों के तेल या शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। कालभैरव की पूजा में सरसों के तेल का विशेष महत्व माना गया है।
  4. आरती गान: हाथों में प्रज्वलित कपूर की थाली या पंचमुखी दीपक लेकर 'ॐ जय भैरव देवा' आरती का सस्वर गान करें। आरती के अंत में शंख और घंटी बजाएं।
  5. परिक्रमा: आरती संपन्न होने के बाद अपनी ही जगह पर तीन बार परिक्रमा करें और भगवान को साष्टांग प्रणाम कर भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

भगवान कालभैरव की आरती को विधि-विधान से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री का होना अनिवार्य है:

  • पूजा थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
  • दीपक: मिट्टी या पीतल का दीपक, जिसमें सरसों का तेल या शुद्ध गाय का घी हो और लंबी बत्ती जली हो।
  • कपूर: आरती को प्रज्वलित करने और वातावरण को शुद्ध करने के लिए शुद्ध कपूर की टिक्कियां।
  • धूप एवं अगरबत्ती: सुगंधित गुग्गल या लोहबान की धूप।
  • पुष्प और नैवेद्य: काले तिल, उड़द की दाल, नींबू की माला, मदिरा (यदि पारंपरिक तांत्रिक परंपरा के अनुसार भोग लगाया जाए, अन्यथा मिठाई और फल), और ताजे फूल।
  • घंटी एवं शंख: नकारात्मक ऊर्जा दूर करने और सकारात्मक स्पंदन के लिए शंख और पीतल की घंटी।

राग, ताल एवं गायन समय

श्री कालभैरव की यह आरती 'राग भैरवी' या 'राग यमन' की धुनों पर बहुत ही प्रभावशाली ढंग से गाई जा सकती है। इसकी लय गंभीर, ओजस्वी और तालबद्ध (द्विताल या तीनताल) होनी चाहिए ताकि गान करते समय शरीर में वीरता और भक्ति की ऊर्जा का संचार हो सके। इस आरती के गायन का सर्वोत्तम समय रात्रि का प्रथम प्रहर या प्रदोष काल (संध्या के समय) माना गया है। कालभैरव अष्टमी या रविवार की मध्यरात्रि (निशि काल) में इस आरती का गान करने से विशेष सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

  • भय मुक्ति: नियमित रूप से यह आरती करने वाले व्यक्ति के मन से मृत्यु, अज्ञात भय और शत्रुओं का डर हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
  • ग्रह दोष निवारण: जिन जातकों की कुंडली में शनि, राहु या केतु की महादशा या साढ़ेसाती-ढैय्या चल रही हो, उनके लिए कालभैरव की आरती रामबाण औषधि का कार्य करती है।
  • व्यापार व करियर में उन्नति: जो लोग आर्थिक संकट या कर्ज के बोझ से दबे हैं, वे यदि प्रतिदिन इस आरती का पाठ करें तो मार्ग प्रशस्त होते हैं।
  • नकारात्मक शक्तियों का नाश: घर-परिवार में किसी भी प्रकार की बुरी नजर, तंत्र बाधा या ऊपरी हवा का प्रभाव हो तो कालभैरव की आरती से घर का वातावरण पवित्र हो जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री कालभैरव भगवान की पावन आरती - ॐ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री कालभैरव के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री श्री कालभैरव जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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