॥ श्री काल भैरव जी की आरती - ॐ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★भगवान श्री काल भैरव देवधिदेव महादेव शिव के रौद्र और अत्यंत तेजस्वी अवतार माने जाते हैं। काल और भय का नाश करने वाले बाबा भैरव की उपासना सनातन धर्म में तांत्रिक, आध्यात्मिक और गृहस्थ जीवन—तीनों दृष्टियों से अति महत्वपूर्ण है। काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाने वाले श्री काल भैरव की आरती 'ॐ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा' का गान करने से भक्तों के सभी प्रकार के भय, संकट, बाधाएं, नकारात्मक ऊर्जा, और शत्रु बाधा तुरंत समाप्त हो जाती हैं। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम भगवान काल भैरव की आरती के संपूर्ण बोल, उसका भावार्थ, पूजा की सही विधि, सामग्री, और इसके चमत्कारी आध्यात्मिक लाभों का संपूर्ण वर्णन प्रस्तुत कर रहे हैं।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा।
सुर नर मुनि जन सेवक, लागी निरंतर सेवा॥ ॐ जय भैरव देवा...॥
बांढै त्रिशूल अनूपा, बागत छवि भारी।
चिनकत चहुं दिशि भ्राजत, भूमंडल धारी॥ ॐ जय भैरव देवा...॥
धूम्र वाहन साजत, चंद्रमौली धारी।
बाँये हाथ कपाल, वर मुंडनि भारी॥ ॐ जय भैरव देवा...॥
शंकर के रूप तुमही, संकट हरन हारे।
सेवक के दुख भंजन, तुम काज संवारे॥ ॐ जय भैरव देवा...॥
काशी कोतवाल तुम, प्रगट सदा भाई।
तुम्हरो ध्यान जो ध्यावै, मुक्ति पद पाई॥ ॐ जय भैरव देवा...॥
तीन लोक में महिमा, तुम्हारी है गाई।
भक्तन के रखवारे, तुम आन बंस भाई॥ ॐ जय भैरव देवा...॥
काली और कपालिन, संग में डर डारे।
भूत प्रेत पिशाच सब, चरणन में हारे॥ ॐ जय भैरव देवा...॥
जो जन आरती गावै, नित्त उठि मंगला।
उसके सब दुख मिटिहैं, पावै सुख चंगा॥ ॐ जय भैरव देवा...॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भैरव आरती की प्रत्येक पंक्ति भगवान काल भैरव के महान स्वरूप, उनके पराक्रम और उनके दयालु स्वभाव का बखान करती है। भावार्थ को समझने से भजन और आरती में मन एकाग्र होता है:
प्रथम पद का अर्थ: 'ॐ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा। सुर नर मुनि जन सेवक, लागी निरंतर सेवा॥' हे प्रभु काल भैरव! आपकी जय हो, जय हो। देवता, मनुष्य और महर्षि निरंतर आपकी सेवा में तत्पर रहते हैं और आपका स्मरण करते हैं।
द्वितीय पद का अर्थ: 'बांढै त्रिशूल अनूपा, बागत छवि भारी। चिनकत चहुं दिशि भ्राजत, भूमंडल धारी॥' आपके हाथ में अनुपम त्रिशूल सुशोभित है और आपकी छटा अत्यंत भव्य व तेजस्वी है। आपके तेज की चिंगारियां चारों दिशाओं में ब्रह्मांड को आलोकित करती हैं।
तृतीय पद का अर्थ: 'धूम्र वाहन साजत, चंद्रमौली धारी। बाँये हाथ कपाल, वर मुंडनि भारी॥' आपका वाहन श्वान (कुत्ता) है, आपके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है। आपके बाएं हाथ में कपाल (खप्पर) और मुंडों की माला है, जो आपको तंत्र और काल के अधीश्वर के रूप में दर्शाती है।
चतुर्थ पद का अर्थ: 'शंकर के रूप तुमही, संकट हरन हारे। सेवक के दुख भंजन, तुम काज संवारे॥' आप स्वयं भगवान शिव के ही साक्षात रूप हैं, जो भक्तों के सभी संकटों का हरण करने वाले हैं। आप अपने सेवकों के दुखों का नाश करके उनके सभी बिगड़े काम संवार देते हैं।
पंचम पद का अर्थ: 'काशी कोतवाल तुम, प्रगट सदा भाई। तुम्हरो ध्यान जो ध्यावै, मुक्ति पद पाई॥' आप पवित्र नगरी काशी के कोतवाल हैं और सदैव भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट रहते हैं। जो भी मनुष्य आपका ध्यान करता है, वह इस भवसागर से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
शिव पुराण और कालिका पुराण के अनुसार, भगवान काल भैरव की उत्पत्ति अंधक असुर के वध और ब्रह्मा जी के अहंकार को दूर करने के लिए भगवान शिव के मस्तक के तेज से हुई थी। काल भैरव को 'काल' (समय और मृत्यु) पर नियंत्रण रखने वाला देवता माना जाता है। काल भैरव की आरती का पाठ करने से शनि की साढ़ेसाती, ढैया, राहु-केतु के बुरे प्रभाव, बुरी नजर, तंत्र-मंत्र बाधा और अकाल मृत्यु का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। जो व्यक्ति काशी यात्रा पर जाता है, उसे भगवान काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद काल भैरव के दर्शन और आरती अवश्य करनी होती है, अन्यथा उसकी काशी यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
काल भैरव जी की आरती और पूजा विधि अत्यंत सरल परंतु अनुशासन की मांग करती है:
- समय: काल भैरव जी की पूजा और आरती विशेष रूप से प्रदोष काल (संध्या समय) या रात्रि के समय (विशेषकर अष्टमी तिथि और मंगलवार/रविवार की रात्रि) को अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
- स्थान: पूजा घर को स्वच्छ करके भैरव जी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
- आसन: काले या लाल रंग के ऊनी आसन पर बैठकर पूजा करें।
- प्रसाद: भैरव बाबा को उड़द की दाल के वड़े, कचौड़ी, मदिरा (यदि परंपरा हो), दूध, दही, और गुड़-चने का भोग प्रिय है।
- दीपक: सरसों के तेल का चौमुखा दीपक या मिट्टी का दीपक जलाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
आरती के थाल में निम्नलिखित सामग्रियों का होना अनिवार्य है:
- तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली
- सरसों के तेल का दीपक (तिल का तेल भी प्रयोग कर सकते हैं)
- शुद्ध कपूर और प्रज्वलित करने के लिए माचिस
- रोली, अष्टगंध, सिंदूर और अक्षत (चावल)
- लाल और काले फूल (यदि उपलब्ध हों)
- नैवेद्य हेतु गुड़, चना या मिठाई
- पूजा के दौरान बजाने के लिए घंटी (घंटा) और शंख
राग, ताल एवं गायन समय
श्री काल भैरव जी की यह आरती 'राग भैरवी' या 'राग यमन' की धुनों में अत्यंत भावपूर्ण ढंग से गाई जाती है। इसकी ताल त्रिताल (16 मात्रा) या কাহারवा (8 मात्रा) में बैठती है। संध्याकालीन वेला या रात्रि के आठ से बारह बजे के मध्य इस आरती का गायन करने से विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा की अनुभूति होती है। सामूहिक रूप से घंटी और शंख की ध्वनि के साथ यह आरती वातावरण को पवित्र कर देती है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से जो भक्त काल भैरव की इस आरती का पाठ करता है, उसे निम्नलिखित अद्वितीय लाभ प्राप्त होते हैं:
- अज्ञात भय, मानसिक तनाव और अवसाद से मुक्ति।
- शत्रु विरोधी शांत होते हैं और कोर्ट-कचहरी के मामलों में विजय मिलती है।
- घर में नकारात्मक ऊर्जा, बुरी बलाएं और प्रेत बाधा प्रवेश नहीं करती।
- समस्त पापों का नाश होकर अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।