पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री भगवान जगन्नाथ आरती
9 पाठ

श्री जगन्नाथ भगवान की पावन आरती - आरती श्री जगन्नाथ जी की, जय जगन्नाथ स्वामी: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन / भैरवी शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री जगन्नाथ भगवान की पावन आरती - आरती श्री जगन्नाथ जी की, जय जगन्नाथ स्वामी: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

भगवान श्री जगन्नाथ, जो साक्षात 'दारुब्रह्म' के रूप में पुरुषोत्तम क्षेत्र (पुरी) में विराजमान हैं, उनकी आरती का गान करना अनंत पुण्यों का फल माना जाता है। जगन्नाथ का अर्थ है 'जगत के स्वामी' (जगत + नाथ), जो अपने भक्तों पर करुणा की वर्षा करने के लिए विशाल नेत्रों और अधूरी भुजाओं के साथ प्रकट हुए हैं। श्री जगन्नाथ जी की आरती केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच का वह सेतु है, जिसके माध्यम से जीव अपनी आत्मा को परमात्मा में विलीन करने का प्रयास करता है। स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक भगवान जगन्नाथ की आरती के दर्शन करता है या उसे गाता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर वैकुंठ धाम को प्राप्त करता है। इस लेख में हम भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध आरती 'जय जगन्नाथ स्वामी' के संपूर्ण बोल, उसके गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि और इसके महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

भगवान जगन्नाथ जी की आरती अत्यंत मधुर और भक्ति भाव से ओत-प्रोत है। यहाँ आरती के प्रामाणिक बोल दिए गए हैं:

आरती श्री जगन्नाथ जी की

जय जगन्नाथ स्वामी, जय जगन्नाथ स्वामी।
नयन पथ गामी, भवतु मे, जय जगन्नाथ स्वामी॥

कदाचित कालिंदी तट विपिन संगीतकवरो,
मुदाभीरी नारी वदन कमला स्वाद मधुपः।
रमा शंभु ब्रह्मामरपति गणेशार्चित पदो,
जगन्नाथ स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे॥

भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे,
दुकूलं नेत्रान्ते सहचरकटाक्षं विदधते।
सदा श्रीमद् वृन्दावन वसति लीला परिचयो,
जगन्नाथ स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे॥

महाम्भोधेस्तीरे कनक रुचिरे नील शिखरे,
वसन प्रासादान्तः सहज बलभद्रेण बलिना।
सुभद्रा मध्यस्थः सकल सुर सेवावसरदो,
जगन्नाथ स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे॥

कृपा पारावारः सजल जलद श्रेणी रुचिरो,
रमा वाणी रामः स्फुरदमल पङ्केरुह मुखः।
सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुतिगण शिखा गीत चरितो,
जगन्नाथ स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे॥

रथारूढो गच्छन् पथि मिलित भूदेव पटलैः,
स्तुति प्रादुर्भावं प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः।
दया सिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धु सुतया,
जगन्नाथ स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे॥

परब्रह्मापीडः कुवलय दलोत्फुल्ल नयनो,
निवासी नीलाद्रौ निहित चरणोऽनन्त शिरसि।
रसानन्दी राधा सरस वपुरालिङ्गन सुखो,
जगन्नाथ स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे॥

न वै याचे राज्यं न च कनक माणिक्य विभवं,
न याचेऽहं रम्यां सकल जन काम्यां वरवधूं।
सदा काले काले प्रमथ पतिना गीत चरितो,
जगन्नाथ स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे॥

हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते,
हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते।
अहो दीनेऽनाथे निहित चरणो निश्चितमिदं,
जगन्नाथ स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

भगवान जगन्नाथ की यह आरती (जो वास्तव में जगन्नाथाष्टकम का ही अंश है) अत्यंत गहरा दार्शनिक अर्थ समेटे हुए है। यहाँ इसका विस्तृत भावार्थ प्रस्तुत है:

प्रथम पद: भगवान जगन्नाथ का आह्वान करते हुए भक्त कहता है कि हे यमुना तट के वनों में संगीत की मधुर तान छेड़ने वाले, हे गोपियों के मुख-कमल का रसपान करने वाले भ्रमर, हे ब्रह्मा, विष्णु, महेश और इंद्र द्वारा पूजित चरणों वाले स्वामी! आप मेरी आँखों के सामने प्रकट हों, मेरे नयन पथ के गामी बनें।

द्वितीय पद: इस पद में भगवान के रूप का वर्णन है। जिनके बाएं हाथ में बांसुरी है, मस्तक पर मोरपंख है, कमर पर पीतांबर है और जो अपने सखाओं पर कृपा दृष्टि डालते हैं। जो सदैव वृंदावन की लीलाओं में रमे रहते हैं, वे जगन्नाथ स्वामी मुझ पर कृपा करें।

तृतीय पद: यहाँ पुरी धाम का वर्णन है। विशाल समुद्र के तट पर, स्वर्ण के समान चमकते हुए नीलमणि पर्वत (नीलांचल) के शिखर पर बने भव्य प्रासाद में जो अपने बलशाली भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं, वे समस्त देवताओं द्वारा सेवित प्रभु मेरे नयन पथ गामी हों।

चतुर्थ पद: भगवान को 'कृपा पारावार' यानी कृपा का समुद्र कहा गया है। उनका रंग जल से भरे बादलों के समान श्याम वर्ण है। वे लक्ष्मी और सरस्वती के प्रिय हैं। उनका मुख खिले हुए कमल के समान है। वे वेदों द्वारा गाए गए चरित्र वाले हैं।

पंचम पद (रथ यात्रा): जब भगवान रथ पर सवार होकर चलते हैं और ब्राह्मणों के समूह उनकी स्तुति करते हैं, तब वे दयालु होकर सबकी पुकार सुनते हैं। वे संपूर्ण जगत के बंधु हैं।

षष्ठ एवं सप्तम पद: भक्त कहता है कि मुझे न राज्य चाहिए, न सोना-चांदी और न ही सुंदर स्त्री। मेरी केवल एक ही इच्छा है कि शिव जी द्वारा गाए गए चरित्र वाले भगवान जगन्नाथ सदैव मेरे हृदय और नेत्रों में बसे रहें। हे यादवपति! मेरे इस असार संसार के दुखों और पापों को हर लें।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

भगवान जगन्नाथ की आरती का महत्व भारतीय संस्कृति और वैष्णव परंपरा में अद्वितीय है। इसके कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • दारुब्रह्म की उपासना: जगन्नाथ जी को 'दारुब्रह्म' कहा जाता है, जिसका अर्थ है लकड़ी में साक्षात ब्रह्म। उनकी आरती करने से निराकार ब्रह्म के साकार रूप की अनुभूति होती है।
  • पाप मुक्ति: शास्त्रों के अनुसार, 'रथस्थं वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते' - अर्थात रथ पर सवार वामन रूप (जगन्नाथ) के दर्शन मात्र से पुनर्जन्म नहीं होता। आरती इसी दर्शन का एक अनिवार्य हिस्सा है।
  • एकात्मता का संदेश: जगन्नाथ पुरी में जाति-पाति का भेद नहीं है। उनकी आरती में सम्मिलित होने वाला हर व्यक्ति समान है। यह आरती सामाजिक समरसता और प्रेम का प्रतीक है।
  • शरणगति का भाव: इस आरती के शब्द भक्त को पूर्ण शरणागति (Surrender) की ओर ले जाते हैं, जो भक्ति मार्ग की सर्वोच्च अवस्था है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

आरती केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि एक साधना है। इसे सही विधि से करने पर ही पूर्ण फल प्राप्त होता है:

  1. शुद्धि: आरती से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र (पीले या सफेद वस्त्र उत्तम हैं) धारण करें।
  2. आसन: भगवान के सम्मुख कुश या ऊनी आसन पर बैठें या खड़े हों।
  3. दीप प्रज्वलन: शुद्ध घी का दीपक तैयार करें। इसमें पांच बत्तियां (पंचप्रदीप) होना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  4. आरती की गति: आरती को बहुत तेजी से न घुमाएं। इसे धीरे-धीरे घड़ी की सुई की दिशा (Clockwise) में घुमाना चाहिए।
  5. अर्पण की विधि: सबसे पहले भगवान के चरणों में चार बार, नाभि पर दो बार, मुख मंडल पर एक बार और अंत में पूरे शरीर पर सात बार आरती घुमानी चाहिए।
  6. भाव: आरती करते समय मन में यह भाव रखें कि आप अपना सर्वस्व भगवान को समर्पित कर रहे हैं।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

एक पूर्ण आरती थाल में निम्नलिखित वस्तुएं होनी चाहिए:

सामग्री महत्व
पीतल या चांदी की थाल शुद्धता और सात्विकता का प्रतीक
शुद्ध घी का दीपक अंधकार को दूर करने वाला ज्ञान का प्रतीक
कपूर (Camphor) कपूर की सुगंध मन को एकाग्र करती है और नकारात्मकता मिटाती है
शंख और घंटी इनकी ध्वनि से वातावरण पवित्र होता है और आसुरी शक्तियां दूर भागती हैं
ताजे पुष्प (तुलसी दल अनिवार्य) भगवान जगन्नाथ को तुलसी अत्यंत प्रिय है
चंदन और अक्षत श्रृंगार और सम्मान के लिए

राग, ताल एवं गायन समय

भगवान जगन्नाथ की आरती का गायन शास्त्रीय मर्यादाओं में किया जाए तो यह अधिक प्रभावशाली होती है:

  • राग: इस आरती को मुख्य रूप से राग कल्याण या राग यमन में गाया जाता है। सुबह के समय इसे राग भैरवी में भी गाया जा सकता है।
  • ताल: यह आरती दादरा ताल (6 मात्रा) या कहरवा ताल (8 मात्रा) पर बहुत सुंदर लगती है।
  • समय: जगन्नाथ मंदिर में मुख्य रूप से तीन समय की आरती प्रसिद्ध है - मंगला आरती (भोर में), संध्या आरती (शाम को) और पहूड आरती (रात्रि विश्राम के समय)। घर में इसे सुबह और शाम को करना चाहिए।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से श्री जगन्नाथ जी की आरती करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति: आरती की ध्वनि और शब्दों का प्रभाव मस्तिष्क की अशांति को दूर कर एकाग्रता बढ़ाता है।

2. भय का नाश: 'जगन्नाथ' का अर्थ ही है पूरे ब्रह्मांड का रक्षक। उनकी शरण में जाने से मृत्यु और अज्ञात भय समाप्त हो जाते हैं।

3. पारिवारिक सुख: जिस घर में प्रतिदिन शंख ध्वनि के साथ जगन्नाथ जी की आरती होती है, वहां कलह नहीं होता और सुख-समृद्धि का वास होता है।

4. मोक्ष की प्राप्ति: अंत समय में भगवान जगन्नाथ का स्मरण और उनकी आरती का फल जीव को वैकुंठ की प्राप्ति कराता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

क्या जगन्नाथ जी की आरती में तुलसी का प्रयोग जरूरी है?

हाँ, भगवान जगन्नाथ विष्णु के अवतार हैं और उन्हें तुलसी दल अत्यंत प्रिय है। आरती के थाल में तुलसी पत्र रखना और आरती के बाद उसे जल में डालकर चरणामृत लेना बहुत शुभ होता है।

जगन्नाथ जी की मूर्तियां अधूरी क्यों हैं?

पौराणिक कथा के अनुसार, जब शिल्पी विश्वकर्मा मूर्तियां बना रहे थे, तब राजा इंद्रद्युम्न ने धैर्य खोकर दरवाजा खोल दिया था। शर्त के अनुसार विश्वकर्मा ने काम अधूरा छोड़ दिया। भगवान ने इसे ही अपना स्वरूप स्वीकार किया ताकि भक्त उनके निराकार से साकार होने की प्रक्रिया को समझ सकें।

क्या घर में जगन्नाथ जी की आरती अकेले कर सकते हैं?

बिल्कुल, आरती अकेले या परिवार के साथ की जा सकती है। महत्वपूर्ण 'भाव' और 'श्रद्धा' है। यदि संभव हो तो सामूहिक रूप से आरती करें क्योंकि कीर्तन और आरती का सामूहिक प्रभाव अधिक होता है।

आरती के बाद क्या करना चाहिए?

आरती पूर्ण होने के बाद दोनों हाथों से आरती की लौ को ग्रहण करें (आरती लेना), फिर भगवान को साष्टांग प्रणाम करें और उपस्थित लोगों में प्रसाद वितरण करें।

१. श्री जगन्नाथ भगवान की पावन आरती - आरती श्री जगन्नाथ जी की, जय जगन्नाथ स्वामी: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान जगन्नाथ के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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